भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः भारतीय राजनीति में युवा मतदाता अब हाशिये पर खड़ा दर्शक नहीं रहा। बीते कुछ वर्षों में देश के कई हिस्सों में देखने को मिला असंतोष, बेरोज़गारी को लेकर बढ़ती बेचैनी और सामाजिक न्याय की मांग ने यह साफ़ कर दिया है कि जेन-ज़ी यानी इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में जन्मा युवा वर्ग अब पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को चुनौती देने की स्थिति में आ चुका है। यही वजह है कि अब लगभग सभी बड़े राजनीतिक दल इस वर्ग को साधने में जुट गए हैं, और भारतीय जनता पार्टी इसका ताज़ा उदाहरण है।
भाजपा ने हाल ही में अपनी नई राष्ट्रीय टीम के गठन के तुरंत बाद युवाओं तक पहुंचने के लिए एक विशेष आउटरीच टीम बनाने का फैसला किया है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, नवनियुक्त राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की अध्यक्षता में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में यह निर्णय लिया गया। इस बैठक में पार्टी के नए राष्ट्रीय पदाधिकारियों के साथ संगठन की प्राथमिकताओं पर चर्चा हुई, जिसमें जेन-ज़ी से संवाद को शीर्ष एजेंडे में रखा गया।
इस टीम में स्वयं नितिन नबीन के अलावा पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव स्मृति ईरानी और विनोद तावड़े को शामिल किया गया है। इनके साथ गुजरात के मंत्री हर्ष सांघवी और छत्तीसगढ़ के मंत्री ओपी चौधरी को भी इस पहल का हिस्सा बनाया गया है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि इसके अतिरिक्त कई अन्य वरिष्ठ और युवा नेताओं को भी इस अभियान से जोड़ा जाएगा, ताकि संगठनात्मक अनुभव और युवा नेतृत्व का संतुलन बना रहे।
गौरतलब है कि स्मृति ईरानी को हाल ही में पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त किया गया है, जबकि विनोद तावड़े लगातार इस पद पर बने हुए हैं। भाजपा के नए राष्ट्रीय पदाधिकारियों की सूची में बीएल संतोष संगठन महासचिव के रूप में बरकरार रहे हैं, वहीं सुनील बंसल भी महासचिव पद पर कायम हैं। बिप्लब कुमार देब, सतीश पूनिया, गजेंद्र पटेल, हरीश द्विवेदी और संजय भाटिया को भी नए महासचिवों के रूप में शामिल किया गया है। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को अतिरिक्त जिम्मेदारी देते हुए पार्टी का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाया गया है।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, यह आउटरीच कार्यक्रम जल्द शुरू किया जाएगा, हालांकि अभी इसकी तारीख़, स्वरूप और शहरों की सूची तय नहीं हुई है। इस पहल का मक़सद केवल पारंपरिक राजनीतिक संवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके ज़रिए युवाओं की आकांक्षाओं, चिंताओं और अपेक्षाओं को सीधे तौर पर समझने की कोशिश की जाएगी। साथ ही युवाओं को एक ऐसा मंच दिया जाएगा जहां वे सीधे भाजपा नेताओं से संवाद कर अपनी बात रख सकें और पार्टी की नीतियों तथा विचारधारा से जुड़ सकें।
भाजपा की इस पहल को महज़ एक संगठनात्मक कवायद के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह उस व्यापक राजनीतिक हलचल का हिस्सा है जो पूरे देश में युवा मतदाताओं को लेकर मची हुई है। कांग्रेस भी इसी दिशा में सक्रिय है और राहुल गांधी की अगुवाई में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम कोटा, देहरादून और प्रयागराज के बाद अब पुणे में आयोजित किया जा रहा है। इस तरह देखा जाए तो सत्तारूढ़ दल और मुख्य विपक्षी दल, दोनों ही यह मान चुके हैं कि आने वाले चुनावों की दिशा तय करने में युवा वर्ग की भूमिका निर्णायक होने वाली है।
नितिन नबीन का राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में चुना जाना खुद इस बदलाव का संकेत है। महज़ पैंतालीस वर्ष की आयु में यह ज़िम्मेदारी संभालने वाले नबीन बिहार की राजनीति से निकले हैं और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के ज़रिए सार्वजनिक जीवन में आए थे। पांच बार विधायक रह चुके नबीन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और वरिष्ठ नेता नितिन गडकरी का समर्थन मिला था। उनकी नियुक्ति को पार्टी के भीतर एक सोची-समझी पीढ़ीगत बदलाव की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिसका सीधा संबंध आगामी लोकसभा चुनावों की तैयारी से जोड़ा जा रहा है।
भारत की जनसांख्यिकी को देखते हुए यह रणनीति स्वाभाविक भी लगती है। देश की आबादी का बड़ा हिस्सा युवा है, और यह वर्ग अब सोशल मीडिया, रोज़गार के अवसरों, शिक्षा की गुणवत्ता और सामाजिक बराबरी जैसे मुद्दों पर मुखर होकर अपनी राय रखने लगा है। बीते कुछ समय में देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में युवाओं द्वारा किए गए आंदोलनों ने यह संदेश दिया है कि यह पीढ़ी पारंपरिक राजनीतिक भाषा से संतुष्ट होने वाली नहीं है। वह सीधे संवाद, पारदर्शिता और ठोस नतीजों की मांग करती है।
ऐसे में भाजपा की जेन-ज़ी आउटरीच टीम का गठन इस बात का प्रमाण है कि पार्टी इस बदलती राजनीतिक ज़मीन को गंभीरता से ले रही है। हालांकि असली परीक्षा तब होगी जब यह कार्यक्रम ज़मीन पर उतरेगा — क्या यह केवल एक और राजनीतिक संचार अभियान बनकर रह जाएगा, या यह वाकई युवाओं की चिंताओं को नीतिगत स्तर पर संबोधित करने का माध्यम बनेगा। संगठनात्मक अनुभव और युवा चेहरों के मेल से बनी यह टीम आने वाले महीनों में जो रणनीति अपनाएगी, उसी से यह तय होगा कि भारत का यह उभरता हुआ, मुखर और अक्सर नाराज़ युवा वर्ग सचमुच एक स्थायी राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हो पाता है या नहीं।
कुल मिलाकर, यह स्पष्ट संकेत है कि आने वाले चुनावी मुक़ाबलों में जेन-ज़ी मतदाता केंद्रीय भूमिका निभाने जा रहा है, और सत्तारूढ़ तथा विपक्षी, दोनों खेमे इस सच्चाई को स्वीकार कर अपनी रणनीतियां उसी अनुरूप ढाल रहे हैं।