भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः देश के खाद्य क्षेत्र से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है, जिस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने पिछले कुछ महीनों में करीब डेढ़ सौ खाद्य कंपनियों को नोटिस जारी किए हैं। इस सूची में नेस्ले इंडिया, पेप्सिको और कोका-कोला इंडिया जैसे बड़े और जाने-माने ब्रांड भी शामिल हैं। इन कंपनियों पर मुख्य रूप से तीन तरह के आरोप हैं—भ्रामक विज्ञापन प्रसारित करना, अपने उत्पादों के बारे में झूठे दावे करना, और लेबलिंग से जुड़े नियमों का पालन न करना। यह घटनाक्रम केवल कुछ कंपनियों तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे खाद्य उद्योग की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।
आज के दौर में हर घर में पैकेज्ड और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। सुबह के नाश्ते से लेकर बच्चों के टिफिन और शाम की चाय तक, बाजार में उपलब्ध तैयार उत्पादों ने रसोई में अपनी गहरी पैठ बना ली है। ऐसे में उपभोक्ता जब किसी उत्पाद को खरीदते हैं, तो वे पैकेट पर लिखी जानकारी और विज्ञापनों में किए गए दावों पर भरोसा करते हैं। यही भरोसा तब टूटता है जब कोई कंपनी अपने उत्पाद को वास्तविकता से अलग दिखाकर बेचने की कोशिश करती है। उदाहरण के लिए, किसी शक्कर या नमक से भरपूर उत्पाद को "स्वास्थ्यवर्धक" या "पौष्टिक" बताकर बेचना, या किसी पेय पदार्थ में प्राकृतिक फलों की मात्रा को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करना, सीधे तौर पर उपभोक्ताओं के साथ धोखा है।
यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है, लेकिन भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण बाजार में इसका असर कहीं अधिक व्यापक है। यहां एक बड़ी आबादी ऐसी है जो पैकेट पर छपी जानकारी को पूरी तरह पढ़ने या समझने में सक्षम नहीं होती। कई बार भाषा की जटिलता, बारीक अक्षरों में लिखी शर्तें, या तकनीकी शब्दावली आम उपभोक्ता के लिए भ्रम पैदा करती है। ऐसे में कंपनियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे स्पष्ट, सरल और सच्ची जानकारी उपलब्ध कराएं। जब बड़े और प्रतिष्ठित ब्रांड ही इन नियमों की अनदेखी करते हुए पाए जाते हैं, तो यह चिंता का विषय बन जाता है, क्योंकि उपभोक्ता आमतौर पर बड़े नामों पर अधिक भरोसा करते हैं।
खाद्य नियामक द्वारा उठाया गया यह कदम स्वागत योग्य है। यह दर्शाता है कि नियामक संस्था अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से ले रही है और बाजार में पारदर्शिता लाने की दिशा में सक्रिय कदम उठा रही है। बड़ी संख्या में नोटिस जारी करना यह भी संकेत देता है कि यह समस्या छिटपुट नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर फैली हुई है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि केवल छोटी या अनजान कंपनियां ही नियमों की अनदेखी नहीं करतीं, बल्कि बड़े कॉर्पोरेट घराने भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। बाजार में प्रतिस्पर्धा जीतने की होड़ में कई बार कंपनियां अपने उत्पाद को दूसरों से बेहतर दिखाने के लिए ऐसे दावे कर बैठती हैं, जिनका वैज्ञानिक या तथ्यात्मक आधार कमजोर होता है।
हालांकि, केवल नोटिस जारी करना ही पर्याप्त नहीं है। असली परीक्षा तो इस बात में है कि इन नोटिसों के बाद क्या ठोस कार्रवाई होती है। अतीत में देखा गया है कि कई बार जांच की प्रक्रिया लंबी खिंचती है और अंततः मामला या तो हल्के जुर्माने में सिमट जाता है या फिर वर्षों तक अदालतों और सुनवाइयों में उलझा रहता है। इस बार जरूरी है कि नियामक संस्था न केवल नोटिस जारी करे, बल्कि समयबद्ध तरीके से जांच पूरी करे और दोषी पाई जाने वाली कंपनियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करे। साथ ही, ऐसे विज्ञापनों पर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिए जो जांच के दायरे में हैं, ताकि तब तक और उपभोक्ता गुमराह न हों।
इस पूरे प्रकरण से एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है, वह है उपभोक्ता जागरूकता का। नियामक संस्थाएं और सरकारें अपनी तरफ से नियम बना सकती हैं, कार्रवाई कर सकती हैं, लेकिन जब तक आम उपभोक्ता स्वयं जागरूक नहीं होगा, तब तक इस समस्या पर पूरी तरह अंकुश लगाना मुश्किल है। उपभोक्ताओं को चाहिए कि वे उत्पाद खरीदते समय केवल विज्ञापन पर भरोसा करने के बजाय पैकेट पर दी गई सामग्री सूची, पोषण संबंधी जानकारी और उत्पादन तिथि जैसी बातों पर भी ध्यान दें। स्कूलों और सामुदायिक स्तर पर भी इस विषय में जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए, विशेष रूप से बच्चों और अभिभावकों के लिए, क्योंकि बच्चे अक्सर विज्ञापनों से सबसे अधिक प्रभावित होने वाला वर्ग होते हैं।
यह भी विचारणीय है कि नियामक ढांचे को और अधिक मजबूत बनाने की जरूरत है। वर्तमान नियम-कानून कई बार तकनीकी बदलावों और डिजिटल विज्ञापन के नए तरीकों के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते। सोशल मीडिया पर प्रभावशाली व्यक्तियों के माध्यम से किए जाने वाले प्रचार, जिन्हें आमतौर पर "इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग" कहा जाता है, इस दायरे से अक्सर बाहर रह जाते हैं। नियामक संस्था को चाहिए कि वह इन नए माध्यमों को भी अपनी निगरानी के दायरे में लाए, ताकि हर तरह के भ्रामक प्रचार पर समान रूप से रोक लगाई जा सके।
अंततः, यह मामला केवल कुछ कंपनियों को दंडित करने भर का नहीं है, बल्कि यह पूरे खाद्य उद्योग के लिए एक चेतावनी है कि उपभोक्ताओं का भरोसा किसी भी कीमत पर बनाए रखा जाना चाहिए। जो कंपनियां वास्तव में गुणवत्तापूर्ण उत्पाद बनाती हैं, उन्हें भी चाहिए कि वे सच्चे और तथ्यपरक विज्ञापन के माध्यम से अपनी विश्वसनीयता स्थापित करें। दीर्घकाल में यही रणनीति उद्योग और उपभोक्ता, दोनों के हित में साबित होगी। सरकार, नियामक संस्थाओं और उपभोक्ताओं के संयुक्त प्रयासों से ही एक ऐसा बाजार व्यवस्था बनाई जा सकती है, जहां पारदर्शिता और विश्वास आधारभूत सिद्धांत हों, न कि अपवाद।