भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर देश के युवाओं की नब्ज टटोलने की कोशिश की है। मौका था आईआईटी दिल्ली के 57वें दीक्षांत समारोह का, जहाँ तीन हज़ार से अधिक विद्यार्थी—जिनमें पाँच सौ से ज़्यादा पीएचडी शोधार्थी भी शामिल थे—अपनी डिग्रियाँ लेकर जीवन के एक नए अध्याय की दहलीज़ पर खड़े थे। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने जो बात कही, वह किसी औपचारिक भाषण से कहीं आगे जाकर एक पीढ़ी की सोच को दिशा देने वाली प्रतीत होती है—"सवाल उठाइए, लेकिन सिर्फ सवाल पूछकर मत रुकिए, उनका समाधान खोजने का साहस भी रखिए।"
यह वाक्य जितना सरल सुनाई देता है, उतना ही गहरा इसका अर्थ है। आज के दौर में सवाल पूछना कोई कठिन काम नहीं रह गया है। सोशल मीडिया के इस युग में हर मुद्दे पर, हर नीति पर, हर घटना पर टिप्पणी करना, आलोचना करना और सवाल दागना बेहद आसान हो गया है। लेकिन असली चुनौती वहाँ से शुरू होती है जहाँ सवाल पूछने के बाद उसका उत्तर खोजने की ज़िम्मेदारी उठानी पड़ती है। प्रधानमंत्री का यह कथन युवाओं को केवल आलोचक बनने से आगे बढ़कर समाधानकर्ता बनने की प्रेरणा देता है, और यही वह मूल भावना है जो किसी भी तकनीकी संस्थान से निकलने वाले इंजीनियरों और वैज्ञानिकों के लिए सबसे ज़्यादा प्रासंगिक भी है।
समारोह की शुरुआत में ही मोदी ने माहौल को हल्का-फुल्का बनाते हुए विद्यार्थियों से सीधा संवाद स्थापित किया। उन्होंने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा कि वे बाबा बागेश्वर तो नहीं हैं, फिर भी हर विद्यार्थी के मन में कुछ न कुछ ज़रूर चल रहा होगा। इस टिप्पणी पर सभागार में हँसी की लहर दौड़ गई, लेकिन इसके पीछे छिपा संदेश गंभीर था—हर स्नातक का सपना अलग है, हर किसी की राह जुदा है, कोई पहली नौकरी के उत्साह में है तो कोई स्टार्टअप शुरू करने की योजना बना रहा है, कोई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटने वाला है। फिर भी, इन सबके बीच एक भावना समान रूप से मौजूद है—संस्थान से विदा लेते समय उमड़ने वाला वह मिला-जुला जज़्बा, जिसमें संतोष भी है और नई शुरुआत की बेचैनी भी।
प्रधानमंत्री ने विद्यार्थियों को यह भी याद दिलाया कि किसी भी बड़ी उपलब्धि के पीछे शिक्षकों, मार्गदर्शकों और सहयोगी स्टाफ की अनदेखी भूमिका होती है। उन्होंने स्नातकों से आग्रह किया कि वे पीछे मुड़कर देखें और उन सभी का आभार व्यक्त करें जिन्होंने उन्हें गढ़ने में अपना योगदान दिया। यह बात केवल शिष्टाचार भर नहीं थी, बल्कि एक गहरी सामाजिक सीख भी थी—सफलता कभी अकेले नहीं मिलती, उसके पीछे हमेशा एक पूरा तंत्र काम करता है, और उस तंत्र को कृतज्ञता के साथ याद रखना ही सच्ची विनम्रता है।
भाषण का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि प्रधानमंत्री ने बदलती वैश्विक परिस्थितियों और तेज़ी से बदलती तकनीक को आज के दौर की सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़े अवसर, दोनों के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि आज कोई नहीं जानता कि बीस-तीस साल बाद दुनिया कैसी होगी, इसलिए जीवन में जिज्ञासा बनाए रखना और सीखने की प्रवृत्ति को कभी कम न होने देना ही सफलता की कुंजी है। जो सीखता रहेगा, वही आगे बढ़ेगा—यह संदेश केवल विद्यार्थियों के लिए नहीं, बल्कि समूचे समाज के लिए एक मार्गदर्शक सूत्र की तरह है।
इसके साथ ही मोदी ने युवाओं को विकसित भारत के सपने से जोड़ते हुए कहा कि जितना मज़बूत युवा वर्ग होगा, उतना ही सशक्त राष्ट्र बनेगा। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे उभरते क्षेत्रों का ज़िक्र करते हुए बताया कि किस तरह भारत ने इन क्षेत्रों में ठोस कदम बढ़ाए हैं। सेमीकंडक्टर क्षेत्र का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जब सरकार ने इस दिशा में पहल की थी, तब कई लोगों को संदेह था, लेकिन आज देश के पहले सेमीकंडक्टर संयंत्र में उत्पादन शुरू हो चुका है। उनका विश्वास था कि आने वाले समय में चिप से लेकर जहाज़ तक, सब कुछ भारतीय हाथों से ही निर्मित होगा।
बड़ी चुनौतियों से न घबराने की सलाह देते हुए प्रधानमंत्री ने एक व्यावहारिक सूत्र भी सुझाया—जब भी कोई समस्या विशाल दिखे, तो उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट लेना चाहिए। यह दृष्टिकोण न केवल तकनीकी समस्याओं के समाधान में सहायक है, बल्कि जीवन की किसी भी जटिल परिस्थिति से निपटने का एक व्यावहारिक तरीका भी है। इसी संदर्भ में उन्होंने यह भी जोड़ा कि जो लोग नई परिस्थितियों और चुनौतियों के लिए खुले रहते हैं, वही चुनौतियों को अवसर में बदल पाते हैं, और यही सीख आईआईटी जैसे संस्थानों में दी जाती है।
समारोह में मोदी ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में यह टिप्पणी भी की कि पदक पाने वाले विद्यार्थियों में बेटियों की संख्या और अधिक होती तो बेहतर होता। यह टिप्पणी भले ही सहज बातचीत का हिस्सा लगे, पर यह शिक्षा और तकनीकी क्षेत्र में लैंगिक समानता की दिशा में अभी भी बाकी लंबी राह की ओर इशारा करती है।
कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री का यह संबोधन केवल एक औपचारिक दीक्षांत भाषण नहीं था, बल्कि युवा पीढ़ी से एक ईमानदार संवाद स्थापित करने का प्रयास था। सवाल उठाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक है, परंतु समाधान खोजना ज़िम्मेदार नागरिकता की पहचान है। यदि देश के प्रतिभाशाली युवा इस भावना को आत्मसात कर लें, तो निश्चित ही विकसित भारत का सपना केवल नारा नहीं, बल्कि एक सामूहिक संकल्प बनकर साकार होगा।