भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह भरोसेमंद बनाने के इरादे से एक उच्चस्तरीय टास्क फोर्स गठित करने की घोषणा की है, जिसकी कमान इन्फोसिस के सह-संस्थापक और आधार तथा फास्टैग जैसी डिजिटल परियोजनाओं के शिल्पकार नंदन नीलेकणी को सौंपी गई है। सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक वीडियो संदेश में प्रधानमंत्री ने कहा कि छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले पहले ही जेल की सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं, इसके लिए फास्ट-ट्रैक अदालतें बनाई गई हैं, और अब कड़े प्रावधानों वाला नया कानून भी संसद में लाया जा रहा है। लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि केवल दंडात्मक कार्रवाई पर्याप्त नहीं है — परीक्षा प्रणाली को विश्वसनीय, पारदर्शी और तकनीक-संपन्न बनाना जरूरी है।
यही सोच नई टास्क फोर्स के गठन का आधार बनी है, जो जल्द से जल्द अपनी रिपोर्ट सौंपेगी और आगामी परीक्षाओं की साख इसी के आधार पर सुनिश्चित की जाएगी। यह घोषणा अचानक नहीं आई है। इसकी पृष्ठभूमि मई 2026 में आयोजित नीट-यूजी परीक्षा में हुई पेपर लीक की घटना से जुड़ी है, जिसके बाद देशभर में छात्रों और अभिभावकों में गहरा आक्रोश फैल गया था। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने कुछ ही दिनों में गड़बड़ियों को पकड़ लिया, परीक्षा रद्द की गई, पुलिस में शिकायत दर्ज हुई और सीबीआई जांच में कई गिरफ्तारियां हुईं। इसके बाद दोबारा परीक्षा सफलतापूर्वक आयोजित की गई, लेकिन इस पूरे प्रकरण ने शिक्षा व्यवस्था की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
इसी दबाव में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा, जो इस विवाद की राजनीतिक और प्रशासनिक गंभीरता को दर्शाता है। नंदन नीलेकणी को इस जिम्मेदारी के लिए चुना जाना अपने-आप में एक संदेश है। वे भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना — यूआईडीएआई, आधार और यूपीआई जैसी परियोजनाओं — से गहराई से जुड़े रहे हैं और बड़े पैमाने पर तकनीक-आधारित प्रणालियों को लागू करने का उनका अनुभव सर्वविदित है। इससे पहले भी वे प्रत्यक्ष सब्सिडी हस्तांतरण से जुड़ी एक सरकारी समिति का नेतृत्व कर चुके हैं। सरकार का यह कदम स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि परीक्षा प्रणाली में सुधार को केवल प्रशासनिक फेरबदल के रूप में नहीं, बल्कि एक तकनीकी और संरचनात्मक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है, जिसका समाधान डिजिटल औजारों — जैसे सुरक्षित प्रश्नपत्र वितरण, बायोमेट्रिक सत्यापन, वास्तविक समय निगरानी और डेटा एनालिटिक्स — के जरिए खोजा जा सकता है। सवाल यह है कि क्या यह टास्क फोर्स वाकई नतीजे दे पाएगी? इसके पक्ष में कई तर्क दिए जा सकते हैं।
पहला, आधार परियोजना की सफलता यह दिखाती है कि जब तकनीकी नेतृत्व को स्पष्ट अधिकार और राजनीतिक समर्थन मिलता है, तो बड़े पैमाने की प्रणालियां थोड़े समय में भी खड़ी की जा सकती हैं। दूसरा, परीक्षा लीक की समस्या मूलतः एक सिस्टम-डिज़ाइन की समस्या है — प्रश्नपत्रों का मुद्रण, परिवहन, भंडारण और वितरण जैसी प्रक्रियाओं में जो कमजोर कड़ियां हैं, उन्हें तकनीक की मदद से काफी हद तक मजबूत किया जा सकता है। तीसरा, फास्ट-ट्रैक अदालतों और सख्त कानून के साथ मिलकर यह तकनीकी सुधार एक बहुआयामी रणनीति बनाता है, जो अकेले किसी एक उपाय से ज्यादा असरदार साबित हो सकती है। लेकिन इस आशावाद के साथ कुछ जायज आशंकाएं भी जुड़ी हैं।
भारत में परीक्षाएं करोड़ों छात्रों के लिए, हजारों केंद्रों पर, कई भाषाओं और विविध सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमियों के बीच आयोजित होती हैं। ऐसे विशाल पैमाने पर कोई भी तकनीकी समाधान लागू करना आधार जैसी पहचान-प्रणाली बनाने से कहीं अधिक जटिल है, क्योंकि इसमें राज्य सरकारों, निजी परीक्षा केंद्रों, प्रिंटिंग एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन जैसे कई हितधारकों का समन्वय जरूरी होता है। अतीत में भी परीक्षा सुधार को लेकर कई समितियां बनी हैं, रिपोर्टें सौंपी गई हैं, लेकिन जमीनी क्रियान्वयन अक्सर सुस्त और अधूरा रहा है। ऐसे में असली चुनौती रिपोर्ट तैयार करने में नहीं, बल्कि उसकी सिफारिशों को समयबद्ध ढंग से, राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ, राज्यों के सहयोग से लागू करने में है।
एक और पहलू निगरानी और गोपनीयता के बीच संतुलन का है। बायोमेट्रिक सत्यापन, सीसीटीवी निगरानी और डिजिटल ट्रैकिंग जैसे उपाय जहां धोखाधड़ी रोकने में मददगार हो सकते हैं, वहीं छात्रों के निजी डेटा के संग्रहण और सुरक्षा को लेकर भी स्पष्ट नीति और पारदर्शिता जरूरी होगी। साथ ही, यह भी ध्यान रखना होगा कि तकनीकी बदलाव ग्रामीण और वंचित इलाकों के छात्रों के लिए बाधा न बनें, जहां डिजिटल बुनियादी ढांचे की पहुंच अभी भी सीमित है। कुल मिलाकर, नंदन नीलेकणी की अगुवाई में बना यह टास्क फोर्स एक सकारात्मक और आवश्यक कदम है, जो परीक्षा प्रणाली में भरोसा बहाल करने की दिशा में गंभीरता को दर्शाता है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सिफारिशें कितनी व्यावहारिक हैं, उन्हें कितनी तेजी से और ईमानदारी से लागू किया जाता है, और क्या राज्य सरकारें तथा परीक्षा संचालन एजेंसियां इसमें पूरा सहयोग देती हैं।
तकनीक निश्चित रूप से एक शक्तिशाली औजार है, लेकिन अंततः यह प्रशासनिक जवाबदेही और निरंतर निगरानी ही है जो यह तय करेगी कि आने वाली परीक्षाएं वाकई भरोसे लायक बन पाती हैं या नहीं। छात्रों और अभिभावकों की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि यह टास्क फोर्स कितनी जल्दी और कितनी दूरदर्शिता से अपना काम पूरा करती है।