Monday, August 10, 2026

संपादकीय

असम में बाढ़ का तांडव: 100 मौतें, सवा लाख जिंदगियां तबाह, फिर भी नहीं थम रहा पानी का कहर !

August 10, 2026 06:49 PM

 भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः असम एक बार फिर मानसून की विभीषिका से जूझ रहा है। राज्य में बाढ़ की स्थिति लगातार गंभीर बनी हुई है, और सोमवार को मरने वालों की संख्या सौ के आंकड़े को पार कर गई। पिछले चौबीस घंटों में गोलाघाट और कार्बी आंगलोंग जिलों में दो और लोगों की जान चली गई, जिसके बाद कुल मृतकों की संख्या सौ हो गई। असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से जारी दैनिक बुलेटिन के अनुसार लगभग सवा लाख से अधिक लोग इस आपदा से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए हैं, और राज्य के सात जिलों में लोग अब भी जलभराव और बाढ़ की मार झेल रहे हैं।

यह त्रासदी केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। लगातार हो रही मूसलधार बारिश ने ब्रह्मपुत्र सहित राज्य की प्रमुख नदियों को उफान पर ला दिया है। एशिया की सबसे बड़ी नदियों में गिनी जाने वाली ब्रह्मपुत्र, जो तिब्बत से निकलकर असम के भीतर करीब नौ सौ किलोमीटर का सफर तय करती है, इस बार भी अपने किनारों को तोड़कर गांवों को अपनी चपेट में ले चुकी है। नदी के उफान ने न केवल घरों को बहाया बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका को भी तबाह कर दिया। राहत शिविरों में शरण लेने वाले लोगों की संख्या करीब तीन लाख तक पहुंच गई है, जो इस बात का प्रमाण है कि यह संकट कितना व्यापक है।

राज्य के चौदह जिले अब भी उच्च सतर्कता की स्थिति में हैं। राजधानी गुवाहाटी में भी हालात चिंताजनक बने हुए हैं, जहां कई इलाकों में जलजमाव की खबरें लगातार आ रही हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक करीब साढ़े चार सौ गांव पूरी तरह जलमग्न हो चुके हैं, जबकि लगभग बारह हजार हेक्टेयर कृषि भूमि को नुकसान पहुंचा है। किसानों के लिए यह क्षति दोहरी मार साबित हो रही है, क्योंकि एक तरफ उनकी फसलें बर्बाद हुई हैं तो दूसरी तरफ उनके मवेशी और घर-बार भी उजड़ गए हैं। मौसम विभाग ने आने वाले दिनों में जलग्रहण क्षेत्रों में और अधिक वर्षा की आशंका जताई है, जिससे प्रशासन की चिंता और बढ़ गई है।

सिवसागर जिला इस बाढ़ से सबसे बुरी तरह प्रभावित इलाकों में शुमार है। यहां के नाजिरा शहर के एक व्यापारी ने बताया कि बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी लोग अपने घरों की ओर लौटने का साहस जुटा रहे हैं, हालांकि जमीन अब भी दो से तीन फीट गाद की मोटी परत के नीचे दबी हुई है। पास के एक गांव में जहां पहले लगभग सौ परिवार रहते थे, वहां अब गिनती के घर ही बचे हैं। अधिकांश निवासी डेयरी किसान थे, जिन्होंने अपने पशुधन को पूरी तरह खो दिया है और अब उन्हें नए सिरे से जीवन शुरू करना पड़ रहा है। हालांकि छत बनाने के लिए टिन की चादरें और अन्य निर्माण सामग्री राहत के तौर पर पहुंचनी शुरू हो गई है, लेकिन जमीनी स्तर पर पुनर्वास का काम अभी लंबा चलने वाला है।

इस संकट के बीच राज्य सरकार राहत कार्यों में जुटी हुई है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा ने बताया कि राज्यभर में दो सौ बावन राहत शिविर और दो हजार पचास राहत वितरण केंद्र प्रभावित समुदायों की मदद के लिए काम कर रहे हैं। असम के कृषि एवं सिंचाई मंत्री पीयूष हजारिका ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि नुकसान का आकलन जल्द से जल्द पूरा किया जाए ताकि प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता और पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू की जा सके। यह स्पष्ट है कि सरकार तात्कालिक राहत पर ध्यान केंद्रित कर रही है, लेकिन दीर्घकालिक पुनर्वास योजना की जरूरत कहीं अधिक गंभीर है।

एक सकारात्मक संकेत यह है कि सोमवार से राज्यभर के स्कूल फिर से खुल गए हैं। जिन स्कूलों को बाढ़ से गंभीर नुकसान पहुंचा है, वहां के विद्यार्थियों को अस्थायी रूप से आसपास के दूसरे स्कूलों में समायोजित किया जा रहा है। सबसे अधिक प्रभावित जिलों में सरकार ने प्रत्येक स्कूल को सफाई और मरम्मत कार्य के लिए दो-दो लाख रुपये जारी किए हैं। यह कदम स्वागत योग्य है, क्योंकि शिक्षा व्यवस्था को जल्द पटरी पर लाना बच्चों के भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।

लेकिन यह भी सच है कि असम में हर साल मानसून के दौरान इसी तरह की तबाही दोहराई जाती है। बरसात आते ही ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां खतरे के निशान को पार कर जाती हैं, गांव के गांव डूब जाते हैं, और हजारों परिवार बेघर हो जाते हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक राहत और बचाव कार्य ही समाधान का पर्याय बने रहेंगे। नदियों के तटबंधों की मजबूती, जल निकासी व्यवस्था का सुधार, बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली को अधिक सटीक बनाना और स्थायी पुनर्वास नीति जैसी दीर्घकालिक व्यवस्थाओं पर गंभीरता से काम किए बिना यह संकट हर साल दोहराता रहेगा।

असम की जनता की सहनशक्ति सराहनीय है, लेकिन बार-बार की इस त्रासदी से उबरने के लिए केवल साहस पर्याप्त नहीं है। केंद्र और राज्य सरकार, दोनों को मिलकर बाढ़ नियंत्रण की एक स्थायी और वैज्ञानिक रणनीति बनानी होगी, ताकि आने वाले वर्षों में मानवीय और आर्थिक क्षति को कम से कम किया जा सके। तभी यह सुनिश्चित हो सकेगा कि असम के लोग हर मानसून में एक बार फिर अपनी जिंदगी शून्य से शुरू करने को विवश न हों।

 

Have something to say? Post your comment

और संपादकीय समाचार

जब एल्गोरिद्म बने संपादक: मेटा की मुश्किल बढ़ी

जब एल्गोरिद्म बने संपादक: मेटा की मुश्किल बढ़ी

मोदी की नसीहत: सवाल उठाओ, समाधान भी लाओ

मोदी की नसीहत: सवाल उठाओ, समाधान भी लाओ

एफसीआरए विधेयक 'धर्म-निरपेक्ष', शाह ने ईसाई संगठनों को दिलाया भरोसा

एफसीआरए विधेयक 'धर्म-निरपेक्ष', शाह ने ईसाई संगठनों को दिलाया भरोसा

हरित ऊर्जा और संपर्क-सुविधा की दोहरी सौगात

हरित ऊर्जा और संपर्क-सुविधा की दोहरी सौगात

असम में बाढ़ का कहर: स्थायी समाधान की दरकार

असम में बाढ़ का कहर: स्थायी समाधान की दरकार

मेटा की सफाई नाकाफी, सरकार ने फिर भेजा समन , एक हफ्ते में दूसरी बार तलब हुआ मेटा

मेटा की सफाई नाकाफी, सरकार ने फिर भेजा समन , एक हफ्ते में दूसरी बार तलब हुआ मेटा

फ्लैश फ्लड ने केरल के व्यापार जगत की कमर तोड़ी: व्यापारी संगठन की चिंता

फ्लैश फ्लड ने केरल के व्यापार जगत की कमर तोड़ी: व्यापारी संगठन की चिंता

नशामुक्त युवा, सशक्त भारत:प्रधानमंत्री मोदी ने छेड़ा नया राष्ट्रीय अभियान

नशामुक्त युवा, सशक्त भारत:प्रधानमंत्री मोदी ने छेड़ा नया राष्ट्रीय अभियान

17,900 करोड़ की सौगात: मोदी ने आंध्र प्रदेश को दी विकास की नई रफ्तार

17,900 करोड़ की सौगात: मोदी ने आंध्र प्रदेश को दी विकास की नई रफ्तार

मेटा इंडिया प्रमुख के विरुद्ध केस: तकनीकी कंपनियों और सरकार के बीच बढ़ता टकराव

मेटा इंडिया प्रमुख के विरुद्ध केस: तकनीकी कंपनियों और सरकार के बीच बढ़ता टकराव

By using our site, you agree to our Terms & Conditions and Disclaimer     Dismiss