Sunday, August 16, 2026
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संपादकीय

भारतीय नौसेना को मिलेंगी छह एआईपी पनडुब्बियां: प्रोजेक्ट 75आई सीसीएस की दहलीज पर

August 16, 2026 04:53 PM

 भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः भारत की समुद्री सुरक्षा रणनीति में एक बड़ा मोड़ आता दिख रहा है। लंबे समय से लंबित प्रोजेक्ट 75आई अब अंततः सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति यानी सीसीएस के सामने अंतिम मंजूरी के लिए पहुंचने वाला है। यह भारतीय नौसेना के लिए छह अत्याधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियों के निर्माण की करीब 70,000 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी परियोजना है, जो देश की पनडुब्बी क्षमता और स्वदेशी रक्षा उत्पादन, दोनों के लिहाज से निर्णायक साबित हो सकती है। वित्त मंत्रालय की ओर से इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलने की खबरें आने के बाद अब सारी निगाहें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सीसीएस पर टिकी हैं, जिसकी स्वीकृति के साथ ही इस परियोजना पर वास्तविक काम शुरू होने का रास्ता साफ हो जाएगा।

प्रोजेक्ट 75आई की कहानी कोई नई नहीं है। इसकी जड़ें 1997 के आसपास से जुड़ी हैं, जब भारतीय नौसेना के बेड़े में पनडुब्बियों की घटती संख्या को देखते हुए एक दीर्घकालिक योजना पर विचार शुरू हुआ था। इसके बाद 1999 में सीसीएस ने ही 30 वर्षीय पनडुब्बी निर्माण योजना को हरी झंडी दी थी, जिसके तहत कुल 24 पनडुब्बियां बनाई जानी थीं। इसी योजना के पहले चरण के रूप में प्रोजेक्ट 75 अस्तित्व में आया, जिसके तहत फ्रांसीसी सहयोग से छह कलवरी श्रेणी की पनडुब्बियां मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) में बनाई गईं। इस श्रेणी की आखिरी पनडुब्बी आईएनएस वागशीर को जनवरी 2025 में नौसेना में शामिल किया गया, यानी इस परियोजना को पूरा होने में तय समय से करीब एक दशक ज्यादा लग गया।

दूसरे चरण के रूप में परिकल्पित प्रोजेक्ट 75आई को शुरू में समानांतर उत्पादन लाइन के तौर पर सोचा गया था, लेकिन तकनीक हस्तांतरण की शर्तों, वित्तीय अड़चनों और वैश्विक साझेदार चुनने की प्रक्रिया में देरी के चलते यह परियोजना वर्षों तक फाइलों में ही उलझी रही। अब जाकर यह प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंचती दिख रही है।

इस परियोजना के तहत बनने वाली पनडुब्बियां जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (टीकेएमएस) के सहयोग से एमडीएल में तैयार की जाएंगी। बताया जा रहा है कि इनका डिज़ाइन जर्मन एचडीडब्ल्यू क्लास-214 पर आधारित होगा। इस सौदे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें तकनीक हस्तांतरण का व्यापक समझौता शामिल है, ताकि भारत केवल पुर्जे जोड़ने वाला देश न रहकर पनडुब्बी निर्माण की मूल तकनीक को आत्मसात कर सके। हालांकि अधिकारी अभी भी इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि क्या यह समझौता भारतीय शिपयार्ड को तकनीक में सुधार और नवाचार करने की पूरी छूट देगा, या फिर यह केवल असेंबली तक सीमित रह जाएगा। यह पहलू आने वाले वर्षों में भारत की आत्मनिर्भर रक्षा निर्माण क्षमता तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।

इन पनडुब्बियों की सबसे बड़ी खासियत होगी उनमें लगी एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी एआईपी प्रणाली। यह तकनीक पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की सबसे बड़ी सीमा को दूर करती है, जिसमें बैटरी चार्ज करने के लिए उन्हें बार-बार सतह के करीब आना पड़ता है। एआईपी तकनीक से लैस पनडुब्बियां बिना ऑक्सीजन की सतह से आपूर्ति के भी कई दिनों, यहां तक कि करीब दो सप्ताह तक पानी के भीतर रह सकती हैं। इससे उनकी गुप्तता, यानी दुश्मन के राडार और सोनार से बचने की क्षमता, कई गुना बढ़ जाती है। इसके अलावा इन पनडुब्बियों में आधुनिक सेंसर, टॉरपीडो, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियां भी लगाई जाने की संभावना है, जिससे इनकी मारक और निगरानी क्षमता, दोनों में इजाफा होगा।

यह परियोजना ऐसे समय पर आगे बढ़ रही है जब हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की नौसैनिक और पनडुब्बी गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। भारतीय नौसेना पहले से ही पारंपरिक पनडुब्बियों की कमी से जूझ रही है, और पुरानी हो चुकी शिशुमार श्रेणी की जर्मन डिज़ाइन वाली पनडुब्बियां भी अपने परिचालन जीवन के अंतिम पड़ाव के करीब हैं। ऐसे में छह नई एआईपी पनडुब्बियों का आना नौसेना की जलमग्न सहनशक्ति, गुप्त निगरानी और समुद्री निरोध क्षमता को नई ऊर्जा देगा। रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हिंद महासागर में सामरिक संतुलन बनाए रखने और क्षेत्रीय प्रभुत्व सुनिश्चित करने के लिए भारत को अपने पनडुब्बी बेड़े का तेजी से आधुनिकीकरण करना होगा, और प्रोजेक्ट 75आई इसी दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।

इस परियोजना को भारत-जर्मनी रक्षा साझेदारी के मजबूत होते रिश्तों के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। इस वर्ष अप्रैल में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उनके जर्मन समकक्ष बोरिस पिस्टोरियस ने बर्लिन में रक्षा औद्योगिक सहयोग के एक रोडमैप को स्वीकृति दी थी, जिसमें संयुक्त विकास, सह-उत्पादन और तकनीकी सहयोग पर जोर दिया गया। प्रोजेक्ट 75आई इस साझेदारी की एक बड़ी और ठोस अभिव्यक्ति के रूप में सामने आ रहा है।

बहरहाल, केवल सीसीएस की मंजूरी मिल जाना ही काफी नहीं होगा। प्रोजेक्ट 75 के अनुभव ने यह साफ दिखाया है कि तकनीक हस्तांतरण, औद्योगिक बुनियादी ढांचे और कल-पुर्जों की आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियां किसी भी बड़ी रक्षा परियोजना को वर्षों पीछे धकेल सकती हैं। ऐसे में सरकार और एमडीएल दोनों को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस बार देरी की वही कहानी न दोहराई जाए। साथ ही, यह भी जरूरी होगा कि तकनीक हस्तांतरण केवल कागजी औपचारिकता न रहकर भारतीय इंजीनियरों और शिपयार्ड को वास्तविक डिज़ाइन क्षमता तक पहुंचाए, ताकि भविष्य में भारत अपने दम पर उन्नत पनडुब्बियां बना सके।

कुल मिलाकर, प्रोजेक्ट 75आई का सीसीएस तक पहुंचना भारत की समुद्री सुरक्षा नीति के लिए एक स्वागतयोग्य और प्रतीक्षित घटनाक्रम है। यदि यह परियोजना समय पर और तय गुणवत्ता के साथ आगे बढ़ती है, तो यह न केवल नौसेना की परिचालन क्षमता को मजबूती देगी, बल्कि भारत को आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन के अपने लक्ष्य के और करीब भी ले जाएगी। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सीसीएस से मंजूरी के बाद यह परियोजना कितनी तेजी और पारदर्शिता के साथ जमीन पर उतरती है।

 

 

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