भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः हर साल मानसून के मौसम में हिमालय से निकलने वाली नदियां—गंगा, ब्रह्मपुत्र, कोसी, गंडक—भारत, नेपाल और बांग्लादेश की सीमाओं को इस तरह पार करती हैं जैसे उनके लिए कोई सरहद हो ही नहीं। पानी का यह बहाव न पासपोर्ट देखता है, न वीज़ा मांगता है। लेकिन जब उसी बाढ़ से निपटने की बारी आती है, तो अचानक ये तीनों देश अपने-अपने दायरों में सिमट जाते हैं। नेपाल की पहाड़ियों में हुई भारी बारिश का असर बिहार के मैदानों में तबाही के रूप में सामने आता है, और वही पानी आगे बांग्लादेश के डेल्टा क्षेत्र को डुबो देता है। फिर भी इन तीनों देशों के पास साझा, समन्वित और वास्तविक समय पर काम करने वाली कोई आपदा प्रबंधन प्रणाली नहीं है। यह विरोधाभास दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी संस्थागत विफलताओं में से एक है।
गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना बेसिन दुनिया के सबसे बड़े नदी बेसिनों में गिना जाता है, जिसका फैलाव भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और चीन तक है। इस बेसिन में रहने वाली आबादी करोड़ों में है, और मानसून के दौरान बाढ़ इस पूरे क्षेत्र की सबसे नियमित और सबसे विनाशकारी प्राकृतिक आपदा बनी रहती है। बावजूद इसके, हर देश की आपदा प्रबंधन नीति अपने भौगोलिक क्षेत्र तक ही सीमित है। भारत का राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण अपनी सीमाओं के भीतर काम करता है, नेपाल की आपदा जोखिम न्यूनीकरण परिषद अपने स्तर पर, और बांग्लादेश का आपदा प्रबंधन मंत्रालय अपनी सीमाओं में। इनके बीच सूचना के आदान-प्रदान की कोई मजबूत, स्वचालित और भरोसेमंद व्यवस्था नहीं है।
नतीजा यह होता है कि जब नेपाल में बांधों से पानी छोड़ा जाता है या पहाड़ों में भारी वर्षा होती है, तो नीचे के इलाकों को अक्सर बहुत देर से या अधूरी जानकारी मिलती है। कई बार यह सूचना अनौपचारिक माध्यमों से, स्थानीय अधिकारियों के आपसी फोन कॉल के जरिए पहुंचती है, न कि किसी संस्थागत ढांचे के माध्यम से। यह किसी आधुनिक, तकनीकी रूप से समृद्ध क्षेत्र के लिए शर्मनाक स्थिति है।
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन यानी सार्क के गठन के पीछे यही उद्देश्य था कि यह क्षेत्र साझा चुनौतियों का साझा समाधान खोजे। आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में सार्क डिज़ास्टर मैनेजमेंट सेंटर जैसी पहलें भी हुईं, लेकिन भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव के कारण सार्क का पूरा ढांचा वर्षों से लगभग निष्क्रिय पड़ा है। इसका सीधा असर उन तकनीकी और मानवीय सहयोग की परियोजनाओं पर भी पड़ा जिनका राजनीति से कोई सीधा संबंध नहीं होना चाहिए था।
बंगाल की खाड़ी बहु-क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग पहल यानी बिम्सटेक ने कुछ हद तक यह जगह भरने की कोशिश की है, और आपदा प्रबंधन इसके प्राथमिकता क्षेत्रों में शामिल भी है। लेकिन बयानों और घोषणाओं से आगे बढ़कर ज़मीनी स्तर पर काम करने वाली प्रणाली अब तक विकसित नहीं हो पाई है। बैठकें होती हैं, समझौते होते हैं, लेकिन बाढ़ के मौसम में जब असली परीक्षा की घड़ी आती है, तो हर देश अपने संसाधनों और अपनी सीमित जानकारी के भरोसे ही काम करता है।
एक बड़ी समस्या यह भी है कि नदी जल और बांध संबंधी आंकड़ों को कई देश रणनीतिक रूप से संवेदनशील मानते हैं। भारत और नेपाल के बीच कोसी और गंडक बैराजों को लेकर वर्षों से सहयोग है, लेकिन यह सहयोग अक्सर तकनीकी विवादों और राजनीतिक अविश्वास की भेंट चढ़ जाता है। भारत और बांग्लादेश के बीच भी नदी जल बंटवारे से जुड़े मुद्दे कई बार तकनीकी सहयोग की राह में रोड़ा बन जाते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि बाढ़ पूर्वानुमान के लिए ज़रूरी वर्षा और जल स्तर का डेटा साझा करना किसी सामरिक हित को खतरे में नहीं डालता, बल्कि लाखों लोगों की जान बचा सकता है।
यह कहना गलत होगा कि तकनीकी क्षमता की कमी है। उपग्रह आधारित मौसम पूर्वानुमान, वास्तविक समय जल स्तर मॉनिटरिंग और आपदा चेतावनी प्रणालियां आज पहले से कहीं अधिक सटीक और सुलभ हैं। भारत का केंद्रीय जल आयोग बाढ़ पूर्वानुमान का काफी अच्छा काम करता है, लेकिन इसका दायरा मुख्यतः घरेलू सीमाओं तक सीमित है। ज़रूरत इस बात की है कि यह तकनीकी क्षमता एक साझा क्षेत्रीय ढांचे के भीतर काम करे, जहां नेपाल में हुई बारिश की जानकारी स्वतः और तुरंत बिहार और बांग्लादेश के आपदा प्रबंधन तंत्र तक पहुंचे।
समाधान जटिल नहीं है, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी असली बाधा है। पहला कदम यह हो सकता है कि नदी बेसिन स्तर पर एक तकनीकी, गैर-राजनीतिक डेटा साझाकरण तंत्र बनाया जाए, जो कूटनीतिक तनावों से अलग रखा जाए। दूसरा, स्थानीय स्तर पर सीमा पार समुदायों के बीच सीधे संपर्क और पूर्व चेतावनी नेटवर्क विकसित किए जाएं, ताकि सरकारी लालफीताशाही की प्रतीक्षा न करनी पड़े। तीसरा, बिम्सटेक जैसे मंचों को केवल सम्मेलनों तक सीमित न रखकर उन्हें ठोस, बजट-समर्थित परियोजनाओं में बदला जाए।
बाढ़ का पानी जब सीमाएं नहीं मानता, तो उससे निपटने की योजना सीमाओं में क्यों बंधी रहे। दक्षिण एशिया के करोड़ों लोगों की सुरक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि क्या इस क्षेत्र के देश अपनी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से ऊपर उठकर एक साझा, वैज्ञानिक और मानवीय दृष्टिकोण अपना सकते हैं। जब तक ऐसा नहीं होता, हर मानसून के साथ यही कहानी दोहराई जाती रहेगी—नदियां सीमाएं पार करेंगी, और लोग अपनी जान गंवाते रहेंगे, जबकि योजनाएं कागज़ों में ही सिमटी रहेंगी।