भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) भवन से वर्चुअल माध्यम से पश्चिम बंगाल में लगभग 3,500 करोड़ रुपये की पांच परियोजनाओं की आधारशिला रखी। यह भूमि पूजन समारोह रविवार को आयोजित किया गया, जिसमें पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी भी वर्चुअल रूप से शामिल हुए। इन पांच परियोजनाओं में से तीन नवरत्न रक्षा सार्वजनिक उपक्रम जीआरएसई से जुड़ी हैं, जबकि शेष दो यंत्र इंडिया लिमिटेड (वाईआईएल) की हैं। यह पहल केंद्र सरकार के आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया अभियान को नई गति देने वाली मानी जा रही है।
इस अवसर पर बोलते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि यह निवेश केवल वर्तमान के लिए नहीं बल्कि आने वाले भविष्य के लिए किया जा रहा है। उन्होंने इन परियोजनाओं को विकसित भारत के संकल्प की दिशा में एक बड़ा प्रयास बताया। रक्षा मंत्री ने लाल किले से प्रधानमंत्री द्वारा स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उल्लिखित विकास की सात धाराओं का जिक्र करते हुए कहा कि रक्षा क्षेत्र भी उन्हीं में से एक है, जहां आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दी जा रही है। उनके अनुसार, आज शुरू की गई परियोजनाएं उसी दिशा में उठाए गए ठोस कदम हैं।
जीआरएसई की तीन परियोजनाएं शिपयार्ड की विनिर्माण क्षमता और बुनियादी ढांचे को बढ़ाने पर केंद्रित हैं, ताकि यह नौसेना और अन्य समुद्री एजेंसियों की बढ़ती जरूरतों को बेहतर ढंग से पूरा कर सके। इनमें से राईचक स्थित सुविधा उल्लेखनीय है, जहां 356 मीटर लंबे वाटरफ्रंट, 96 मीटर की जेट्टी और आठ से दस मीटर गहराई के साथ एक आधुनिक जहाज निर्माण केंद्र विकसित किया जाएगा। इस पर अकेले 2,500 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश प्रस्तावित है, जो इसे परियोजनाओं में सबसे बड़ा हिस्सा बनाता है। रक्षा मंत्री ने जीआरएसई की उपलब्धियों की सराहना करते हुए कहा कि इस शिपयार्ड ने सैकड़ों अत्याधुनिक समुद्री पोत बनाकर विदेशी निर्भरता को लगातार कम किया है और यह देश के जहाज निर्माण क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
वहीं यंत्र इंडिया लिमिटेड की दो परियोजनाओं में इशापुर स्थित मेटल एंड स्टील फैक्ट्री का आधुनिकीकरण शामिल है, जहां 1976 से चली आ रही पुरानी मशीनरी और प्रणालियों को बदला जाएगा। इसके तहत करीब 750 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया जा चुका है, जिसका उद्देश्य इंडस्ट्री 4.0 तकनीक पर आधारित परिशुद्ध विनिर्माण क्षमता स्थापित करना है। इसके अतिरिक्त, लगभग 277 करोड़ रुपये की लागत से एक भारी क्षमता वाली हाइड्रोलिक ओपन डाई फोर्जिंग प्रेस स्थापित की जाएगी, जो पुरानी 2,650 टन क्षमता की प्रेस का स्थान लेगी और बंदूक की नालियां, गोला-बारूद के कलपुर्जे तथा अन्य भारी रक्षा उपकरण बनाने में उपयोगी होगी। इसी क्रम में लगभग 474 करोड़ रुपये की लागत से एक रेडियल फोर्जिंग प्लांट भी लगाया जाएगा, जिसमें सुपर एलॉय फोर्जिंग, हवाई बम की नालियां, आयुध उपकरण, रेलवे धुरे और परमाणु रिएक्टर से जुड़े कलपुर्जे तैयार होंगे। ऊर्जा-कुशल और अत्याधुनिक तकनीकों से लैस ये इकाइयां न केवल आयात पर निर्भरता घटाएंगी बल्कि रक्षा, रेलवे और सामरिक क्षेत्रों की जरूरतों को भी पूरा करने में सहायक होंगी।
रक्षा मंत्री ने इस मौके पर वैश्विक जहाज निर्माण उद्योग में उभर रहे एक नए रुझान का जिक्र किया, जिसे उन्होंने 'क्षमता विरोधाभास' की संज्ञा दी। उनके अनुसार एक ओर नौसैनिक और वाणिज्यिक जहाजों की मांग लगातार बढ़ रही है, तो दूसरी ओर पारंपरिक रूप से जहाज निर्माण में अग्रणी रहे देशों की उत्पादन क्षमता धीरे-धीरे घट रही है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति भारत के लिए एक बड़ा अवसर है और भारत में वैश्विक जहाज निर्माण केंद्र बनने की पूरी क्षमता मौजूद है।
रक्षा मंत्री ने पश्चिम बंगाल की ऐतिहासिक विरासत और उसके राष्ट्रीय योगदान को भी याद किया। उन्होंने कहा कि बंगाल ने देश को नई सोच दी है और यहीं से 'वंदे मातरम्' जैसा राष्ट्रगीत भी उपजा। इसके साथ ही उन्होंने सुरक्षा बलों के लिए भूमि आवंटन में तेजी लाने के लिए राज्य सरकार की सराहना की और बताया कि मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की पहल पर सीमा सुरक्षा बल को महज 106 दिनों के भीतर 11 एकड़ भूमि उपलब्ध करा दी गई।
कुल मिलाकर, ये परियोजनाएं केवल रक्षा उत्पादन क्षमता बढ़ाने भर तक सीमित नहीं हैं। इनका सीधा असर रोजगार सृजन, सहायक उद्योगों खासकर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के विस्तार और राज्य के औद्योगिक पुनरुद्धार पर भी पड़ेगा। ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर आपूर्ति श्रृंखलाएं नए सिरे से आकार ले रही हैं, भारत के लिए रक्षा और जहाज निर्माण क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करना रणनीतिक और आर्थिक, दोनों ही दृष्टि से महत्वपूर्ण है। पश्चिम बंगाल में शुरू हुई ये परियोजनाएं इसी दिशा में एक सकारात्मक और दूरगामी पहल के रूप में देखी जानी चाहिए।