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संपादकीय

न्यायपालिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस : सुप्रीम कोर्ट की सतर्क और दूरदर्शी पहल

June 04, 2026 07:57 PM

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उपयोग को लेकर एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। न्यायालय ने "न्यायालयों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग संबंधी विनियम, 2026" का मसौदा प्रकाशित किया है और 20 जून 2026 तक सभी हितधारकों तथा आम जनता से सुझाव व टिप्पणियाँ आमंत्रित की हैं। यह मसौदा सर्वोच्च न्यायालय की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समिति के तत्वावधान में तैयार किया गया है। इस पहल को केवल एक तकनीकी नियमावली के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह न्यायपालिका की उस गहरी समझ का प्रमाण है जिसमें वह मानती है कि तकनीक का स्वागत तो होना चाहिए, किंतु उसकी लगाम हमेशा मानवीय विवेक के हाथ में रहनी चाहिए। प्रस्तावित विनियम सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों, अधिकरणों और  न्यायिक कार्य करने वाले सांविधिक आयोगों पर लागू होंगे। इनका मूल उद्देश्य है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, न्याय व्यवस्था की सहायक भूमिका में काम करे, न कि निर्णायक की। इस ढाँचे की नींव मानवीय सर्वोच्चता, पारदर्शिता, जवाबदेही, डेटा संरक्षण और न्यायिक स्वतंत्रता जैसे मूल्यों पर रखी गई है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सर्वोच्च न्यायालय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को एक उपकरण मानता है, मालिक नहीं। मसौदे में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के अनुमत उपयोगों की एक विस्तृत सूची दी गई है। मामलों का प्रबंधन, सुनवाई की तारीखें तय करना, वाद-सूची तैयार करना, कार्यवाही का प्रतिलेखन, कानूनी दस्तावेजों का अनुवाद, विधिक शोध, उद्धरणों की जाँच, दस्तावेजों का सारांश तैयार करना, दिव्यांग व्यक्तियों के लिए सुलभता सेवाएँ, निर्णयों और न्यायालय अभिलेखों का अनामीकरण तथा प्रशासनिक कार्यों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग किया जा सकेगा। परंतु इन अधिकांश उपयोगों के लिए पूर्व अनुमति और मानवीय निगरानी अनिवार्य होगी। इस प्रकार का विवेकपूर्ण संतुलन ही इस नीति की सबसे बड़ी शक्ति है। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि मसौदे में कुछ पूर्ण निषेधों का उल्लेख है जो न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रणाली किसी भी मामले में स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं कर सकती। पुनरावृत्ति जोखिम आकलन, जमानत पात्रता, फरार होने के जोखिम का मूल्यांकन या गवाहों की विश्वसनीयता परखने जैसे संवेदनशील कार्यों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस  का उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है। इसके अलावा, पक्षकारों या गवाहों के भविष्य के व्यवहार की भविष्यवाणी करना, न्यायिक अधिकारियों या वादकारियों की निगरानी करना, तथा अपारदर्शी और अस्पष्ट आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रणालियों का उपयोग भी वर्जित रहेगा। ये प्रतिबंध न केवल न्यायोचित हैं, बल्कि आवश्यक भी हैं। न्याय एक मानवीय प्रक्रिया है और इसकी आत्मा को किसी एल्गोरिदम के हाथ नहीं सौंपा जा सकता।  मसौदे में प्रकटीकरण की एक महत्वपूर्ण शर्त भी जोड़ी गई है। यदि कोई पक्षकार या अधिवक्ता आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की सहायता से अर्जी, दस्तावेज या साक्ष्य तैयार करता है, तो उसे इसका खुलासा न्यायालय के समक्ष करना होगा। साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सहायता की प्रकृति और सीमा भी स्पष्ट करनी होगी। इससे न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहेगी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दुरुपयोग की संभावना कम होगी। संस्थागत ढाँचे के रूप में एक स्थायी शीर्ष निकाय के गठन का प्रस्ताव है जिसमें न्यायाधीश, उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश, तकनीकी विशेषज्ञ, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ और प्रौद्योगिकी कानून में दक्ष  अधिवक्ता शामिल होंगे। यह निकाय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस  प्रणालियों के मानक तय करेगा, उन्हें अनुमोदित करेगा और वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करेगा। इसके अतिरिक्त प्रत्येक उच्च न्यायालय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समिति, समर्पित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सचिवालय, नियमित तकनीकी, कानूनी और नैतिक लेखापरीक्षा, घटना रिपोर्टिंग तंत्र तथा न्यायाधीशों, वकीलों और न्यायालय कर्मियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों का प्रावधान किया गया है। यह मसौदा उस समय आया है जब सर्वोच्च न्यायालय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस -निर्मित फर्जी उद्धरणों के खतरे से पहले ही आगाह कर चुका है और केरल तथा गुजरात उच्च न्यायालय जिला न्यायपालिका के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस  दिशा-निर्देश जारी कर चुके हैं। इस पृष्ठभूमि में सर्वोच्च न्यायालय का यह व्यापक और समावेशी प्रयास न्यायिक संस्था की परिपक्वता को दर्शाता है। निष्कर्षतः, यह मसौदा तकनीक और न्याय के बीच एक स्वस्थ सीमा-रेखा खींचने का सराहनीय प्रयास है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस  न्यायपालिका का सेवक हो सकता है, लेकिन उसे कभी न्यायाधीश नहीं बनने दिया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मूल सिद्धांत को अपने मसौदे में जिस स्पष्टता और दृढ़ता से स्थापित किया है, वह भावी पीढ़ियों के लिए एक प्रेरक मिसाल बनेगा।

 

 

 

 

 

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