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केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने नई दिल्ली में दुर्लभ रोगों पर दो दिवसीय (5-6 मई 2026) राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया

May 06, 2026 07:43 AM

केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव श्रीमती पुण्य सलीला श्रीवास्तव ने दुर्लभ रोगों से निपटने में नवाचार, शीघ्र निदान और ठोस सहयोग की जरूरत पर बल दिया

स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (डीएचआर) के सचिव और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल ने दुर्लभ रोगों से ठोस तरीके से निपटने के लिए भारत-विशिष्ट मॉडल, संसाधनों के अधिकतम उपयोग और स्वदेशी नवाचार का आह्वान किया
 

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने आज नई दिल्ली में 5 और 6 मई 2026 को आयोजित होने वाले दो दिवसीय राष्ट्रीय दुर्लभ रोग सम्मेलन का उद्घाटन किया। यह दुर्लभ रोगों से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने के तरीके को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

इस अवसर पर उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव श्रीमती पुण्य सलीला श्रीवास्तव ने कहा कि इस सम्मेलन के आयोजन का मुख्य उद्देश्य हितधारकों के समक्ष आने वाली चुनौतियों को समझना, नवाचारों को प्रोत्साहित करना और देश में दुर्लभ रोगों से निपटने के तरीके को सुदृढ़ करने के लिए नए विचार उत्पन्न करना है। उन्होंने कहा कि दुर्लभ रोगों से निपटने की आवश्यकता को सर्वप्रथम राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 में प्रमुखता से शामिल किया गया था और बाद में दुर्लभ रोगों के लिए राष्ट्रीय नीति, 2021 के शुभारम्भ के माध्यम से इसे संस्थागत रूप दिया गया, जिसने हमारे भारत को दुर्लभ रोगों के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय ढांचा रखने वाले देशों में स्थान दिलाया है।

उन्होंने बताया कि यह नीति देश भर के प्रमुख तृतीयक अस्पतालों- उत्कृष्टता केंद्रों (सीई) के माध्यम से लागू की जाती है। पूर्वोत्तर भारत में दो उत्कृष्टता केंद्रों सहित इसकी संख्या कुछ वर्षों में 8 से बढ़कर 15 हो गई है, जिससे नैदानिक देखभाल और सहायता के लिए राष्ट्रीय ढांचा मजबूत हुआ है। केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने यह भी बताया कि इस नीति के तहत वित्तीय सहायता को धीरे-धीरे बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दिया गया है, जिससे दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित रोगियों के लिए उपचार तक बेहतर पहुंच संभव हो सकेगी। उपचारों की बढ़ती लागत को स्वीकार करते हुए, उन्होंने बताया कि सरकार ने जीवन रक्षक दवाओं को बुनियादी सीमा शुल्क से छूट देने के लिए सक्रिय कदम उठाए हैं, और हाल ही के केंद्रीय बजट में इसके विस्तार की घोषणा की गई है। उन्होंने हितधारकों को ऐसी छूटों के लिए विचार किए जाने वाली अतिरिक्त दवाओं के सुझाव देने के लिए प्रोत्साहित भी किया।

स्वास्थ्य सचिव श्रीमती पुण्य सलीला श्रीवास्तव ने इस बात पर जोर दिया कि राज्यों में जागरूकता सृजन और क्षमता विकास कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं। उन्होंने प्रतिभागियों से उन जिलों की पहचान करने का आग्रह किया जहां ऐसी पहलों को और आगे बढ़ाया जा सकता है। इसके साथ ही, उन्होंने मंत्रालय की ओर से पूर्ण समर्थन का आश्वासन दिया।

बीमारियों के शीघ्र निदान और रोकथाम के महत्व पर जोर देते हुए, उन्होंने आनुवंशिक विश्लेषण, प्रारंभिक पहचान और सुविचारित नैदानिक प्रबंधन की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दुर्लभ बीमारियों के लिए सभी हितधारकों के सामूहिक और निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है, और इस क्षेत्र में प्रगति केवल सुदृढ़ सहयोग के माध्यम से ही संभव है।

उन्होंने आगे बताया कि आनुवंशिक विकारों के प्रबंधन के लिए विशिष्ट पद्धतियों (यूएमएमआईडी) की पहल अपने एनआईडीएएन केंद्रों के माध्यम से  परिचालन में आ रही है, आनुवंशिक परामर्श सेवाओं को मजबूत किया जा रहा है, और दुर्लभ रोग नीति के तहत लगभग 1,800 रोगियों को पहले ही उपचार सहायता मिल चुकी है। उन्होंने प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने और उपचारों तक पहुंच में सुधार लाने के लिए नियामक निकायों और अन्य मंत्रालयों के साथ किए जा रहे सहयोगात्मक प्रयासों की भी सराहना की।

केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के योगदान की सराहना करते हुए दुर्लभ बीमारियों के लिए स्वदेशी अनुसंधान और उपचारों के विकास को आगे बढ़ाने में इसकी भूमिका पर प्रकाश डाला।

अपने संबोधन के समापन में, उन्होंने दो दिवसीय सम्मेलन के दौरान चल रहे प्रयासों और सीखों का दस्तावेजीकरण करने के महत्व पर जोर दिया और विश्वास व्यक्त किया कि विचार-विमर्श सामूहिक संकल्प को और मजबूत करेगा, गति को बढ़ाएगा और दुर्लभ बीमारियों से प्रभावित रोगियों के जीवन को बेहतर बनाने में योगदान देगा।

 

इस अवसर पर बोलते हुए स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (डीएचआर) के सचिव और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल ने पिछले तीन दशकों में दुर्लभ रोगों के क्षेत्र में हुई महत्वपूर्ण प्रगति पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि 1990 के दशक में, किसी संदिग्ध दुर्लभ रोग से पीड़ित रोगी की पहचान होने पर उसकी सहायता मुश्किल होती थी क्योंकि बीमारी का निदान अत्यंत कठिन था और उपचार के विकल्प लगभग अनुपलब्ध थे। आज, हालांकि उपचारों की उच्च लागत को देखते हुए प्रति रोगी 50 लाख रुपये की वित्तीय सहायता भी अपर्याप्त लग सकती है, फिर भी यह उल्लेखनीय प्रगति है कि देश अब दुर्लभ रोगों से पीड़ित बच्चों को सार्थक सहायता प्रदान करने में सक्षम है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह विकास स्वास्थ्य सेवा प्राथमिकताओं में व्यापक बदलाव को दर्शाता है, जहां न केवल सामान्य बीमारियों पर बल्कि दुर्लभ, अक्सर आनुवंशिक स्थितियों से प्रभावित लोगों पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। उन्होंने भारत सरकार के दुर्लभ रोग कार्यक्रम को हजारों बच्चों के लिए आशा का स्रोत बताया और देखभाल प्रदान करने और उपचार को आगे बढ़ाने में उत्कृष्टता केंद्रों द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका की सराहना की।

डॉ. बहल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत को दुर्लभ बीमारियों के निदान, उपचार और रोकथाम के लिए पश्चिमी पद्धतियों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अपने लिए संदर्भ-विशिष्ट मॉडल विकसित करने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि यद्यपि विकसित देशों के पास अधिक संसाधन हैं, फिर भी भारत जनसंख्या-आधारित दृष्टिकोण, निवारक रणनीतियों और सोशल मीडिया तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे उभरते उपकरणों सहित डिजिटल प्रौद्योगिकियों के प्रभावी उपयोग के माध्यम से अपनी शक्तियों का लाभ उठाकर व्यापक पहुंच बना सकता है और शीघ्र निदान में सुधार कर सकता है।

उन्होंने उपलब्ध संसाधनों के अधिकतम उपयोग के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि एक परिभाषित वित्तीय सहायता ढांचे के साथ, निदान और उपचार के तरीकों की सावधानीपूर्वक योजना बनाना आवश्यक है। उन्होंने माता-पिता के आनुवंशिक विश्लेषण और प्रसवपूर्व निदान सहित परिवार-आधारित दृष्टिकोणों के महत्व को रोकथाम और प्रारंभिक हस्तक्षेप के लिए लागत प्रभावी रणनीतियों के रूप में रेखांकित किया।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के किए जा रहे निरंतर प्रयासों पर प्रकाश डालते हुए डॉ. बहल ने कहा कि परिषद दुर्लभ बीमारियों से निपटने के लिए उपलब्ध उपकरणों की श्रृंखला का विस्तार करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही है। इन प्रयासों में चिकित्सा पद्धतियों के स्वदेशीकरण को बढ़ावा देना और उद्योग भागीदारों के सहयोग से तथा उत्कृष्टता केंद्रों के माध्यम से नैदानिक मूल्यांकन द्वारा समर्थित महंगी दवाओं के किफायती विकल्पों के घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करना शामिल है।

डॉ. बहल ने पुनर्उपयोग दवाओं के बारे में भी बात की। ये ऐसी दवाएं होती हैं जो पूरी तरह से रोगमुक्त तो नहीं करतीं, लेकिन परिणामों और जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार कर सकती हैं। उन्होंने बताया कि ऐसी छह दवाओं की पहचान की जा चुकी है और दुर्लभ बीमारियों में उनके उपयोग के लिए नैदानिक प्रयास शुरू किए जा रहे हैं।

इसके अलावा, उन्होंने जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) और वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) जैसे संस्थानों के सहयोग से विकसित की जा रही जीन थेरेपी सहित अत्याधुनिक तकनीकों में हुई प्रगति पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत इस क्षेत्र में लगातार प्रगति कर रहा है और ऐसी उन्नत चिकित्सा पद्धतियों को साकार करने के पहले से कहीं अधिक करीब है। उन्होंने उभरती क्षमताओं के उदाहरण के रूप में सीएआर-टी सेल थेरेपी जैसे विकासों का उल्लेख किया।

अपने संबोधन के समापन में, उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सभी हितधारकों के निरंतर सहयोग, नवाचार और प्रतिबद्धता से भारत में दुर्लभ बीमारियों की देखभाल के परिदृश्य में उल्लेखनीय सुधार होगा। ऐसे में रोगियों और उनके परिवारों को ठोस लाभ प्राप्त होंगे।

स्वास्थ्य सेवाओं की महानिदेशक डॉ. सुनीता शर्मा ने दुर्लभ बीमारियों के शीघ्र निदान और व्यापक प्रबंधन के लिए स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने स्वास्थ्य सेवा के विभिन्न स्तरों पर दुर्लभ रोग सेवाओं को एकीकृत करने की जरूरत पर बल दिया, ताकि सुविधाओं के एक कुशल नेटवर्क के माध्यम से समय पर रेफरल और निरंतर देखभाल सुनिश्चित की जा सके।

डॉ. सुनीता शर्मा ने स्वास्थ्य पेशेवरों के क्षमता विकास, स्क्रीनिंग कार्यक्रमों के विस्तार और मानकीकृत उपचार प्रोटोकॉल अपनाने की महत्वपूर्ण भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि दुर्लभ बीमारियों से प्रभावित रोगियों के लिए शीघ्र निदान और उपचार परिणामों में सुधार के लिए सामुदायिक और स्वास्थ्य सेवा प्रदाता दोनों स्तरों पर जागरूकता बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा।

दो दिनों तक चलने वाले इस सम्मेलन में जीनोमिक प्रौद्योगिकियों में प्रगति, अनुसंधान सहयोग, किफायती उपचार रणनीतियों और रोगी-केंद्रित देखभाल मॉडलों पर केंद्रित कई तकनीकी सत्र आयोजित किए जाएंगे। हितधारकों के बीच समन्वय बढ़ाने और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में सुधार लाने पर विशेष जोर दिया जाएगा।

मंत्रालय ने दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित सभी रोगियों के लिए समय पर, किफायती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच सुनिश्चित करने की अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की और इस महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती से निपटने के लिए विभिन्न संबद्ध क्षेत्रों में निरंतर सहयोग के महत्व पर जोर दिया।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में संयुक्त सचिव (दुर्लभ रोग) श्री सौरभ जैन,  निदेशक (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय) श्रीमती भारती सहाय और विभिन्न उत्कृष्टता केंद्रों के प्रतिभागी भी इस कार्यक्रम में उपस्थित थे।

पृष्ठभूमि

दुर्लभ रोग विभिन्न प्रकार की जटिल स्थितियों का एक समूह हैं जिनके लिए दीर्घकालिक, समन्वित देखभाल की आवश्यकता होती है और जिनका निदान तथा प्रबंधन अक्सर कठिन होता है। यद्यपि प्रत्येक रोग व्यक्तिगत रूप से कम लोगों को पीड़ित करता है, सामूहिक रूप से ये वैश्विक स्तर पर और भारत में एक महत्वपूर्ण आबादी को प्रभावित करते हैं। अधिकांश दुर्लभ रोग आनुवंशिक होते हैं और जीवन के शुरुआती चरणों में, अक्सर बचपन में ही प्रकट हो जाते हैं। ये स्थितियां आमतौर पर दीर्घकालिक, गंभीर और कुछ मामलों में जानलेवा होती हैं, इसलिए समय पर निदान, बेहतर जागरूकता और उपचार तक बेहतर पहुंच रोगी के स्वास्थ्य परिणामों और जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। लगभग 50 प्रतिशत नए मामले बच्चों में होते हैं, जो कम उम्र में होने वाली मृत्यु दर में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

बढ़ती जागरूकता के बावजूद, कई चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं। आम जनता और स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों दोनों में सीमित जागरूकता के कारण अक्सर निदान में देरी होती है या निदान गलत हो जाता है, जिससे रोगियों और उनके परिवारों पर शारीरिक, भावनात्मक और आर्थिक बोझ बढ़ जाता है। इसके अलावा, उपचार के विकल्प सीमित हैं और उपलब्ध चिकित्सा पद्धतियां अक्सर अत्यधिक महंगी होती हैं, जिससे कई रोगियों के लिए उपचार पाना मुश्किल हो जाता है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए, भारत सरकार ने दुर्लभ रोगों के लिए राष्ट्रीय नीति के तहत महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जिसका उद्देश्य एक व्यापक रोकथाम रणनीति के माध्यम से दुर्लभ रोगों की घटनाओं और प्रसार को कम करना तथा उपचार की उपलब्धता और वहनीयता में सुधार करना है। यह नीति उपचार की जरूरतों और लागत के आधार पर दुर्लभ रोगों को तीन समूहों में वर्गीकृत करती है, जिससे देखभाल के लिए एक व्यवस्थित दृष्टिकोण संभव हो पाता है।

वित्तीय सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, मंत्रालय ने अगस्त 2022 में दुर्लभ बीमारियों की सभी श्रेणियों के रोगियों के लिए वित्तीय सहायता को 20 लाख रुपये से बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दिया। संस्थागत क्षमता को और मजबूत करते हुए, दुर्लभ बीमारियों के निदान और उपचार के लिए उत्कृष्टता केंद्रों (सीओई) की संख्या कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 8 से बढ़ाकर 15 कर दी गई है।

राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान के तहत, वर्ष 2026 में उत्कृष्टता केंद्रों की ओर से मंत्रालय के सहयोग से देश भर में 50 से अधिक कार्यशालाएं आयोजित की गईं, जिनका उद्देश्य जागरूकता बढ़ाना, रोकथाम रणनीतियों को मजबूत करना और हितधारकों के सहयोग को बढ़ावा देना था। इन्हीं प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए, वर्तमान राष्ट्रीय सम्मेलन में नीति निर्माता, चिकित्सक, शोधकर्ता, उद्योग प्रतिनिधि और रोगी अधिकार समूह प्रगति की समीक्षा करने और आगे की राह तय करने के लिए एक साथ आए हैं।

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