भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः जिस देश की छवि दुनिया के सामने चमकाने की कोशिश की जा रही हो, उसी देश की राजधानी के सबसे भव्य होटलों की रसोई में जब तिलचट्टे रेंगते मिलें, मक्खियाँ पेस्ट्री पर मंडराती दिखें और महीनों पुरानी मिठाइयाँ ग्राहकों को परोसने के इंतज़ार में पड़ी मिलें, तो यह केवल दो होटलों की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था के लिए एक चेतावनी है। दिल्ली के एयरोसिटी इलाके में स्थित आंदाज़ दिल्ली बाय हयात और जेडब्ल्यू मैरियट न्यू डिल्ली — दोनों ही अगले महीने होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए विदेशी मेहमानों की मेज़बानी के वास्ते बुक किए गए हैं — अब भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की सख्त निगरानी के दायरे में आ गए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक इन दोनों पंचसितारा होटलों में हुई जांच में जो कुछ सामने आया है, वह किसी आम रेस्तरां की बात होती तो चौंकाने वाली लगती, लेकिन यहां तो सवाल राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जुड़ा है।
22 जून को हुई आंदाज़ दिल्ली की जांच में शाकाहारी और मांसाहारी खाद्य पदार्थों के लिए अलग-अलग व्यवस्था न होने की गंभीर खामी पाई गई। चौंकाने वाली बात यह रही कि शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह के कटिंग बोर्ड एक ही पानी के टब में रखे मिले, जो क्रॉस-कंटैमिनेशन यानी संक्रमण फैलने का सीधा खतरा है। इतना ही नहीं, कन्फेक्शनरी सेक्शन से करीब 87 किलोग्राम एक्सपायर हो चुकी मिठाइयां बरामद हुईं, जिन्हें मौके पर ही नष्ट करना पड़ा। पेस्ट्री सेक्शन में एक्सपायर हो चुका केक बेस मिला, और वहां भी मक्खियां व तिलचट्टे मौजूद थे। बेकरी क्षेत्र में जरूरी एफएसएसएआई लाइसेंस और अनुमोदन तक नदारद पाए गए, और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर लेबलिंग की अनियमितताएं भी दर्ज की गईं। घी, मेयोनीज़, दाल और सॉस के नमूने जांच के लिए एकत्र किए गए हैं।
24 और 25 अगस्त को हुई जेडब्ल्यू मैरियट की जांच तो और भी गंभीर निकली, जहां कुल 59 खामियां दर्ज की गईं। होटल के रेस्तरां 'के3' में परोसे जाने वाले पानी में कणों की मौजूदगी पाई गई। भारतीय और बेकरी रसोई में तिलचट्टे और सब्जी अनुभाग में फल-मक्खियां देखी गईं। एक वाकया तो और भी अजीब रहा — झींगे से भरे एक कंटेनर पर 'जूस' लिखा था, जबकि जूस के कंटेनर पर 'झींगा' लिखा हुआ था, जो न सिर्फ खाद्य सुरक्षा बल्कि मूलभूत लापरवाही की भी मिसाल है। कर्मचारियों की स्वच्छता पर भी सवाल उठे — बिना हेयरनेट और दस्ताने के भोजन संभालते कई कर्मचारी मिले, और एक कर्मचारी तो खुले घाव के बावजूद खाना पका रहा था। भंडारण क्षेत्रों में सड़े हुए सेब और टमाटर मिले, कई कूड़ेदान बिना ढक्कन के उफान पर थे, टाइलें टूटी हुई थीं, उपकरण खराब पड़े थे और फ्रिज-फ्रीजर में पानी का रिसाव हो रहा था।
अब सवाल यह उठता है कि जिन होटलों की चमक-दमक और भारी-भरकम टैरिफ की चर्चा आम है, वहां इतनी बुनियादी लापरवाही कैसे संभव हो पाई? जवाब शायद इतना जटिल नहीं है। हमारे देश में बड़े ब्रांड और नामी संस्थान अक्सर इस भरोसे पर चलते हैं कि उनकी प्रतिष्ठा ही उनकी गुणवत्ता की गारंटी है, और नियमित निरीक्षण महज़ औपचारिकता बनकर रह जाता है। जब तक कोई बड़ा आयोजन सिर पर न आए, तब तक जांच एजेंसियां भी शायद ही इतनी सक्रियता दिखाती हैं। यह विडंबना ही है कि ब्रिक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय आयोजन की वजह से यह पड़ताल हुई, वरना यह गंदगी शायद महीनों या सालों तक ढकी रहती और आम ग्राहक बिना जाने-समझे इसी रसोई का बना खाना खाते रहते।
यह पहली बार नहीं है जब देश के किसी हिस्से में खाद्य सुरक्षा को लेकर इस तरह की शर्मनाक तस्वीर सामने आई हो। इसी महीने महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर स्थित क्रांति चौक के एक प्रतिष्ठान का लाइसेंस भी वहां के खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने रद्द किया था, जहां दुर्गंधयुक्त कटा हुआ पनीर बिना किसी तारीख या समाप्ति चिह्न के रसोई में रखा मिला था। यानी समस्या किसी एक शहर या एक होटल तक सीमित नहीं, बल्कि यह हमारी संपूर्ण खाद्य आपूर्ति शृंखला में व्याप्त एक प्रणालीगत दोष प्रतीत होता है, जिसकी जड़ें कमजोर निगरानी तंत्र, अपर्याप्त जुर्माने और जवाबदेही की कमी में हैं।
यहां सवाल केवल इन दो होटलों की साख का नहीं, बल्कि उस भरोसे का भी है जो हम अपने मेहमानों को, चाहे वे विदेशी राष्ट्राध्यक्ष हों या आम भारतीय पर्यटक, अपनी आतिथ्य-परंपरा पर दिलाते हैं। "अतिथि देवो भव" कहने वाला देश जब अपने मेहमानों को तिलचट्टों और एक्सपायर मिठाइयों के बीच परोसे गए भोजन से रूबरू कराता है, तो यह केवल स्वास्थ्य का नहीं, सांस्कृतिक शर्मिंदगी का भी विषय बन जाता है। एफएसएसएआई ने इन खामियों को दर्ज कर और नमूने जांच के लिए भेजकर सही दिशा में कदम उठाया है, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब इन होटलों पर ठोस कार्रवाई होगी — केवल चेतावनी या मामूली जुर्माने से काम नहीं चलेगा।
बेहतर यही होगा कि ऐसी जांचें किसी सम्मेलन या आयोजन के इंतज़ार में न हों, बल्कि नियमित और अघोषित रूप से हर स्तर के प्रतिष्ठानों में होती रहें — चाहे वह सड़क किनारे का ढाबा हो या पांच सितारा होटल। तभी हम सचमुच यह दावा कर पाएंगे कि हमारी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था केवल कागज़ों पर नहीं, बल्कि ज़मीन पर भी मज़बूत है। फिलहाल तो जो तस्वीर सामने आई है, वह शर्मसार करने वाली है — और यह शर्म सिर्फ दो होटलों की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की है।