देश की राजनीति में एक बार फिर राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' केंद्र में आ गया है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने गुरुवार को कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए उसे वोट बैंक की राजनीति के लिए 'नई मुस्लिम लीग' करार दिया। यह टिप्पणी उस समय आई जब कांग्रेस कार्यसमिति ने पार्टी के मंचों पर भविष्य में वंदे मातरम् के केवल पहले दो पद ही गाने का औपचारिक निर्णय लिया। भाजपा अध्यक्ष ने इसे राष्ट्रगीत का अपमान बताते हुए कहा कि यह उन हजारों शहीदों के प्रति उपेक्षा है, जिन्होंने इसी गीत को हृदय में बसाकर देश के लिए अपने प्राण न्योछावर किए थे।
यह टकराव नया नहीं है, बल्कि पिछले कुछ महीनों से सुलग रहा है। केंद्र सरकार ने सभी सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् का पूर्ण संस्करण गाना अनिवार्य कर दिया है, जिसका कांग्रेस ने विरोध करते हुए कहा कि पार्टी हमेशा से गीत के पहले दो पदों को ही गाती आई है और इसे राजनीतिक मुद्दा बनाना उचित नहीं। मामले ने तब तूल पकड़ा जब 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कांग्रेस मुख्यालय में हुए कार्यक्रम का एक वीडियो सामने आया, जिसमें गीत के पूर्ण संस्करण को लेकर असमंजस की स्थिति दिखी। भाजपा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने पूरे गीत के गायन को रोकने का प्रयास किया, जबकि कांग्रेस ने इस दावे को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि सोनिया गांधी केवल पार्टी अध्यक्ष के लिए कुर्सी मंगवाने की बात कर रही थीं और इसे महज एक 'संयोग' बताया। बुधवार को हुई कांग्रेस कार्यसमिति की करीब चार घंटे लंबी बैठक के बाद पार्टी ने इस रुख को औपचारिक नीति का रूप दे दिया, जिसके बाद यह विवाद और गहरा गया।
अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) पोस्ट में नितिन नबीन ने कहा कि 'भारत माता' के इस पावन आह्वान का अपमान उन शहीदों के प्रति असम्मान है, जिन्होंने इसी गीत की प्रेरणा से देश के लिए बलिदान दिया। उन्होंने कहा कि कुछ दिन पहले जो अपमान एक 'व्यक्ति विशेष के आचरण' में झलका था, कांग्रेस ने अब उसे संकल्प यानी प्रस्ताव की शक्ल दे दी है। नबीन के अनुसार, जो अपमान पहले महज संयोग जैसा दिखाया गया था, वह अब कांग्रेस की स्थायी नीति बन चुका है। उन्होंने इसे केवल राजनीतिक बचाव न बताते हुए यह भी कहा कि यह कांग्रेस की उस वोट बैंक की भूख का प्रमाण है, जिसकी वेदी पर पार्टी बार-बार राष्ट्र के स्वाभिमान को गिरवी रखती आई है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने भी इसी सुर में कहा कि कांग्रेस के इस निर्णय ने उसकी देशभक्ति और राष्ट्र के प्रति निष्ठा पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
भाजपा का 'नई मुस्लिम लीग' वाला आरोप महज एक तात्कालिक बयान नहीं, बल्कि पार्टी की एक सोची-समझी ऐतिहासिक कथा का हिस्सा है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम् को कांग्रेस ने 1937 में राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया था, लेकिन उसी दौर में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग और उसके नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने इसका पुरजोर विरोध किया था। भाजपा नेता बार-बार इस ऐतिहासिक प्रसंग को उठाकर यह स्थापित करने का प्रयास करते हैं कि कांग्रेस ने तब भी मुस्लिम लीग के दबाव में गीत के कुछ अंश छोड़े थे और आज भी वही परंपरा दोहरा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं लोकसभा में इस विषय पर विस्तार से बोल चुके हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि मुस्लिम लीग के विरोध के पांच दिन के भीतर ही तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने गीत की 'जांच' शुरू करवा दी थी, जबकि प्रतिरोध करने के बजाय पार्टी को अपनी निष्ठा स्पष्ट करनी चाहिए थी। भाजपा नेताओं का यह भी कहना रहा है कि कांग्रेस केवल चुनाव नजदीक आने पर ही वंदे मातरम् को याद करती है।
कांग्रेस इन आरोपों को सिरे से खारिज करती रही है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे बार-बार यह दोहराते आए हैं कि कांग्रेस को वंदे मातरम् और राष्ट्रगान 'जन गण मन' दोनों पर गर्व है और पार्टी हर आयोजन में इन्हें पूरे सम्मान के साथ गाती है। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि भाजपा राष्ट्रवाद के मुद्दे को केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल कर रही है और स्वयं संघ-भाजपा परिवार का इस गीत के प्रति ऐतिहासिक रवैया भी प्रश्नों के घेरे में रहा है। पार्टी का कहना है कि देशभक्ति किसी एक दल की बपौती नहीं हो सकती और भाजपा को कांग्रेस या उसके कार्यकर्ताओं को राष्ट्रप्रेम का पाठ पढ़ाने की आवश्यकता नहीं है।
इस पूरे प्रकरण को केवल एक गीत के कितने पद गाए जाएं, इस तकनीकी बहस तक सीमित रखना भूल होगी। यह विवाद वास्तव में उस व्यापक राजनीतिक संघर्ष का प्रतिबिंब है, जिसमें राष्ट्रवाद, धार्मिक पहचान और चुनावी समीकरण आपस में गुंथे हुए हैं। भाजपा के लिए यह मुद्दा हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की अपनी राजनीतिक पहचान को और पुख्ता करने का अवसर है, वहीं कांग्रेस के लिए यह अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि और सामाजिक समावेशिता को बचाए रखने की चुनौती है। ऐसे प्रतीकात्मक मुद्दों पर होने वाली बयानबाजी अक्सर वास्तविक शासन और नीतिगत प्रश्नों को हाशिये पर धकेल देती है। जनता के लिए बेहतर यही होगा कि राजनीतिक दल राष्ट्रीय प्रतीकों को चुनावी हथियार बनाने के बजाय उन्हें एकता और गौरव के साझा सूत्र के रूप में देखें, ताकि वंदे मातरम् जैसा गीत, जो स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा रहा है, राजनीतिक विवाद की भेंट चढ़ने के बजाय हर भारतीय के हृदय में समान श्रद्धा के साथ जीवित रहे।