भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः भारतीय नागरिक उड्डयन के इतिहास में एक और शर्मनाक अध्याय तब जुड़ गया, जब एयर इंडिया के एक पायलट के खून में मारिजुआना की मौजूदगी की पुष्टि हुई। यह घटना केवल एक व्यक्ति की लापरवाही का मामला नहीं है, बल्कि पूरी उड्डयन व्यवस्था की निगरानी प्रणाली पर सवाल खड़े करती है। जब किसी विमान का कमांडर हजारों फीट की ऊंचाई पर सैकड़ों यात्रियों की जान अपने हाथों में लिए बैठा हो, तब उसकी मानसिक और शारीरिक स्थिति पर तनिक भी संदेह जानलेवा साबित हो सकता है।
घटना का ब्योरा चौंकाने वाला है। 4 अगस्त को फुकेत से दिल्ली आ रहे एयर इंडिया के एक एयरबस ए 320 विमान में 137 यात्री, छह केबिन क्रू सदस्य और दो पायलट सवार थे। उड़ान भरने के करीब ढाई घंटे बाद, ओडिशा के ऊपर लगभग 36,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ान भरते समय विमान अचानक करीब 300 फीट नीचे गिर गया। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम में 20 यात्री और चार केबिन क्रू सदस्य घायल हुए, जिनमें से 17 को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। गनीमत रही कि विमान सुरक्षित रूप से दिल्ली हवाई अड्डे पर उतर गया, वरना यह हादसा कहीं बड़ी त्रासदी में बदल सकता था।
शुरुआत में इस घटना को गंभीर टर्बुलेंस (हवा में अचानक उथल-पुथल) का नतीजा बताया गया, लेकिन जांच आगे बढ़ने पर तस्वीर कुछ और ही सामने आई। पायलट-इन-कमांड के नमूने की प्रयोगशाला जांच में मारिजुआना की पुष्टि हुई, जबकि प्रारंभिक जांच में परिणाम अनिर्णायक (नॉन-निगेटिव) आया था। नियमानुसार, ऐसे मामलों में अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले एक मेडिकल रिव्यू ऑफिसर की राय लेना अनिवार्य होता है, क्योंकि कुछ खाद्य पदार्थ और चिकित्सकीय दवाएं भी प्रारंभिक जांच में झूठे सकारात्मक परिणाम दे सकती
इसी संदर्भ में एक और परत सामने आई है, जो मामले को और जटिल बनाती है — यह जानकारी कि संबंधित पायलट नींद संबंधी दवा भी ले रहा था। इस पर वरिष्ठ पायलटों के एक वर्ग की राय है कि नशे के इस्तेमाल और चिकित्सकीय जरूरत के तहत ली गई दवा के बीच फर्क किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि नींद या चिंता की समस्या के लिए दी गई निर्धारित दवा से टेस्ट पॉजिटिव आने वाले पायलट और वास्तविक नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले पायलट में स्पष्ट भेद होना चाहिए, ताकि जांच प्रक्रिया सटीक बनी रहे और वैध चिकित्सा उपचार को नजरअंदाज न किया जाए।
यह तर्क अपनी जगह उचित है — किसी बीमार व्यक्ति को नशेड़ी की श्रेणी में डालना अन्याय होगा। लेकिन यही तथ्य असल मुद्दे की ओर इशारा करता है: अगर कोई पायलट नींद की दवा पर निर्भर है, तो सवाल यह उठता है कि क्या वह वाकई उड़ान भरने की स्थिति में था? नींद की दवाइयां — चाहे वे डॉक्टर की पर्ची पर ही क्यों न ली गई हों — सतर्कता, प्रतिक्रिया क्षमता और निर्णय लेने की शक्ति को प्रभावित करती हैं। एक कॉकपिट में बैठा व्यक्ति, जिसकी एक चूक सैकड़ों जिंदगियां लील सकती है, उसके लिए "दवा वैध थी" कहकर मामले को रफा-दफा कर देना काफी नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या वह उस दिन, उस उड़ान के लिए, शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह सक्षम था।
यह मामला हमें इतिहास के पन्ने पलटने पर भी मजबूर करता है। यह पहली बार नहीं है जब किसी पायलट की सतर्कता पर सवाल उठे हों। 2010 में मंगलौर में हुए एयर इंडिया एक्सप्रेस हादसे को याद कीजिए, जिसमें 158 यात्रियों की जान गई थी और जांच में पाया गया कि पायलट उड़ान के अधिकांश समय सोता रहा और उतरते वक्त दिशाभ्रमित अवस्था में था। 2018 में भी एक एयर इंडिया पायलट को उड़ान से ठीक पहले शराब के नशे में पाए जाने पर निलंबित किया गया था, जबकि नियमानुसार उड़ान के लिए रक्त में शराब की मात्रा शून्य होनी चाहिए। ये घटनाएं अलग-अलग समय और अलग-अलग परिस्थितियों में हुईं, लेकिन इनमें एक साझा धागा है — पायलटों की फिटनेस जांचने वाली व्यवस्था में खामियां।
आज जब भारत का उड्डयन क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है और हर दिन लाखों यात्री हवाई यात्रा करते हैं, तब यह जरूरी हो जाता है कि पायलटों की स्वास्थ्य जांच को महज एक औपचारिकता न मानकर एक सतत और सख्त प्रक्रिया बनाया जाए। मौजूदा व्यवस्था में हर उड़ान से पहले ब्रेथ एनालाइज़र टेस्ट अनिवार्य है, लेकिन यह केवल शराब की मौजूदगी भांपता है। नशीले पदार्थों और नींद-चिंता की दवाओं के असर को पकड़ने वाली कोई नियमित, व्यापक जांच व्यवस्था अब तक स्पष्ट रूप से लागू नहीं हो पाई है।
समय की मांग है कि नागर विमानन महानिदेशालय और सभी एयरलाइंस मिलकर एक ऐसी नीति बनाएं, जिसमें हर पायलट की नियमित अंतराल पर व्यापक चिकित्सा जांच हो — जिसमें नींद की गुणवत्ता, मानसिक तनाव, दवाओं के इस्तेमाल और उनके दुष्प्रभावों का आकलन शामिल हो। इसके साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जाए कि जो पायलट किसी भी वजह से दवा पर निर्भर हैं, वे स्वेच्छा से इसकी जानकारी छिपाने के बजाय खुलकर सामने आ सकें, बिना करियर खोने के डर के। इसके लिए एक भरोसेमंद, गोपनीय रिपोर्टिंग तंत्र बनाना जरूरी है, ताकि पायलट अपनी सेहत की समस्या बताने से न कतराएं।
अंततः, हवाई सुरक्षा का सवाल केवल तकनीकी खराबी या मौसम की मार तक सीमित नहीं रह सकता। जिस व्यवस्था में एक इंसान की सतर्कता ही सैकड़ों जिंदगियों की गारंटी है, वहां उस इंसान की सेहत पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। एयर इंडिया की यह ताजा घटना एक चेतावनी है — और अगर इससे सबक नहीं लिया गया, तो अगली बार शायद विमान सुरक्षित न उतर पाए।