भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़
देश की न्याय व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली जिला न्यायपालिका के हजारों न्यायिक अधिकारियों के लिए सर्वोच्च न्यायालय का ताज़ा आदेश राहत और उम्मीद की एक नई किरण लेकर आया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे, ने सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे संबंधित उच्च न्यायालयों के परामर्श से इस बात पर विचार करें कि क्या न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु को साठ वर्ष से बढ़ाकर इकसठ वर्ष किया जा सकता है, जबकि इस पूरे मामले पर बासठ वर्ष तक विस्तार के प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय अभी लंबित है। यह विवाद नया नहीं है।
जिला न्यायपालिका के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु को देशभर में समान रूप से साठ से बढ़ाकर बासठ वर्ष करने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने यह अंतरिम व्यवस्था दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जो राज्य इस प्रस्ताव पर सहमत होंगे, वहां के न्यायिक अधिकारी इकसठ वर्ष की आयु तक सेवा में बने रह सकेंगे, परंतु यह व्यवस्था इस कार्यवाही के अंतिम परिणाम पर निर्भर रहेगी। न्यायालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपने-अपने उच्च न्यायालयों से परामर्श कर दो सप्ताह के भीतर अपना रुख स्पष्ट करने को भी कहा है।
गौरतलब है कि यह मामला मूलतः अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ से जुड़े एक व्यापक मुकदमे का हिस्सा है, जिसमें केंद्र सरकार, सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और उच्च न्यायालयों को नोटिस जारी करते हुए इस मौलिक प्रश्न पर विचार मांगा गया था कि क्या जिला न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु साठ से बढ़ाकर इकसठ या बासठ वर्ष की जानी चाहिए। इस बीच मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के पूर्ण न्यायपीठ ने सेवानिवृत्ति आयु को साठ से बढ़ाकर बासठ वर्ष करने की सिफारिश करते हुए प्रस्ताव पारित किया है, जबकि पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय सहित कुछ अन्य उच्च न्यायालयों ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए यह तर्क दिया है कि उनके संबंधित राज्यों में अन्य सरकारी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु साठ वर्ष या उससे कम ही है। इसी असमानता और मतभेद को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इस विषय को शीघ्र सुलझाने की आवश्यकता जताई है।
यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि देश में न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर सेवानिवृत्ति आयु में पहले से ही असमानता विद्यमान है। जहां सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश पैंसठ वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते हैं, वहीं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के लिए यह आयु बासठ वर्ष निर्धारित है। ऐसे में जिला न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों को साठ वर्ष की आयु में ही सेवानिवृत्त कर देना, जबकि वे शारीरिक व मानसिक रूप से पूर्णतः सक्षम और अनुभवसंपन्न होते हैं, न्यायोचित प्रतीत नहीं होता। यह विसंगति लंबे समय से न्यायिक क्षेत्र में चर्चा का विषय रही है, और इसे दूर करने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय का यह हस्तक्षेप निश्चित रूप से सराहनीय है। इस मुद्दे के कई आयाम हैं जिन पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है। एक ओर, अनुभवी न्यायिक अधिकारियों की सेवाएं एक या दो वर्ष अतिरिक्त मिलने से लंबित मुकदमों के शीघ्र निस्तारण में सहायता मिल सकती है, विशेष रूप से ऐसे समय में जब देश की अदालतों में करोड़ों मामले वर्षों से लंबित पड़े हैं। अनुभव और दक्षता का यह लाभ न्याय व्यवस्था की गुणवत्ता और गति, दोनों के लिए सकारात्मक सिद्ध हो सकता है।
दूसरी ओर, राज्य सरकारों की यह चिंता भी अनुचित नहीं कही जा सकती कि यदि न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाई जाती है जबकि अन्य सरकारी सेवकों की आयु सीमा साठ वर्ष पर ही स्थिर रहती है, तो इससे प्रशासनिक ढांचे में एक असंगति उत्पन्न हो सकती है, साथ ही नई नियुक्तियों और पदोन्नति के अवसरों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। फिर भी, इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इसे केवल एक प्रशासनिक निर्णय के रूप में न देखते हुए, राज्यों और उच्च न्यायालयों के बीच समन्वय और संवाद के माध्यम से हल करने का मार्ग अपनाया है।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यह अंतरिम व्यवस्था अंतिम कानूनी प्रश्न के निर्णय को प्रभावित नहीं करेगी, अर्थात न्यायालय स्वतंत्र रूप से इस बात का निर्धारण करेगा कि देशभर में यह आयु सीमा एकसमान रूप से कितनी होनी चाहिए। यह दृष्टिकोण संघीय ढांचे की भावना के अनुरूप भी है, जिसमें राज्यों को अपनी विशिष्ट परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी गई है, परंतु साथ ही एकरूपता की दिशा में भी प्रयास जारी है।
वस्तुतः यह मामला केवल आयु सीमा बढ़ाने भर का नहीं है, बल्कि इसके पीछे भारतीय न्याय व्यवस्था में व्याप्त उस गहरी समस्या की झलक भी मिलती है जहां वर्षों के अनुभव के बावजूद योग्य न्यायिक अधिकारियों को समय से पहले सेवा से मुक्त कर दिया जाता है, जबकि दूसरी ओर अदालतों में न्यायाधीशों की भारी कमी बनी रहती है। यदि सभी राज्य और उच्च न्यायालय समयबद्ध ढंग से इस पर सहमति बना लें, तो यह न केवल हजारों अनुभवी न्यायिक अधिकारियों के लिए राहत का विषय होगा, बल्कि आम नागरिकों के लिए भी शीघ्र न्याय की उम्मीद को बल मिलेगा। अब देखना यह है कि विभिन्न राज्य सरकारें और उच्च न्यायालय इस दिशा में कितनी तत्परता दिखाते हैं, और सर्वोच्च न्यायालय अंततः इस दीर्घकालिक विसंगति का स्थायी समाधान कब तक प्रस्तुत करता है।