भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक यात्रा केवल एक और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भागीदारी भर नहीं है, बल्कि यह भारत की व्यापक कूटनीतिक रणनीति का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिसके दूरगामी प्रभाव आने वाले महीनों में देखे जाएंगे। शंघाई सहयोग संगठन का यह शिखर सम्मेलन 31 अगस्त और 1 सितंबर को आयोजित हो रहा है, और इसमें भाग लेने वाले नेताओं में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तथा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। इस सम्मेलन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह भारत द्वारा आयोजित होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से ठीक पहले हो रहा है, जिसे 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित किया जाना है। ऐसे में बिश्केक में होने वाली मुलाकातें और चर्चाएं, आगामी ब्रिक्स सम्मेलन की दिशा और उसमें प्रमुख नेताओं की भागीदारी तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।
सबसे अधिक कूटनीतिक जिज्ञासा इस बात को लेकर है कि क्या बिश्केक में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बातचीत होगी। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद के बाद संबंधों में आया तनाव पिछले कुछ समय से धीरे-धीरे कम होता दिख रहा है, और दोनों पक्षों की ओर से सामान्यीकरण की दिशा में सकारात्मक संकेत मिले हैं। यदि यह मुलाकात होती है, तो यह न केवल भारत-चीन संबंधों में सुधार की गति को स्पष्ट करेगी, बल्कि यह भी संकेत देगी कि क्या राष्ट्रपति शी नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में व्यक्तिगत रूप से शामिल होंगे। चीन की ओर से अभी तक इस पर कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन बीजिंग की कूटनीतिक परंपरा को देखते हुए माना जा रहा है कि बिश्केक में होने वाली बातचीत ही इस दिशा में स्पष्टता लाने का मंच बन सकती है। इस तरह प्रधानमंत्री की यह यात्रा भारत के लिए दोहरी जिम्मेदारी लेकर आई है—एक ओर शंघाई सहयोग संगठन के मंच पर क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और आतंकवाद विरोधी मुद्दों पर भारत का पक्ष मजबूती से रखना, और दूसरी ओर आगामी ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कूटनीतिक जमीन तैयार करना।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर की हाल की मॉस्को यात्रा भी इसी तैयारी का हिस्सा रही, जहां उन्होंने राष्ट्रपति पुतिन को शंघाई सहयोग संगठन सम्मेलन में मुलाकात और ब्रिक्स सम्मेलन के लिए भारत आने का न्योता दोहराया। भारत ने पिछले कुछ हफ्तों में कनाडा सहित कई देशों के साथ सघन कूटनीतिक संपर्क बनाए रखा है, जो यह दर्शाता है कि नई दिल्ली इस सम्मेलन को केवल एक औपचारिक आयोजन के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत की स्थिति मजबूत करने के अवसर के रूप में देख रही है। ब्रिक्स समूह अब ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के मूल सदस्यों के अलावा मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया जैसे देशों को भी अपने में समेटे हुए है, जिससे इसका वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक भार पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।
इन दोनों सम्मेलनों के समानांतर, एक और महत्वपूर्ण कूटनीतिक मोर्चे पर भारत सक्रियता से जुटा हुआ है—संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अस्थायी सदस्यता के लिए 2028-29 के कार्यकाल की दावेदारी। यह चुनाव 2027 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान होना है, और भारत इसके लिए एशिया-प्रशांत समूह की ओर से उम्मीदवार है। विदेश मंत्री जयशंकर पहले ही औपचारिक रूप से भारत की इस दावेदारी की घोषणा कर चुके हैं। यह भारत का नौवां कार्यकाल होगा यदि यह चुनाव जीता जाता है, और इससे पहले भारत आठ बार सुरक्षा परिषद में अस्थायी सदस्य के रूप में अपनी भूमिका निभा चुका है। मालदीव, फिजी और सिएरा लियोन जैसे कई देशों ने पहले ही भारत की इस उम्मीदवारी को समर्थन देने की घोषणा कर दी है, जो यह दर्शाता है कि वैश्विक स्तर पर भारत की साख और प्रभाव लगातार मजबूत हो रहे हैं।
यहां यह ध्यान देने योग्य है कि शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स जैसे मंचों पर भारत की सक्रिय भागीदारी, केवल आर्थिक और क्षेत्रीय सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए वैश्विक समर्थन जुटाने का भी प्रयास कर रहा है। कई देशों ने संयुक्त बयानों में भारत को सुधारित और विस्तारित सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य के रूप में समर्थन देने की बात दोहराई है। ऐसे में, अस्थायी सदस्यता के लिए हो रहा वर्तमान प्रयास, दीर्घकालिक लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री मोदी की बिश्केक यात्रा एक बहुआयामी कूटनीतिक अभियान की शुरुआत मानी जा सकती है, जिसमें क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग, वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व और संयुक्त राष्ट्र सुधार जैसे मुद्दे आपस में गुंथे हुए हैं। इस यात्रा से निकलने वाले संकेत—चाहे वह शी जिनपिंग के साथ संभावित मुलाकात हो या पुतिन के साथ ब्रिक्स को लेकर चर्चा—आने वाले हफ्तों में नई दिल्ली के कूटनीतिक कैलेंडर की दिशा तय करेंगे। भारत के लिए यह समय अपनी वैश्विक भूमिका को और सशक्त बनाने का है, और इसके लिए आवश्यक है कि वह इन तीनों मोर्चों— शंघाई सहयोग संगठन, ब्रिक्स और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद चुनाव—पर एक सुसंगत और दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाए। यही दृष्टिकोण तय करेगा कि भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक मंच पर किस हद तक अपनी आवाज़ को और प्रभावी बना पाता है।