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संपादकीय

मतदाता पहचान पत्र को आधार से जोड़ना क्यों है सवालों के घेरे में

January 02, 2022 12:38 PM

हाल ही में चुनाव कानून (संशोधन) विधेयक, 2021 लोकसभा में पारित किया गया जो निर्वाचक नामावली डेटा(इलेक्टोरल रोल डाटा) और मतदाता पहचान पत्र को आधार से जोड़ने का प्रयास करता है।  यह विधेयक मतदाता सूची के ह्यडी-डुप्लीकेशनह्ण यानी एक से अधिक बार नामांकन की समाप्ति सुनिश्चित करने का प्रयास करता है। लेकिन इस विधेयक में कई दोष मौजूद हैं।  लोकसभा में विधेयक को इसके पेश किये जाने के दिन ही पारित कर लिया गया। यह न केवल संसदीय लोकतंत्र के मूल आधार को कमजोर करता है, बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को किसी मुद्दे पर अपनी चिंताओं को व्यक्त करने के अवसर से भी वंचित करता है।  संसदीय लोकतंत्र को उसके वास्तविक अर्थ में संरक्षित करने के लिये बेहतर संसदीय निगरानी के साथ-साथ निर्वाचित प्रतिनिधियों के अधिकारों को सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।
इसके कई फायदे हैं जैसे:यह जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 23 में संशोधन का प्रावधान करता है, ताकि निर्वाचक नामावली डेटा को आधार पारितंत्र से संबद्ध किया जा सके,इसका उद्देश्य विभिन्न स्थानों पर एक ही व्यक्ति के एकाधिक नामांकन को रोकना है,पंजीकरण के लिये 'सेवा मतदाताओं की पत्नियों' शब्दावली के बदले अब 'जीवन साथी' शब्द का प्रयोग किया जाएगा,विधेयक में वोटिंग रोल को अपडेट करने के लिये पूर्व की एक तिथि (1 जनवरी) के बजाय चार क्वालिफाइंग तिथियों (जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर माह का पहला दिन) का प्रस्ताव है, जिस दिन 18 वर्ष पूरा करने वाले व्यक्ति को इसमें शामिल किया जा सकता है। मतदाता पहचान के साथ आधार डेटा को जोड़ने से दूरस्थ मतदान की अनुमति मिलेगी, जो प्रवासी मतदाताओं के अनुकूल होगा,आधार लिंकिंग को फर्जी वोटिंग और फर्जी मतों को रोकने में मददगार माना जा रहा है, इसके फायदों के साथ साथ इससे संबंधित कई चिंताएँ भी हैं जैसे: आधार प्रस्तुत कर सकने में अक्षमता के मामले में मतदाता सूची में किसी व्यक्ति के प्रवेश या बने रहने की अनुमति देने का अंतिम अधिकार केंद्र सरकार के पास होगा, जो आवश्यकत शर्तों के निर्धारण की शक्ति रखेगी, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार प्राप्त करने के लिये सरकार द्वारा सक्रिय रूप से मतदाता सूची में लोगों का पंजीकरण सुनिश्चित करने के बजाय, उत्तरदायित्व या बोझ अब व्यक्तियों के ऊपर स्थानांतरित हो गया है जो निर्वाचक नामावली में बने रहने के लिये अपने आधार को लिंक करने के मामले में असमर्थ या अनिच्छुक हो सकते हैं,इसके अलावा, यह किसी प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों के बिना मतदाता सूची से विलोपन को अवसर देगा, क्योंकि वर्तमान में कानून इस तरह के विलोपन से पहले सुनवाई का अधिकार प्रदान नहीं करता है, आधार और चुनाव संबंधी डेटाबेस के बीच प्रस्तावित लिंकेज निर्वाचन आयोग और यू आई डी ए आई को डेटा उपलब्ध कराएगा, जिससे नागरिकों की निजता का हनन हो सकता है, वैध मतदाताओं को आधार विवरण जमा करने की उनकी अनिच्छा/अक्षमता के आधार पर मताधिकार से वंचित कर दिया जा सकता है। इस संशोधन के परिणामस्वरूप ह्यपॉलिटिकल प्रोफाइलिंगह्ण की स्थिति बनेगी। मतदाता पहचान पत्र को आधार संख्या से जोड़े जाने पर सरकार के लिये वैसे किसी भी मतदाता को ट्रैक करना बहुत आसान हो जाएगा है, जिसने अपने आधार का उपयोग कर कल्याणकारी सब्सिडी और लाभ प्राप्त किये हैं।सार्वजनिक रूप से अनुपलब्ध ऐसी सूचनाओं का उपयोग फिर राजनीतिक दलों द्वारा अपने संदेशों को विशिष्ट मतदाताओं को लक्षित करने के लिये किया जा सकता है।  
यह सच है कि किसी प्रस्तावित विधेयक पर एक उत्पादक बहस आवश्यक है ताकि उसके महत्त्व पर चर्चा के साथ-साथ उससे संबद्ध चिंताओं की पहचान और उन्हें संबोधित करने के उपायों पर विचार किया जा सके। मतदाताओं के एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में पंजीकृत होने या गैर-नागरिकों के नामांकन जैसी समस्याएँ वास्तविक रूप से मौजूद हैं, लेकिन इन समस्याओं को अन्य पहचान प्रक्रियाओं द्वारा संबोधित किया जा सकता है। वस्तुत: आधार डेटाबेस मतदाता पहचान को सत्यापित करने के लिये अप्रासंगिक भी सिद्ध हो सकता है क्योंकि यह निवासियों का पहचानकर्त्ता है न कि नागरिकों का।एक दोष-मुक्त मतदाता सूची स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की अनिवार्य शर्त है। सरकार को एक व्यापक विधेयक लेकर आना चाहिये ताकि संसद में उस पर उपयुक्त रूप से बहस की जा सके।इसके साथ ही, विधेयक में यह निर्दिष्ट किया जाना चाहिये कि दोनों डेटाबेस के बीच डेटा साझा करने की सीमा क्या होगी, सहमति प्राप्त करने के कौन से तरीके उपयोग किये जाएंगे और डेटाबेस को जोड़ने के लिये सहमति को रद्द किया जा सकता है या नहीं।आधार-मतदाता पहचान पत्र एकीकरण को आगे बढ़ाने से पहले सरकार को व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून का प्रवर्तन सुनिश्चित करना चाहिये। व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून  तंत्र सरकारी संस्थाओं के ऊपर भी लागू होना चाहिये जहाँ उनके लिये विभिन्न सरकारी संस्थानों के बीच डेटा की साझेदारी से पहले किसी व्यक्ति की स्पष्ट सहमति प्राप्त करना आवश्यक हो।  

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