भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में खेलो इंडिया संवाद कार्यक्रम में देश के खेल जगत को आईना दिखाने वाली एक टिप्पणी की। वर्चुअल माध्यम से सैकड़ों खिलाड़ियों, विद्यार्थियों और स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि ओलंपिक में इतने विविध खेल आयोजित होते हैं कि भारतीय दल उनमें से आधे में भी भाग नहीं ले पाता। उन्होंने इसे "कड़वा सच" करार दिया और स्पष्ट किया कि जब तक भारत उन खेलों में भी उतरना शुरू नहीं करेगा जिनमें अब तक उसकी उपस्थिति नगण्य रही है, तब तक पदक तालिका में सुधार की उम्मीद बेमानी होगी। यह टिप्पणी केवल आंकड़ों की बात नहीं, बल्कि भारत की खेल संस्कृति की एक गहरी संरचनात्मक कमजोरी की ओर इशारा करती है।
आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं। पेरिस ओलंपिक 2024 में कुल बत्तीस खेल शामिल थे, जिनमें से भारत ने मात्र सोलह में हिस्सा लिया, यानी ठीक आधे में। यह कोई एक बार की घटना नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही एक प्रवृत्ति है। भारत परंपरागत रूप से एथलेटिक्स, कुश्ती, बैडमिंटन, निशानेबाजी, मुक्केबाजी और हॉकी जैसे चुनिंदा खेलों तक सिमटा रहा है। तैराकी, जिमनास्टिक्स, रोइंग, कैनोइंग, फेंसिंग, वॉटर पोलो, ट्रायथलॉन और साइकिलिंग जैसे अनेक विधाओं में हमारी उपस्थिति या तो नगण्य है या बिल्कुल नहीं है। जबकि ये सभी खेल ओलंपिक पदक तालिका का बड़ा हिस्सा तय करते हैं। जो देश जितने अधिक खेलों में सक्रिय भागीदारी करता है, उसके पास उतने ही अधिक पदक जीतने के अवसर होते हैं। अमेरिका, चीन, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश इसी रणनीति के दम पर पदक तालिका में शीर्ष पर बने रहते हैं।
प्रधानमंत्री का यह कहना कि उनकी दृष्टि में खेल केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया का अभिन्न अंग है, इस बात को रेखांकित करता है कि समस्या का समाधान केवल चंद प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने से नहीं होगा। असल चुनौती एक ऐसी व्यापक खेल संस्कृति विकसित करने की है, जिसमें बच्चे स्कूली स्तर से ही विविध खेलों से परिचित हों। आज भी अधिकांश सरकारी और निजी विद्यालयों में खेल के नाम पर क्रिकेट, कबड्डी और कुछ पारंपरिक खेलों तक ही सीमित रहा जाता है। तैराकी के लिए स्विमिंग पूल, रोइंग के लिए जलाशय, फेंसिंग या जिमनास्टिक्स के लिए विशेष उपकरण और प्रशिक्षक, इन सबका देशभर में गंभीर अभाव है। जब तक बुनियादी ढांचा और प्रशिक्षण की सुविधाएं व्यापक स्तर पर उपलब्ध नहीं होंगी, तब तक नए खेलों में भागीदारी बढ़ाने की बात केवल कागजों तक सीमित रह जाएगी।
यह स्वीकार करना भी जरूरी है कि पिछले एक दशक में खेल क्षेत्र में सरकार की ओर से प्रयास हुए हैं। टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम, खेलो इंडिया अभियान, राष्ट्रीय खेल शासन अधिनियम और खेल बजट में वृद्धि, ये सभी कदम सही दिशा में बताए जा सकते हैं। खेलो इंडिया यूथ गेम्स के माध्यम से हजारों युवा खिलाड़ियों को मंच मिल रहा है और अठारह वर्ष से कम आयु वर्ग में प्रतिभा तलाशने की कोशिश भी सराहनीय है। लेकिन प्रधानमंत्री का यह ताजा बयान खुद इस बात का संकेत है कि अब तक हुए प्रयास पर्याप्त नहीं रहे। योजनाएं बनाना और बजट बढ़ाना एक बात है, परंतु उन्हें जमीनी स्तर पर, विशेषकर छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में, वास्तविक परिणामों में बदलना पूरी तरह अलग चुनौती है।
एक और पहलू पर गौर करना जरूरी है, वह है खेल प्रशासन की संरचना। भारत में अनेक खेल महासंघ राजनीतिक नियुक्तियों और आंतरिक खींचतान का शिकार रहे हैं। जब तक इन महासंघों में पारदर्शिता, जवाबदेही और पेशेवर प्रबंधन सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक नए खेलों में निवेश और प्रतिभा-खोज की प्रक्रिया प्रभावी ढंग से आगे नहीं बढ़ पाएगी। इसके साथ ही निजी क्षेत्र, कॉरपोरेट प्रायोजकों और गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका को भी विस्तार देने की आवश्यकता है। ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट और जेएसडब्ल्यू स्पोर्ट्स जैसी संस्थाओं ने दिखाया है कि जब निजी संसाधन और सरकारी नीति साथ मिलकर काम करते हैं, तो नतीजे बेहतर आते हैं। इस मॉडल को उन खेलों तक भी विस्तारित करना होगा, जिन्हें अब तक हाशिये पर रखा गया है।
भारत ने 2036 ओलंपिक की मेजबानी के लिए दावेदारी की इच्छा जताई है। यह एक महत्वाकांक्षी और स्वागतयोग्य लक्ष्य है, परंतु मेजबान देश से यह अपेक्षा स्वाभाविक रूप से की जाती है कि वह अधिकतर खेलों में प्रतिस्पर्धी उपस्थिति दर्ज कराए। यदि भारत आज आधे खेलों से ही अनुपस्थित है, तो अगले एक दशक में इस स्थिति को पूरी तरह बदलना एक विशाल चुनौती है, जिसके लिए ठोस, दीर्घकालिक और समयबद्ध योजना चाहिए, न कि केवल कार्यक्रमों में की गई घोषणाएं।
प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी सराहनीय है क्योंकि इसमें आत्म-आलोचना का साहस दिखता है, जो किसी भी सुधार की पहली शर्त होती है। लेकिन अब जरूरत इस स्वीकारोक्ति को ठोस कार्ययोजना में बदलने की है। स्कूली स्तर पर खेल शिक्षा का विस्तार, विविध खेलों के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण, खेल महासंघों में सुधार, और प्रतिभा-खोज की प्रक्रिया को गांव-कस्बों तक पहुंचाना, ये सभी मिलकर ही भारत को वास्तविक अर्थों में एक खेल राष्ट्र बना सकते हैं। यह सच्चाई भले कड़वी हो, लेकिन इसे स्वीकार करना ही आगे बढ़ने की पहली और सबसे जरूरी सीढ़ी है।