भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः असम एक बार फिर प्रकृति के प्रकोप से जूझ रहा है। बुधवार, पाँच अगस्त को राज्य में बाढ़ की स्थिति और गंभीर हो गई जब रातभर हुई तेज बारिश ने निचले इलाकों में फिर से जलभराव का खतरा पैदा कर दिया। इस प्राकृतिक आपदा में मरने वालों की संख्या अब उनासी से बढ़कर नवासी हो गई है, जबकि पाँच जिलों में एक लाख बाईस हज़ार से अधिक लोग इससे प्रभावित हुए हैं। इनमें शिवसागर जिला सबसे बुरी तरह प्रभावित बताया जा रहा है। यह आँकड़े केवल संख्याएँ नहीं हैं, बल्कि उन परिवारों की पीड़ा को दर्शाते हैं जो हर साल इस मौसम में अपना घर, अपनी फसल और कभी-कभी अपने प्रियजनों को खो देते हैं।
असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार गोलाघाट जिले के नुमालीगढ़ में धनसिरी नदी बुधवार सुबह भी अत्यंत गंभीर बाढ़ के स्तर पर बह रही थी। नदी का यह रुख इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में स्थिति और बिगड़ सकती है, विशेष रूप से उन इलाकों में जो पहले से ही जलभराव की समस्या से जूझ रहे हैं। प्रशासन ने नदी के आसपास के निवासियों को सतर्क रहने और सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बहुत से लोग अभी भी अपने घरों को छोड़ने में असमर्थ हैं, क्योंकि उनके पास जाने के लिए कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं है।
बाढ़ ने राज्य की कृषि व्यवस्था को गहरा आघात पहुँचाया है। पंद्रह हज़ार तीन सौ बयालीस हेक्टेयर से अधिक खेती योग्य भूमि पानी में डूब गई है, जिससे किसानों की साल भर की मेहनत बर्बाद हो गई है। इसके साथ ही लगभग छब्बीस हज़ार पाँच सौ पालतू पशु और मुर्गी-पालन से जुड़े जीव भी इस आपदा की भेंट चढ़ गए हैं। सड़कों, तटबंधों, घरों और स्कूलों को भी भारी नुकसान पहुँचा है, जिसका असर आने वाले महीनों तक राज्य की अर्थव्यवस्था और सामान्य जीवन पर पड़ेगा। बच्चों की शिक्षा बाधित हो रही है, ग्रामीण संपर्क टूट रहा है, और पुनर्निर्माण का बोझ पहले से संकटग्रस्त सरकारी खजाने पर बढ़ता जा रहा है।
राहत और बचाव कार्य युद्धस्तर पर जारी हैं। राज्यभर में पचपन राहत शिविर स्थापित किए गए हैं, जहाँ बेघर हुए लोगों को आश्रय, भोजन और आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है। राष्ट्रीय और राज्य आपदा मुकाबला बल के जवान दिन-रात बचाव अभियान में जुटे हैं। इस बीच केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा का बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा भी प्रस्तावित है, जिसमें वे स्थिति का जायज़ा लेंगे और राज्य के अधिकारियों के साथ राहत तथा पुनर्वास उपायों की समीक्षा करेंगे। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भी लगातार प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं और स्थानीय प्रशासन को त्वरित कार्रवाई के निर्देश दे रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकार का यह सक्रिय रुख सराहनीय है, परंतु सवाल यह है कि क्या केवल तात्कालिक राहत पर्याप्त है, या फिर इस पुनरावर्ती संकट का कोई स्थायी हल भी खोजा जाना चाहिए।
असम में बाढ़ कोई नई बात नहीं है। हर वर्ष मानसून के आगमन के साथ ही राज्य इस चुनौती से जूझता है। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियाँ खतरे के निशान को पार कर जाती हैं, गाँव जलमग्न हो जाते हैं और हज़ारों परिवार विस्थापित हो जाते हैं। इस वर्ष भी यही चक्र दोहराया जा रहा है, और दुर्भाग्य से मरने वालों की संख्या पिछले वर्षों की तुलना में अधिक है। यह तथ्य इस बात की ओर इशारा करता है कि केवल आपातकालीन प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता है। तटबंधों की मजबूती, नदियों की नियमित सफाई, जल निकासी व्यवस्था में सुधार और पूर्व चेतावनी प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाना आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है।
इसके अलावा, पड़ोसी राज्यों और देशों के जलाशयों से पानी छोड़े जाने का प्रभाव भी असम की बाढ़ को गंभीर बना देता है। यह एक ऐसा पहलू है जिस पर अंतर्राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय समन्वय के माध्यम से ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि अचानक जल स्तर में वृद्धि से बचा जा सके। जलवायु परिवर्तन के कारण बदलते वर्षा पैटर्न ने भी इस समस्या को और जटिल बना दिया है। पहले जो बारिश कई दिनों में फैली रहती थी, अब वह कुछ घंटों में ही बरस जाती है, जिससे नदियाँ अचानक उफान पर आ जाती हैं और बचाव के लिए समय बहुत कम मिलता है।
यह समय है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर असम की बाढ़ समस्या के लिए एक व्यापक, वैज्ञानिक और दीर्घकालिक रणनीति तैयार करें। इसमें न केवल बुनियादी ढाँचे को मज़बूत करना शामिल होना चाहिए, बल्कि प्रभावित समुदायों के पुनर्वास, फसल बीमा योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन क्षमता को बढ़ाना भी ज़रूरी है। साथ ही, नदी प्रबंधन में आधुनिक तकनीक और उपग्रह आधारित पूर्वानुमान प्रणाली का उपयोग बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि जनता को समय रहते चेतावनी दी जा सके और जान-माल का नुकसान कम किया जा सके।
अंततः, असम के लोगों का धैर्य और साहस सराहनीय है, जो हर साल इस विनाशकारी चक्र का सामना करते हैं और फिर से अपने जीवन को पुनर्स्थापित करने में जुट जाते हैं। परंतु यह भी सच है कि यह साहस तब तक ही टिकाऊ रह सकता है जब सरकार और समाज मिलकर इस समस्या की जड़ पर काम करें। तात्कालिक राहत के साथ-साथ स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाना ही इस त्रासदी से सच्चे अर्थों में मुक्ति दिला सकता है।