भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने आखिरकार अपनी नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा कर दी है, और इसके साथ ही पार्टी के भीतर बदलाव की जो अटकलें महीनों से चल रही थीं, वे अब हकीकत में बदल गई हैं। जनवरी में जगत प्रकाश नड्डा के उत्तराधिकारी के रूप में कार्यभार संभालने के करीब सात महीने बाद आई यह टीम केवल नामों की सूची भर नहीं है, बल्कि यह पार्टी की आगामी रणनीति, नेतृत्व की प्राथमिकताओं और आंतरिक शक्ति-संतुलन का स्पष्ट संकेत भी देती है। इस पुनर्गठन में सबसे ज्यादा चर्चा दो बातों की हो रही है—स्मृति ईरानी और राम माधव की सशक्त वापसी, और अमित मालवीय का पार्टी के आईटी सेल प्रमुख पद से हटाया जाना।
नई टीम में तेरह राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, आठ राष्ट्रीय महासचिव और सोलह मोर्चा अध्यक्षों सहित तमाम पदाधिकारी शामिल किए गए हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है, जो उनकी सक्रिय राजनीति में मजबूत वापसी मानी जा रही है। वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य रहे राम माधव को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। राम माधव पहले भी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रह चुके हैं, इसलिए उनकी यह नियुक्ति संगठन और संघ के बीच तालमेल को और गहरा करने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है। पूर्व त्रिपुरा मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब को भी राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है, जबकि पूर्व उत्तराखंड मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पूर्व राजस्थान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया, बैजयंत जय पांडा, रेखा वर्मा और तारिक मंसूर जैसे नेता भी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के तौर पर अपनी जगह बनाए रखने में सफल रहे हैं। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को पार्टी का कोषाध्यक्ष बनाया गया है, जबकि तरुण चुघ को केंद्रीय कार्यालय प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है। बी.एल. संतोष संगठन महासचिव के पद पर बने रहेंगे, और विनोद तावड़े व सुनील बंसल भी राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर अपनी भूमिका जारी रखेंगे।
इस पूरे फेरबदल में सबसे ज्यादा नजरें अमित मालवीय पर टिकी थीं, और नतीजा साफ है—उन्हें पार्टी के आईटी सेल प्रमुख की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया है। यह बदलाव ऐसे वक्त पर हुआ है जब हाल के दिनों में देश भर में हुए जेन-जेड प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि रही है, और माना जा रहा है कि पार्टी अपनी डिजिटल रणनीति और सोशल मीडिया की मौजूदगी को नए सिरे से गढ़ना चाहती है। मालवीय की जगह छत्तीसगढ़ के दीपक म्हस्के को जिम्मेदारी दी गई है, हालांकि अब आईटी सेल की जगह इसे सोशल मीडिया विभाग के रूप में पुनर्गठित किया गया है और म्हस्के को इसका संयोजक बनाया गया है। मीडिया प्रभारी के तौर पर अनिल बलूनी अपनी भूमिका में बने रहेंगे, इसलिए संचार मोर्चे पर पूरी तरह उलटफेर नहीं हुआ है, बल्कि डिजिटल शाखा को लेकर ही निर्णायक कदम उठाया गया है।
मोर्चा संगठनों में भी बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। लोकसभा सांसद तेजस्वी सूर्या को युवा मोर्चा अध्यक्ष पद से हटाकर गुजरात के हेमांग जोशी को यह जिम्मेदारी दी गई है। महिला मोर्चा की कमान वनथी श्रीनिवासन से लेकर छत्तीसगढ़ की रूप कुमारी चौधरी को सौंपी गई है। ओबीसी मोर्चा में राज्यसभा सांसद के. लक्ष्मण की जगह उत्तर प्रदेश के अमरपाल मौर्य को नया अध्यक्ष बनाया गया है, जबकि अल्पसंख्यक मोर्चा में जमाल सिद्दीकी की जगह उत्तर प्रदेश के ही कुंवर बासित अली को जिम्मेदारी दी गई है। इसके अलावा राष्ट्रीय सचिवों की सूची में के. कविता पाटीदार, के. सुरेंद्रन, भोला सिंह, प्रदीप वर्मा, फांगनोन कोन्याक, अनिल एंटनी, संदीप पाठक और मनोज तिग्गा जैसे नाम शामिल हैं, जो अलग-अलग राज्यों और सामाजिक पृष्ठभूमियों का प्रतिनिधित्व करते नजर आते हैं। उत्तर प्रदेश से हरीश द्विवेदी जैसे कई नेताओं को भी नई टीम में जगह मिली है।
पार्टी और संघ सूत्रों के मुताबिक, इस नई टीम को अंतिम रूप देने से पहले भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व और आरएसएस के बीच कई दौर की बातचीत हुई, ताकि टीम में एक "युवा चेहरे" की झलक बनी रहे और यह राष्ट्रीय अध्यक्ष नबीन के साथ तालमेल बिठाकर काम कर सके। इस दृष्टि से देखें तो यह टीम केवल वरिष्ठ नेताओं को समायोजित करने की कवायद नहीं है, बल्कि इसमें अनुभव और नई ऊर्जा के बीच एक सोचा-समझा संतुलन बनाने की कोशिश साफ झलकती है।
कुल मिलाकर, नितिन नबीन की यह पहली बड़ी संगठनात्मक परीक्षा है, और उन्होंने इसमें अनुभवी चेहरों को वापस लाकर, कुछ नई जिम्मेदारियां सौंपकर और डिजिटल मोर्चे पर बदलाव करके यह संकेत दिया है कि पार्टी आने वाले राज्यों के चुनावों और 2029 की लोकसभा लड़ाई के लिए अभी से रणनीतिक तैयारी में जुट गई है। स्मृति ईरानी और राम माधव जैसे अनुभवी नेताओं की वापसी जहां पार्टी के पुराने आधार को मजबूती देने का संकेत है, वहीं अमित मालवीय को हटाया जाना यह दिखाता है कि हाल के जनांदोलनों और बदलती सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए पार्टी अपनी संचार रणनीति में गंभीर बदलाव के लिए तैयार है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह नई टीम जमीन पर कितनी असरदार साबित होती है और नबीन अपने नेतृत्व की छाप कितनी गहराई से छोड़ पाते हैं।