भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः नेपाल और तिब्बत की सीमा पर हिमालयी क्षेत्र में आई प्रलयंकारी बाढ़ ने एक बार फिर यह याद दिला दिया है कि प्रकृति के आगे मनुष्य की तमाम तकनीकी उपलब्धियां कितनी छोटी पड़ जाती हैं। ग्लेशियर के अचानक टूटने से उपजी इस आपदा ने न केवल सैकड़ों जिंदगियां लील लीं, बल्कि तीन हजार से अधिक लोगों को लापता कर दिया है। यह आंकड़ा अपने आप में इतना विशाल है कि इसकी गहराई को समझने के लिए थोड़ा ठहरकर सोचना पड़ता है—तीन हजार परिवार, तीन हजार कहानियां, और हर एक के पीछे इंतजार करते हुए कुछ चेहरे, जो अपने प्रियजनों की खबर पाने के लिए बेचैन हैं।
अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण संस्था के अनुसार, यह आपदा नेपाल-चीन सीमा पर हिमालय की ऊंचाइयों पर एक हिमनद के अचानक टूट जाने के कारण हुई। इस टूटन से उत्पन्न मलबे और कीचड़ का सैलाब बुधवार सुबह इतनी तेजी और ताकत के साथ नीचे की ओर बहा कि रास्ते में आने वाला सब कुछ अपने साथ बहा ले गया। नेपाल के आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार, इस हादसे में सबसे अधिक प्रभावित रसुवा और नुवाकोट जिले हुए, जहां जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े ग्यारह स्थलों पर काम कर रहे सैकड़ों मजदूर इस विनाश की चपेट में आ गए। अकेले जलविद्युत परियोजनाओं में काम करने वाले नौ सौ से अधिक कर्मी लापता बताए जा रहे हैं, जिनमें नेपाल, भारत, दक्षिण कोरिया और चीन के नागरिक शामिल हैं।
इस त्रासदी की एक और परत तब सामने आई जब पता चला कि तिब्बत स्थित पवित्र कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर गए सैकड़ों तीर्थयात्री और ट्रेकर भी इस आपदा की जद में आ गए। सद्गुरु के नेतृत्व वाले ईशा फाउंडेशन ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि उनके समूह के अस्सी सदस्य इस क्षेत्र में यात्रा पर थे, और आव्रजन कार्यालय के आसपास के इलाके से किसी के जीवित बचे होने के संकेत फिलहाल नहीं मिल रहे। यह जानकारी उन तमाम परिवारों के लिए बेहद पीड़ादायक है जो अभी भी उम्मीद का दामन थामे हुए हैं।
राहत और बचाव कार्यों की सबसे बड़ी उम्मीद इस समय त्रिशूली 3ए जलविद्युत परियोजना की उस सुरंग पर टिकी है, जहां सौ से अधिक मजदूरों के फंसे होने की आशंका है। शनिवार देर रात नेपाली सेना को इस सुरंग में एक छोटा सा छेद बनाने में सफलता मिली, जिसके माध्यम से तुरंत हवा पहुंचाने का काम शुरू कर दिया गया। नेपाल के गृह मंत्री सुदन गुरुंग ने बताया कि छोटे से छिद्र के जरिए हवा भेजने का काम शुरू हो चुका है और अब खुदाई कर बचाव दल को भीतर भेजने की तैयारी की जा रही है। यह खबर भले ही छोटी लगे, लेकिन उन परिवारों के लिए यह किसी संजीवनी से कम नहीं जिनके अपने अभी भी मलबे और कीचड़ के बीच फंसे हो सकते हैं।
हालांकि यह बचाव अभियान आसान नहीं रहा। रविवार तड़के हुई बारिश और नदी का बढ़ता जलस्तर खुदाई वाले स्थान को फिर से पानी से भर गया, जिससे कुछ समय के लिए काम रोकना पड़ा। मौसम में सुधार के बाद टीमों ने दोबारा काम शुरू किया। इसी बीच चिलिमे जलविद्युत परियोजना जैसे अन्य स्थलों पर स्थिति कहीं अधिक विकट बनी हुई है, जहां सुरंग पूरी तरह कीचड़ से भर चुकी है और फिलहाल वहां प्रवेश कर पाना असंभव माना जा रहा है। वहां के अधिकारियों ने बताया कि अब चट्टान पर चढ़ने में दक्ष विशेष बचाव दल को बुलाने की तैयारी चल रही है।
इस पूरे संकट में एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि हिमस्खलन और भूस्खलन से बनी नई झीलें आगे और बाढ़ का खतरा पैदा कर रही हैं। तिब्बत के ग्यिरोंग क्षेत्र में तो एक नई झील बनने के जोखिम के चलते चीनी बचाव दलों को अस्थायी रूप से सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करना पड़ा। यह दर्शाता है कि आपदा अभी पूरी तरह टली नहीं है और बचाव कार्यों के साथ-साथ आगे की सुरक्षा को लेकर भी सतर्कता बरतनी होगी।
इस राष्ट्रीय आपदा के समय नेपाल और चीन ने आपसी सहयोग की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच उपग्रह और जल-मौसम संबंधी आंकड़े साझा करने पर सहमति बनी है, जो सीमा पार आपदा प्रबंधन के लिए एक सकारात्मक संकेत है। भारत ने भी चिकित्सा दल सहित सहायता भेजी है, और नेपाल सरकार ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भारी उपकरण, ड्रोन तकनीक और फोरेंसिक जांच किट जैसी विशेष सहायता की अपील की है, ताकि शवों की पहचान और बचाव कार्य में तेजी लाई जा सके।
यह आपदा एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी और जलवायु परिवर्तन के गहराते खतरों की ओर इशारा करती है। दुनिया भर में तेजी से पिघलते ग्लेशियर ऐसी आपदाओं के जोखिम को लगातार बढ़ा रहे हैं, और यह घटना इस बात की चेतावनी है कि पहाड़ी क्षेत्रों में बड़े पैमाने की परियोजनाओं और मानव बस्तियों की योजना बनाते समय जलवायु जोखिमों को कहीं अधिक गंभीरता से लेने की जरूरत है। फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता उन जिंदगियों को बचाना है जो अभी भी मलबे के नीचे सांसें गिन रही हैं, और पूरी दुनिया की निगाहें उस छोटे से हवा के पाइप पर टिकी हैं जो शायद कई परिवारों के लिए उम्मीद की आखिरी किरण साबित हो।