आधुनिक युद्धकला में ड्रोन तकनीक ने जो क्रांति लाई है, उसे भारत ने भली-भाँति पहचान लिया है। भारत इस वर्ष घरेलू कंपनियों से 2 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के सैन्य ड्रोन का आदेश देने की तैयारी में है, जो अब तक की सबसे बड़ी ऐसी खरीद होगी। यह निर्णय देश के रक्षा, औद्योगिक और रणनीतिक परिदृश्य — तीनों के लिए एक निर्णायक मोड़ इस योजना की जड़ें पिछले वर्ष की उन घटनाओं में हैं जिन्होंने पूरे उपमहाद्वीप को हिला दिया था। मई 2025 में पाकिस्तान के साथ हुई झड़पों में दोनों देशों ने पहली बार बड़े पैमाने पर ड्रोन का उपयोग किया, जिसने कम लागत वाले मानवरहित हवाई वाहनों की आक्रामक क्षमता को स्पष्ट रूप से उजागर किया। ऑपरेशन सिंदूर के बाद किए गए आकलन ने एक चौंकाने वाला तथ्य सामने रखा — ड्रोन ने 40 प्रतिशत मुठभेड़ों में भूमिका निभाई, जो पारंपरिक तोपखाने और लड़ाकू विमानों से कहीं अधिक था। इसके अतिरिक्त, यूक्रेन और ईरान के संघर्षों ने भी इस तकनीक को वैश्विक स्तर पर तेजी से अपनाने की प्रेरणा दी, जिससे लागत घटी और युद्ध की रणनीतियाँ पुनर्परिभाषित हुईं। इन सबक ने भारत को त्वरित और निर्णायक कार्रवाई के लिए प्रेरित किया। ड्रोन फेडरेशन इंडिया के अध्यक्ष स्मित शाह, जिनकी संस्था 550 से अधिक कंपनियों का प्रतिनिधित्व करती है, ने स्पष्ट किया कि अगले चरण में सामरिक ड्रोन की खरीद 200 अरब रुपये यानी 2 अरब डॉलर से अधिक हो सकती है। यह राशि हाल के 30 अरब रुपये के आदेश से कई गुना बड़ी है। इन आदेशों के लिए त्वरित खरीद प्रक्रिया अपनाई जाएगी और 24 महीनों के भीतर आपूर्ति की उम्मीद है। इसके साथ ही, रक्षा मंत्रालय ने मार्च में परिवहन विमान, मिसाइल प्रणाली और सशस्त्र ड्रोन की खरीद के लिए 2.38 लाख करोड़ रुपये के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इस पूरी योजना की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह है कि सभी आदेश घरेलू कंपनियों को दिए जाएंगे। यह 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' की नीति का ठोस प्रमाण है। भारत ने तीन वर्षों के लिए ड्रोन, उनके घटकों, सॉफ्टवेयर, काउंटर-ड्रोन प्रणालियों और सेवाओं के निर्माण को प्रोत्साहित करने हेतु 2,000 करोड़ रुपये का एक प्रोत्साहन कार्यक्रम शुरू करने का निर्णय लिया है, ताकि आयातित घटकों पर निर्भरता कम की जा सके। सेना ने 2027 तक 70 प्रतिशत स्थानीय सामग्री प्राप्त करने का लक्ष्य रखते हुए यूएवी स्वदेशीकरण को प्राथमिकता दी है। भारत वर्तमान में वैश्विक ड्रोन बाजार में 1 प्रतिशत से भी कम की हिस्सेदारी रखता है, जो विशाल विकास के अवसर प्रस्तुत करता है। यह $2 अरब का आदेश घरेलू कंपनियों को वह छलाँग लगाने का मौका देगा जिसका वे वर्षों से इंतजार कर रही थीं। आईजी डिफेंस के कार्यकारी रमेश चंद्र पाढ़ी के शब्दों में, "ड्रोन आधुनिक युद्धक्षेत्र पर बल गुणक हैं।" भारत का यह ऐतिहासिक ड्रोन आदेश केवल एक रक्षा सौदा नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय दृष्टि का प्रतिबिंब है — वह दृष्टि जो भारत को तकनीकी और सामरिक रूप से आत्मनिर्भर देखना चाहती है। युद्ध के औजार और तरीके दोनों बदल गए हैं। जो देश इस बदलाव को जल्दी अपनाएगा, वह न केवल सुरक्षित रहेगा, बल्कि भविष्य की रणनीतिक होड़ में भी आगे रहेगा। भारत ने अपनी दिशा तय कर ली है और इरादा अटल है।