Friday, July 31, 2026
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संपादकीय

मेटा इंडिया प्रमुख के विरुद्ध केस: तकनीकी कंपनियों और सरकार के बीच बढ़ता टकराव

July 31, 2026 07:29 PM

 

भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः  हैदराबाद पुलिस ने मेटा इंडिया के प्रमुख अरुण श्रीनिवास के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है। यह मामला फेसबुक पर प्रसारित हुए उन कई वीडियो से जुड़ा है, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कथित तौर पर "अपमानजनक ढंग" से दिखाया गया था। साइबर अपराध शाखा के उपायुक्त वी अरविंद बाबू के अनुसार, पुलिस अब मेटा प्लेटफॉर्म्स को औपचारिक नोटिस भेजने की तैयारी कर रही है, हालांकि शुक्रवार तक यह नोटिस जारी नहीं हुआ था। मेटा की ओर से इस पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। यह भी स्पष्ट नहीं हो सका कि किसी वैश्विक तकनीकी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी के विरुद्ध व्यक्तिगत रूप से केस दर्ज करने का यह असामान्य कदम आखिर क्यों उठाया गया।

यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब प्रधानमंत्री मोदी को हाल के वर्षों की सबसे बड़ी युवा-नेतृत्व वाली विरोध लहर का सामना करना पड़ रहा है। यह आंदोलन राष्ट्रीय परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने के मुद्दे पर शुरू हुआ था, जिसके चलते केंद्रीय शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। इन्हीं विरोध प्रदर्शनों के बीच सोशल मीडिया पर मोदी को लेकर आलोचना, व्यंग्य और मज़ाक की बाढ़ सी आ गई थी। इसी सप्ताह की शुरुआत में केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने मेटा के अधिकारियों को तलब किया था, क्योंकि फेसबुक ने कथित तौर पर मोदी की एक पोस्ट को कुछ समय के लिए प्रतिबंधित कर दिया था। यह वह पहली पोस्ट थी जिसमें मोदी ने छात्रों के बड़े पैमाने पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों पर सीधे प्रतिक्रिया दी थी। एक शीर्ष सरकारी अधिकारी ने कहा था कि सरकार चाहती है कि कंपनी इस मामले पर सबसे ऊंचे स्तर पर स्पष्टीकरण दे। उस समय मेटा के एक प्रवक्ता ने सफाई देते हुए कहा था कि यह पोस्ट अनजाने में ही अवरुद्ध हो गई थी।

यह मामला मेटा और मोदी सरकार के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव की एक और कड़ी है। भारत, फेसबुक का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता आधार वाला बाजार है, और यही वजह है कि यहां प्लेटफॉर्म पर होने वाली किसी भी हलचल का असर कहीं अधिक व्यापक होता है। मेटा को पहले भी भारत सरकार की नाराज़गी झेलनी पड़ी है, खासकर उन आरोपों के चलते कि कंपनी अपने प्लेटफॉर्म्स फेसबुक और इंस्टाग्राम पर नफरत भरे भाषण और गलत सूचना को नियंत्रित करने में पर्याप्त सक्रियता नहीं दिखाती। दूसरी ओर, आलोचकों का यह भी कहना रहा है कि सरकार कई बार सामग्री हटाने के अनुरोधों का इस्तेमाल असहमति को दबाने के लिए करती है।

इस पूरे प्रकरण में सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि केस किसी अज्ञात उपयोगकर्ता या सामग्री निर्माता के बजाय सीधे कंपनी के भारत प्रमुख के नाम पर दर्ज किया गया। आमतौर पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत मध्यस्थ प्लेटफॉर्मों को उपयोगकर्ताओं द्वारा डाली गई सामग्री के लिए एक निश्चित सुरक्षा कवच मिलता है, बशर्ते वे सरकार या न्यायालय के आदेश पर उचित समय में कार्रवाई करें। किसी वरिष्ठ कार्यकारी अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से नामजद करना एक दुर्लभ और आक्रामक कदम माना जा रहा है, और इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या भविष्य में तकनीकी कंपनियों के स्थानीय प्रमुखों को उपयोगकर्ताओं की सामग्री के लिए व्यक्तिगत जवाबदेही उठानी पड़ेगी।

इस घटनाक्रम को दो नज़रियों से देखा जा सकता है, और दोनों के अपने ठोस तर्क हैं। एक तरफ यह तर्क दिया जा सकता है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में राष्ट्र के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को लक्षित कर अपमानजनक सामग्री का प्रसार करना गंभीर चिंता का विषय है, और यदि मंच इसे रोकने में विफल रहता है तो जवाबदेही तय होनी ही चाहिए। बड़े प्लेटफॉर्मों के पास अरबों उपयोगकर्ता और भारी संसाधन होते हैं, ऐसे में हानिकारक सामग्री की पहचान और उसे हटाने में तेजी लाने की अपेक्षा अनुचित नहीं कही जा सकती।

दूसरी तरफ, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल अधिकारों की पैरवी करने वाले यह सवाल उठाते रहे हैं कि जब आलोचना, व्यंग्य या राजनीतिक असहमति को "अपमानजनक सामग्री" के दायरे में समेट दिया जाता है, तो इसकी सीमा कौन और कैसे तय करेगा। लोकतंत्र में सत्तारूढ़ नेताओं की आलोचना और उन पर व्यंग्य करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सामान्य हिस्सा माना जाता रहा है। ऐसे में किसी तकनीकी कंपनी के प्रमुख के विरुद्ध सीधे आपराधिक कार्यवाही शुरू करना, आलोचकों की नज़र में, प्लेटफॉर्मों पर स्वयं-सेंसरशिप का दबाव बढ़ा सकता है और भविष्य में वे राजनीतिक रूप से संवेदनशील सामग्री को लेकर अत्यधिक सतर्क हो सकते हैं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह मामला ऐसे समय आया है जब देश भर में छात्र आंदोलन तेज है और सत्तारूढ़ दल पर बढ़ते सार्वजनिक दबाव का सामना करने की चुनौती है। ऐसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील दौर में तकनीकी कंपनियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई को लेकर समय और मंशा, दोनों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अंततः यह मामला केवल एक कंपनी और सरकार के बीच के विवाद तक सीमित नहीं रह जाता। यह उस बड़े और वैश्विक बहस का हिस्सा है कि विशाल सोशल मीडिया मंचों की जवाबदेही की सीमाएं क्या होनी चाहिए, और यह जवाबदेही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत पर तो नहीं आ रही। भारत जैसे विशाल और विविध लोकतंत्र में, जहां डिजिटल मंच राजनीतिक संवाद का मुख्य माध्यम बन चुके हैं, यह संतुलन साधना आसान नहीं, लेकिन उतना ही आवश्यक भी है। आने वाले दिनों में देखना यह होगा कि मेटा इस नोटिस पर क्या रुख अपनाती है और मामला अदालत तक पहुंचता है या बातचीत से सुलझ जाता है।

 

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