भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः दिल्ली की सियासत में शुक्रवार का दिन एक अजीब तस्वीर लेकर आया, जिसमें देश के विपक्ष के नेता खुद थाने के बाहर जमीन पर बैठे नजर आए। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी संसद मार्ग थाने पहुंचे और वहीं धरने पर बैठ गए, वजह थी एक युवक की आंख और शरीर में धंसे सैकड़ों छर्रे, और पुलिस का उस पर मामला दर्ज करने से इनकार। यह घटना सिर्फ एक एफ.आई.आर.की मांग भर नहीं थी, बल्कि इसने पुलिस की कार्यशैली, सत्ता और विपक्ष के रिश्ते, और आम नागरिक की न्याय तक पहुंच जैसे कई गंभीर सवाल एक साथ खड़े कर दिए।
मामला बीती 20 जुलाई का है, जब कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में एक विरोध मार्च के दौरान कनॉट प्लेस इलाके में कथित तौर पर पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ था। इस कार्रवाई में साहिल लोचाव नामक एक युवक बुरी तरह घायल हो गया। एम्स की मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक उसके शरीर में दो सौ से अधिक छर्रे धंसे पाए गए, जिनमें से तीन उसकी आंख में थे, और इस वजह से उसकी उस आंख की रोशनी पूरी तरह जा चुकी है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि उसके दिल के पास भी छर्रे मौजूद हैं, जिन्हें निकालना फिलहाल संभव नहीं है। यानी यह कोई मामूली चोट नहीं, बल्कि एक ऐसी घटना है जिसने एक युवक की जिंदगी स्थायी रूप से बदल दी।
साहिल के परिवार ने न्याय पाने की कोशिश तुरंत शुरू कर दी थी। रिपोर्टों के अनुसार, चौदह अगस्त को वह अपने वकीलों के साथ दिल्ली पुलिस के पास लिखित शिकायत लेकर पहुंचा, लेकिन उसे न तो जांच अधिकारी का नंबर दिया गया और न ही शिकायत की कोई रसीद। सत्रह अगस्त को दोबारा ईमेल और फोन के जरिए संपर्क किया गया, फिर भी कोई ठोस जवाब नहीं मिला। इसी टालमटोल से तंग आकर कांग्रेस नेतृत्व मैदान में उतरा। इससे पहले राहुल गांधी संसद के मानसून सत्र में भी यह मुद्दा उठा चुके थे और उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह से सीधा जवाब मांगा था।
शुक्रवार को राहुल गांधी खुद साहिल और उसकी मां के साथ पहले मंदिर मार्ग थाने पहुंचे, वहां से इनकार मिलने पर वे डीसीपी सेंट्रल से मिलने गए, और आखिरकार संसद मार्ग थाने पहुंचकर वरिष्ठ अधिकारियों से घंटों बातचीत की। जब पुलिस अधिकारियों ने कथित तौर पर यह कहा कि उन्हें ऊपर से आदेश मिला है कि एफ.आई.आर. दर्ज न की जाए, तो राहुल गांधी थाने परिसर में ही जमीन पर बैठ गए। उनके साथ सांसद कुमारी शैलजा और प्रियंका गांधी वाड्रा भी मौजूद रहीं। इस दौरान माहौल में भजन और चरखा जैसे प्रतीकात्मक तत्व भी शामिल हुए, जो साफ तौर पर इस विरोध को गांधीवादी सत्याग्रह का रंग देने की कोशिश जैसा लग रहा था। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि जब अपराध स्पष्ट रूप से सामने है, तो पुलिस का मामला दर्ज न करना खुद एक बड़ा सवाल खड़ा करता है, और इसके लिए उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्रालय को सीधे जिम्मेदार ठहराया।
दिलचस्प बात यह रही कि जिस दिन यह धरना चल रहा था, उसी दिन एक मीडिया रिपोर्ट के हवाले से यह सामने आया कि दिल्ली पुलिस ने शिकायत स्वीकार कर ली है और मामले की जांच के लिए एक जांच अधिकारी नियुक्त कर दिया गया है, और इसकी सूचना राहुल गांधी को भी दे दी गई थी। यानी सार्वजनिक दबाव बनने के बाद प्रशासनिक रुख में हलचल दिखी, भले ही औपचारिक एफ.आई.आर. दर्ज होने की प्रक्रिया अलग रही हो। यह पैटर्न भारतीय राजनीति में नया नहीं है, जहां प्रशासनिक तंत्र अक्सर तभी हरकत में आता दिखता है जब मामला सड़क या मीडिया की सुर्खियों तक पहुंच जाए।
इस पूरे प्रकरण को केवल एक स्थानीय पुलिस थाने की देरी तक सीमित करके देखना भूल होगी। जब देश के सबसे बड़े विपक्षी नेता को सामान्य नागरिक अधिकार, यानी एफ.आई.आर. दर्ज कराने के लिए थाने के बाहर घंटों बैठना पड़े, तो यह पुलिस व्यवस्था की स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। साथ ही यह भी ध्यान देने लायक है कि राहुल गांधी खुद अतीत में कई बार एफ.आई.आर. के दायरे में रह चुके हैं, चाहे वह संसद परिसर में हुई धक्का-मुक्की का मामला हो या न्याय यात्रा के दौरान असम में दर्ज हुआ केस। ऐसे में यह घटना राजनीतिक बदले या केवल संयोगवश हुई प्रशासनिक लापरवाही, इस पर अलग-अलग विचारधारा के लोग अलग-अलग राय रख सकते हैं।
साहिल लोचाव की कहानी एक व्यक्ति की त्रासदी से आगे बढ़कर यह दिखाती है कि आम नागरिक के लिए न्याय की पहली सीढ़ी, यानी एफ.आई.आर.दर्ज कराना ही कितना दुरूह हो सकता है, खासकर जब मामला सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़ा हो। राहुल गांधी का धरना चाहे राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जाए या पीड़ित परिवार के प्रति वास्तविक सहानुभूति, इसने कम से कम इतना तो तय कर दिया कि मामला अब सार्वजनिक बहस के केंद्र में आ चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि जांच अधिकारी की नियुक्ति के बाद वास्तविक जांच कितनी निष्पक्ष और तेज होती है, और क्या दोषियों तक पहुंचने की इच्छाशक्ति प्रशासन दिखा पाता है या यह मामला भी सुर्खियों के धुंधलके में कहीं खो जाता है।