Monday, August 03, 2026
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संपादकीय

फ्लैश फ्लड ने केरल के व्यापार जगत की कमर तोड़ी: व्यापारी संगठन की चिंता

August 03, 2026 05:29 PM

 भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः केरल एक बार फिर मानसून की बेरहम मार झेल रहा है। इस बार आपदा का केंद्र बना पथानामथिट्टा जिले का रन्नी कस्बा, जहाँ भारी बारिश के बाद अचानक आई बाढ़ ने पम्पा नदी को उसके तटबंधों से बाहर धकेल दिया। तेज बारिश और अचानक आई बाढ़ के कारण पम्पा नदी उफान पर आ गई, जिससे कुछ ही घंटों में दुकानें, गोदाम और व्यावसायिक प्रतिष्ठान पानी में डूब गए। यह घटना केवल एक स्थानीय आपदा नहीं, बल्कि केरल के व्यापारिक ढांचे की गहरी कमज़ोरी को उजागर करने वाली एक चेतावनी है, जिस पर राज्य और केंद्र सरकार दोनों को गंभीरता से विचार करना होगा। रन्नी के व्यापारी आज खुद को बर्बादी के कगार पर खड़ा पा रहे हैं। बाढ़ के बाद व्यवसाय के मालिक अपने नुकसान का आकलन करने में जुटे हैं, जबकि पूरे कस्बे में फैले पानी ने सामान्य कामकाज को पूरी तरह ठप कर दिया है। पहाड़ी इलाकों में हुई अत्यधिक भारी बारिश ने फ्लैश फ्लड को जन्म दिया, जिसने पम्पा नदी के तटबंध तोड़ दिए और रन्नी के कई हिस्से कमर तक पानी में डूब गए। स्थानीय व्यापारियों के अनुसार बाढ़ का पानी इतनी तेज़ी से कस्बे में घुसा कि उन्हें अपना सामान बचाने तक का समय नहीं मिला। एक स्थानीय दवा व्यवसायी ने बताया कि पानी का स्तर देखते ही देखते इतना बढ़ गया कि दुकानों में रखा माल संभालने का कोई मौका ही नहीं बचा।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह पहली बार नहीं है जब केरल के व्यापारी ऐसी तबाही झेल रहे हैं। व्यापारियों ने पिछली बाढ़ आपदाओं के बाद पर्याप्त मुआवजा न मिलने पर गहरी निराशा जताई है। उनका कहना है कि पिछली बाढ़ के दौरान भी उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला था, और हर साल यही स्थिति दोहराई जा रही है, जिससे वे बेहद निराश हैं। कई दुकानदार अब अपने व्यवसाय को दोबारा खड़ा करने को लेकर चिंतित हैं और उनका कहना है कि बार-बार आने वाली इस बाढ़ ने उनकी आजीविका को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, जिससे उन्हें बार-बार आर्थिक झटके झेलने पड़ रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि आपदा प्रबंधन प्रणाली में एक बड़ा अंतर मौजूद है—राहत घोषणाएँ होती हैं, पर ज़मीनी स्तर पर पीड़ितों तक पहुँचने में देरी और अनियमितता आम बात बन चुकी है।

इस बीच राजनीतिक हलकों में भी चिंता की लहर देखी जा रही है। सीपीआई(एम) के सांसद वी शिवदासन ने केरल में बिगड़ती बरसाती स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि राज्य न केवल बाढ़ बल्कि कई जगहों पर भूस्खलन का भी सामना कर रहा है। उन्होंने कहा कि केरल की बाढ़ की स्थिति बेहद पीड़ादायक है और भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर भूस्खलन भी हो रहे हैं, और उन्होंने राज्य सरकार से लोगों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने का अनुरोध किया। यह अपील केवल एक सांसद की चिंता नहीं, बल्कि पूरे राज्य की आवाज़ है, जो हर मानसून में खुद को असहाय महसूस करता है।

केरल के लिए यह कोई नई कहानी नहीं है। इससे पहले भी राज्य को भीषण बाढ़ की मार झेलनी पड़ी है, जिसका असर सीधे व्यापार और अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। वर्ष 2018 की विनाशकारी बाढ़ के दौरान खुदरा, कृषि, बागान और पर्यटन क्षेत्रों को भारी नुकसान पहुँचा था, और उस समय राज्य सरकार ने प्रारंभिक अनुमान करीब दो हज़ार करोड़ रुपये का लगाया था, जबकि उद्योग जगत का कहना था कि वास्तविक नुकसान इससे कहीं अधिक होगा। उस दौर में बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों पर भी दबाव बढ़ा था, क्योंकि क्षतिग्रस्त स्टॉक के कारण खुदरा व्यापारी समय पर अपना क़र्ज़ नहीं चुका पाए थे, जिससे उनकी कार्यशील पूंजी अवरुद्ध हो गई थी। पर्यटन क्षेत्र, जो राज्य की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, उसे भी भारी बुकिंग रद्दीकरण और यात्रा व्यवधानों का सामना करना पड़ा था। यह इतिहास बताता है कि केरल की भौगोलिक बनावट—पहाड़ी क्षेत्र, तेज़ बहाव वाली नदियाँ और घनी आबादी वाले तटीय व निचले इलाके—उसे हर मानसून में स्वाभाविक रूप से जोखिम में डाल देती है।

सवाल यह है कि आख़िर कब तक यह चक्र इसी तरह दोहराया जाता रहेगा? व्यापारी संगठनों की मांग स्पष्ट और जायज़ है—उन्हें केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि समय पर, पारदर्शी और पर्याप्त मुआवजा चाहिए। इसके लिए ज़रूरी है कि राज्य सरकार एक स्थायी और त्वरित क्षतिपूर्ति तंत्र विकसित करे, जो हर साल नए सिरे से घोषणाओं पर निर्भर न हो। साथ ही, नदी तटबंधों की मजबूती, जल निकासी व्यवस्था का आधुनिकीकरण, और बाढ़-संभावित क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों के लिए बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली जैसी दीर्घकालिक योजनाओं पर भी गंभीरता से काम करना होगा।

छोटे व मंझोले व्यापारी किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। जब बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाएँ उनकी आजीविका को बार-बार तहस-नहस करती हैं, और राहत तंत्र उनकी मदद के लिए समय पर खड़ा नहीं हो पाता, तो यह न केवल आर्थिक असफलता है बल्कि एक सामाजिक अन्याय भी है। केरल सरकार और केंद्र सरकार, दोनों को मिलकर इस बार सिर्फ राहत सामग्री बाँटने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि एक ऐसी नीति बनानी चाहिए जो भविष्य में व्यापारियों को इस तरह की तबाही से उबरने में वास्तविक और समयबद्ध सहायता प्रदान कर सके। तभी रन्नी जैसे कस्बों के व्यापारी अगले मानसून का सामना डर की बजाय भरोसे के साथ कर पाएंगे।

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