भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर पिछले कुछ महीनों से जो अनिश्चितता और आशंका का माहौल बना हुआ था, उसे शांत करने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। छह अगस्त को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली में ईसाई समुदाय के दो अलग-अलग प्रतिनिधिमंडलों से मुलाकात की और उन्हें भरोसा दिलाया कि प्रस्तावित विधेयक पूरी तरह से "धर्म-निरपेक्ष" है। इनमें से एक प्रतिनिधिमंडल सभी ईसाई संप्रदायों और समुदायों का प्रतिनिधित्व करता था, जबकि दूसरे की अगुवाई मिजोरम के मुख्यमंत्री लालडुहोमा ने की। यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब संसद का मानसून सत्र अपने अंतिम चरण में है और इस विधेयक पर बारह अगस्त को चर्चा प्रस्तावित बताई जा रही है। गृह मंत्री की ओर से दिया गया आश्वासन कई मायनों में महत्वपूर्ण है। प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य के अनुसार, अमित शाह ने स्पष्ट रूप से कहा कि सरकार का किसी भी समुदाय या आस्था को परेशान करने का कोई इरादा नहीं है, चाहे वह ईसाई समुदाय हो या कोई अन्य धार्मिक समूह। इसके साथ ही यह भी आश्वासन दिया गया कि विधेयक के प्रावधान भूतलक्षी प्रभाव से यानी पूर्व की तारीख से लागू नहीं होंगे। मिजोरम के मुख्यमंत्री लालडुहोमा, जिनका राज्य ईसाई बहुल है, ने बैठक के बाद बताया कि उन्होंने गृह मंत्री के समक्ष कुल छह मुद्दे उठाए थे, जिनमें से एक पर स्पष्ट आश्वासन मिला है कि विधेयक पूर्वप्रभावी रूप से लागू नहीं होगा। शेष मुद्दों पर सरकार की ओर से लिखित जवाब देने की बात कही गई है, जिसके बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो पाएगी। बैठक में जो चिंताएं सामने रखी गईं, वे केवल प्रतीकात्मक नहीं थीं बल्कि विधेयक के व्यावहारिक पहलुओं से जुड़ी थीं। प्रतिनिधिमंडल ने विशेष रूप से उस प्रावधान पर सवाल उठाए जिसके तहत यदि किसी गैर-सरकारी संगठन का एफसीआरए पंजीकरण नवीनीकृत नहीं होता या रद्द कर दिया जाता है, तो उसकी संपत्तियों को "समाप्त मान लिया" जाएगा, भले ही इसके लिए कोई औपचारिक आदेश जारी न हुआ हो। इसके अलावा यह सवाल भी उठाया गया कि जब सरकार द्वारा नामित प्राधिकरण किसी संगठन की संपत्ति का अधिग्रहण करता है, तो उसके निपटान का अधिकार बिना किसी न्यायिक निगरानी के उसे कैसे दिया जा सकता है। गृह मंत्री ने इन आशंकाओं को गंभीरता से सुना और प्रतिनिधिमंडल से ऐसे मामलों की सूची मांगी जहां बिना पूर्व सूचना के गैर-सरकारी संगठनों का पंजीकरण रद्द किया गया हो। यह पहला अवसर नहीं है जब सरकार ने ईसाई समुदाय की आशंकाओं को दूर करने का प्रयास किया हो। इससे पहले दस जुलाई को अमित शाह ने भारत में कैथोलिक चर्च के शीर्ष निकाय, कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (सीबीसीआई) के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर उन्हें आश्वस्त किया था कि यह विधेयक ईसाई समुदाय के विरुद्ध नहीं है। सरकार की ओर से बार-बार यह तर्क दिया जाता रहा है कि एफसीआरए के तहत प्राप्त कुल विदेशी अंशदान में ईसाई संगठनों की हिस्सेदारी पंद्रह प्रतिशत से भी कम है, इसलिए यह कहना उचित नहीं कि यह विधेयक किसी विशेष धार्मिक समुदाय को निशाना बनाकर लाया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि विपक्षी दल इस विधेयक को लेकर भ्रामक प्रचार कर रहे हैं। हालांकि विपक्ष का रुख इससे उलट रहा है। तमिलनाडु से डीएमके के राज्यसभा सांसद पी. विल्सन के नेतृत्व में गए एक प्रतिनिधिमंडल ने गृह मंत्री से स्पष्ट मांग की कि या तो इस विधेयक को वापस लिया जाए या इसे विस्तृत विचार-विमर्श के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा जाए। यह मांग इस बात का संकेत है कि केवल मौखिक आश्वासनों से विपक्ष और नागरिक समाज के एक हिस्से की चिंताएं पूरी तरह दूर नहीं हुई हैं। दिलचस्प बात यह भी है कि यह विवाद अब भारत की सीमाओं के भीतर तक सीमित नहीं रह गया है। अमेरिकी कांग्रेस के एक सदस्य ने भी इस विधेयक पर आपत्ति जताते हुए इसे धार्मिक संगठनों को प्रभावित करने वाला और भारत-अमेरिका संबंधों पर असर डालने वाला कदम बताया है, जिस पर भारत सरकार की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया भी आई है। इस पूरे प्रकरण से एक बात स्पष्ट रूप से उभरती है कि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाया गया कोई भी कानून, चाहे उसकी मंशा जितनी भी नेक क्यों न हो, यदि उसकी भाषा और प्रावधानों में अस्पष्टता रहती है, तो वह अनावश्यक भय और अविश्वास को जन्म देता है। गृह मंत्री द्वारा बार-बार दिए जा रहे आश्वासन इस बात के प्रमाण हैं कि सरकार भी इस असहजता को महसूस कर रही है और संवाद के माध्यम से इसे दूर करने का प्रयास कर रही है, जो स्वागतयोग्य है। परंतु असली परीक्षा तब होगी जब विधेयक का लिखित पाठ और उस पर संसद में होने वाली बहस सामने आएगी। जब तक "समाप्त माने जाने" वाले प्रावधान, संपत्ति के निपटान संबंधी अधिकार, और पंजीकरण रद्द करने की प्रक्रिया जैसे तकनीकी परंतु महत्वपूर्ण पहलुओं पर स्पष्टता नहीं आती, तब तक केवल मौखिक भरोसे से आशंकाओं का पूरी तरह शमन होना मुश्किल है। बारह अगस्त को जब यह विधेयक संसद में चर्चा के लिए आएगा, तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन तकनीकी चिंताओं का समाधान विधेयक के पाठ में संशोधन के जरिये करती है, या फिर केवल आश्वासनों के सहारे इसे आगे बढ़ाया जाता है। एक ऐसा कानून जो वास्तव में धर्म-निरपेक्ष हो, उसे न केवल मंशा में बल्कि प्रावधानों की स्पष्टता में भी यह साबित करना होगा कि वह किसी एक समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि सभी के लिए समान रूप से लागू होता है। यही इस विवाद का असली समाधान होगा और यही लोकतांत्रिक प्रक्रिया की कसौटी भी।