भुपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः हिमालय से लेकर एंडीज़ तक और काकेशस से लेकर आल्प्स तक, ऊँचे पहाड़ों पर जमे विशाल हिमनद सदियों से मानव सभ्यता के लिए एक साथ वरदान और खतरा दोनों रहे हैं। ये ग्लेशियर करोड़ों लोगों को पीने और सिंचाई का पानी देते हैं, नदियों को जीवन देते हैं, लेकिन जब यही बर्फ की चादरें अचानक टूटती हैं, खिसकती हैं या पिघलकर बाढ़ का रूप लेती हैं, तो वे कुछ ही मिनटों में हज़ारों जिंदगियाँ लील लेती हैं। इतिहास में दर्ज कुछ सबसे घातक प्राकृतिक आपदाएँ इन्हीं हिमनदों के टूटने से जुड़ी हैं, और आज जलवायु परिवर्तन के दौर में यह खतरा पहले से कहीं अधिक गंभीर होता जा रहा है।
पेरू का हुआस्कारान पर्वत इस मामले में सबसे दुखद उदाहरण है। सन् 1970 में एक शक्तिशाली भूकंप के झटकों से हुआस्कारान की चोटी पर जमी बर्फ और चट्टानों का विशाल हिस्सा टूटकर नीचे गिरा। यह हिमस्खलन कुछ ही मिनटों में एक विशाल कीचड़-मलबे की बाढ़ में बदल गया, जिसने युंगाय शहर सहित आसपास की कई बस्तियों को पूरी तरह मलबे में दबा दिया। अनुमान है कि इस एक हादसे में बीस हज़ार से अधिक लोगों की जान चली गई। गौर करने वाली बात यह है कि इसी पर्वत पर आठ साल पहले, 1962 में भी इसी तरह की एक बर्फीली आपदा आई थी, जिसमें करीब चार हज़ार लोग मारे गए थे। इससे साफ है कि हुआस्कारान क्षेत्र दशकों से इस तरह के हिमस्खलनों के लिए विशेष रूप से संवेदनशील रहा है, फिर भी वहाँ बार-बार बस्तियाँ बसती रहीं, क्योंकि लोगों के पास आजीविका के दूसरे विकल्प सीमित थे।
रूस के काकेशस पर्वतों में स्थित कोल्का ग्लेशियर की घटना भी कम भयावह नहीं थी। सितंबर 2002 में यह ग्लेशियर अचानक अपनी जगह से खिसक गया और बर्फ, चट्टान तथा मलबे का एक विशाल सैलाब करीब बीस किलोमीटर लंबी घाटी में बहुत तेज़ रफ्तार से नीचे उतरा। इस आपदा में करीब एक सौ पच्चीस लोग मारे गए, जिनमें एक प्रसिद्ध रूसी फिल्म निर्देशक की पूरी फिल्म-यूनिट भी शामिल थी, जो उस समय घाटी में शूटिंग कर रही थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस हादसे के पीछे भूमिगत ज्वालामुखीय गतिविधि और ग्लेशियर के आधार पर जमा पानी के दबाव जैसे कारण रहे होंगे।
भारत के उत्तराखंड राज्य ने भी हिमनद आपदाओं का भयंकर दंश झेला है। फरवरी 2021 में चमोली जिले में ऋषिगंगा नदी घाटी में एक हिमस्खलन के बाद बर्फ और चट्टान का विशाल हिस्सा टूटकर नदी में गिरा, जिससे अचानक एक विनाशकारी बाढ़ आ गई। इस बाढ़ ने दो जलविद्युत परियोजनाओं को बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया और दो सौ से अधिक लोग मारे गए या लापता हो गए, जिनमें से कई परियोजना स्थल पर काम कर रहे मज़दूर थे। इससे पहले जून 2013 में केदारनाथ क्षेत्र में भी असामान्य रूप से भारी बारिश और हिमनद झील के फटने से आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई थी, जिसमें हज़ारों तीर्थयात्रियों और स्थानीय निवासियों की जान गई थी। ये दोनों घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि हिमालय क्षेत्र में तेज़ी से पिघलते ग्लेशियर और अस्थिर हिमनद झीलें कितना बड़ा खतरा बनती जा रही हैं।
पर्वतारोहण के दौरान भी हिमस्खलन से जुड़ी कई त्रासदियाँ सामने आई हैं। अमेरिका के माउंट रेनियर पर 1981 में इंग्राहम ग्लेशियर पर हुए एक हिमस्खलन में ग्यारह पर्वतारोहियों की मौत हो गई थी, जो उस पर्वत के इतिहास की सबसे घातक घटना मानी जाती है। इसी तरह नेपाल के माउंट एवरेस्ट पर 2014 में हुए एक हिमस्खलन में एक दर्जन से अधिक शेरपा गाइडों की जान चली गई थी। ये घटनाएँ याद दिलाती हैं कि ऊँचे पहाड़ों पर बर्फ और बर्फीली चट्टानों की स्थिरता कितनी अनिश्चित होती है, और कुशल पर्वतारोही भी इस अप्रत्याशित प्रकृति के आगे असहाय हो जाते हैं।
इन सभी घटनाओं में एक समान सूत्र नज़र आता है। पहला, अधिकतर हिमनद आपदाएँ बिना किसी ठोस पूर्व चेतावनी के अचानक घटित होती हैं, जिससे राहत और बचाव कार्य के लिए बहुत कम समय मिलता है। दूसरा, इन आपदाओं का सबसे अधिक असर उन गरीब और दूरदराज़ की बस्तियों पर पड़ता है, जो नदी घाटियों या पर्वतीय ढलानों के करीब बसी होती हैं और जिनके पास मज़बूत बुनियादी ढाँचा नहीं होता। तीसरा और सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण दुनिया भर के ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं, जिससे उनके भीतर बनने वाली झीलें अस्थिर होती जा रही हैं और हिमस्खलन तथा हिमनद-झील विस्फोट बाढ़ जैसी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ रही हैं।
ऐसे में केवल इतिहास से सीख लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। हिमालय, एंडीज़ और काकेशस जैसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में उपग्रह आधारित निगरानी प्रणाली और स्थानीय स्तर पर पूर्व चेतावनी तंत्र स्थापित करना अनिवार्य हो गया है, ताकि खतरा बढ़ने से पहले ही बस्तियों को सतर्क किया जा सके। साथ ही, नदी घाटियों में निर्माण कार्य और जलविद्युत परियोजनाओं की योजना बनाते समय भूवैज्ञानिक जोखिमों का गंभीरता से आकलन किया जाना चाहिए। सबसे बढ़कर, जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने की वैश्विक कोशिशों में तेज़ी लाना ही इन आपदाओं की जड़ पर प्रहार करने का एकमात्र स्थायी उपाय है। यदि समय रहते सचेत नहीं हुआ गया, तो आने वाले दशकों में ये बर्फीली त्रासदियाँ और अधिक बार तथा और अधिक विनाशकारी रूप में सामने आ सकती हैं।