भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः खेलों की दुनिया में कुछ पल ऐसे आते हैं जो केवल एक पदक की कहानी नहीं होते, बल्कि पूरे राष्ट्र के आत्मविश्वास और गौरव का प्रतीक बन जाते हैं। ग्लासगो में चल रहे राष्ट्रमंडल खेल 2026 के चौथे दिन ऐसा ही एक ऐतिहासिक क्षण देखने को मिला, जब मणिपुर की बेटी साइखोम मीराबाई चानू ने भारोत्तोलन में देश को इस संस्करण का पहला स्वर्ण पदक दिलाया। महिलाओं की 48 किलोग्राम भार वर्ग में उन्होंने न केवल स्वर्ण जीता, बल्कि तीन नए राष्ट्रमंडल खेल रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिए, जिससे यह जीत और भी यादगार बन गई।
इकतीस वर्षीय मीराबाई ने अपने अभियान की शुरुआत थोड़ी मुश्किल भरी की। स्नैच वर्ग में उनका पहला प्रयास 82 किलोग्राम पर असफल रहा, जब वे स्क्वाट के दौरान संतुलन खो बैठीं। लेकिन असली चैंपियन वही होता है जो असफलता से घबराए बिना वापसी करता है। दूसरे प्रयास में उन्होंने वही वजन आसानी से उठा लिया और फिर तीसरे व अंतिम प्रयास में 85 किलोग्राम का बेदाग लिफ्ट करते हुए नया राष्ट्रमंडल खेल रिकॉर्ड स्थापित कर दिया। क्लीन एंड जर्क वर्ग में भी कहानी लगभग वैसी ही रही। पहला प्रयास 105 किलोग्राम पर सफल नहीं हो पाया, मगर दूसरे प्रयास में उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ यह वजन उठाकर स्वर्ण पदक पक्का कर लिया। इस तरह उनका कुल भार 190 किलोग्राम (85 किलोग्राम स्नैच + 105 किलोग्राम क्लीन एंड जर्क) रहा, जो नाइजीरिया की रजत पदक विजेता रूथ आसुक्वो न्योंग से करीब 22 किलोग्राम अधिक था।
रजत पदक नाइजीरिया की खिलाड़ी को 168 किलोग्राम के कुल भार के साथ मिला, जबकि कांस्य पदक मलेशिया की आयरीन जेन हेनरी के हिस्से आया, जिन्होंने 167 किलोग्राम का कुल भार उठाया। यह स्वर्ण पदक मीराबाई चानू के करियर की सबसे शानदार उपलब्धियों में से एक है, क्योंकि इसके साथ ही उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में लगातार तीसरी बार स्वर्ण पदक जीतने की दुर्लभ हैट्रिक पूरी कर ली। इससे पहले उन्होंने 2018 के गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों में और फिर 2022 के बर्मिंघम संस्करण में स्वर्ण पदक अपने नाम किया था। दिलचस्प बात यह है कि उनका राष्ट्रमंडल खेलों से नाता इससे भी पुराना है — 2014 के ग्लासगो संस्करण में उन्होंने 48 किलोग्राम वर्ग में रजत पदक जीतकर अपने अंतरराष्ट्रीय सफर की शुरुआत की थी। इस तरह ग्लासगो में जीता गया यह स्वर्ण उनका कुल मिलाकर चौथा राष्ट्रमंडल खेल पदक है, जो अपने आप में एक असाधारण निरंतरता को दर्शाता है। टोक्यो ओलंपिक 2020 में रजत पदक जीतकर पहले ही देश का दिल जीत चुकीं मीराबाई ने यह साबित कर दिया है कि उम्र केवल एक संख्या है और सच्ची लगन के आगे कोई भी चुनौती टिक नहीं सकती। भार वर्ग बदलने के बावजूद — 2018 में 48 किलोग्राम और 2022 में 49 किलोग्राम वर्ग में खेलने के बाद इस बार फिर 48 किलोग्राम वर्ग में उतरने के बावजूद — उन्होंने हर बार अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की है। मीराबाई की इस ऐतिहासिक जीत ने पूरे भारतीय भारोत्तोलन दल के लिए एक शानदार दिन की नींव रखी। उसी दिन पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में चनम्बम रिशिकांता सिंह ने रजत पदक जीता।
खास बात यह रही कि उन्होंने स्नैच वर्ग में 121 किलोग्राम का वजन उठाकर नया राष्ट्रमंडल खेल रिकॉर्ड बनाया, वह भी चोट के बावजूद मैदान में उतरकर। इसके साथ ही शाम के सत्र में मुथुपांडी राजा ने पुरुषों के 65 किलोग्राम वर्ग में दबाव भरे क्षणों में शानदार प्रदर्शन करते हुए रजत पदक हासिल किया। इस तरह एक ही दिन में भारतीय भारोत्तोलकों ने कुल तीन पदक जीतकर देश की झोली भर दी। मीराबाई चानू की यह उपलब्धि केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। मणिपुर के एक छोटे से शहर से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन करने वाली यह खिलाड़ी लाखों युवाओं, विशेषकर बेटियों के लिए एक जीवंत प्रेरणा है। उनकी कहानी बताती है कि संसाधनों की सीमाओं के बावजूद, अगर लगन सच्ची हो तो सफलता की कोई सीमा नहीं होती। खेल जगत में यह भी उल्लेखनीय है कि वे अब भी आने वाले एशियाई खेलों को लेकर अपने प्रशिक्षण पर पूरा ध्यान केंद्रित रखे हुए हैं, जो उनकी पेशेवर प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
राष्ट्रमंडल खेल 2026, जो 23 जुलाई से 2 अगस्त तक ग्लासगो में आयोजित हो रहे हैं, भारत के लिए 19वां राष्ट्रमंडल खेल संस्करण है और यह भागीदारी 1934 से चली आ रही एक लंबी विरासत का हिस्सा है। इस विरासत में मीराबाई चानू जैसे खिलाड़ियों का योगदान अमूल्य है, जिन्होंने बार-बार साबित किया है कि भारतीय खेल प्रतिभा किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी चमक बिखेरने में सक्षम है। मीराबाई चानू का यह स्वर्ण पदक केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। यह जीत उन तमाम युवा खिलाड़ियों के लिए एक संदेश है कि निरंतर परिश्रम, आत्मविश्वास और असफलताओं से सीखने की क्षमता ही सफलता की असली कुंजी है। जैसे-जैसे राष्ट्रमंडल खेल 2026 आगे बढ़ेंगे, उम्मीद है कि भारतीय दल इसी जोश और जज्बे के साथ और भी पदक अपने नाम करेगा। मीराबाई चानू ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वे भारतीय खेल जगत की सबसे भरोसेमंद और निरंतर सफलता की मिसाल हैं, और उनकी यह हैट्रिक आने वाले वर्षों में भी भारतीय भारोत्तोलन के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज रहेगी।