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चंडीगढ़

प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान की नवीनतम जानकारी

August 01, 2026 09:37 AM

2016 में इसकी शुरुआत से लेकर अब तक 7.91 करोड़ से अधिक गर्भवती महिलाओं को प्रसवपूर्व देखभाल सेवाएं प्राप्त हुईं और 1.24 करोड़ से अधिक उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की पहचान की गई

नमूना पंजीकरण प्रणाली (एसआरएस) के अनुसार भारत का मातृ मृत्यु अनुपात (एमएमआर) 2014-16 में प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर 130 से घटकर 2022-24 में 87 हो गया, अर्थात 43 अंकों की कमी दर्ज की गई

एनएफएचएस-4 (2015-16) के 58.6 प्रतिशत की तुलना में एनएफएचएस-6 (2023-24 ) प्रथम तिमाही के दौरान प्रसवपूर्व पंजीकरण बढ़कर 76.2 प्रतिशत हो गया

चार या उससे अधिक प्रसवपूर्व जांच प्राप्त करने वाली माताओं का प्रतिशत एनएफएचएस-4 के 51.2 प्रतिशत से बढ़कर एनएफएचएस-6 में 65.2 प्रतिशत हो गया

भारत में संस्थागत प्रसव एनएफएचएस-4  के 78.9 प्रतिशत से बढ़कर एनएफएचएस-6 में 90.6 प्रतिशत हो गया
 

प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएमएसएमए) हर महीने की 9 तारीख को नि:शुल्क, सुनिश्चित और गुणवत्तापूर्ण प्रसवपूर्व देखभाल प्रदान करता है।
  • पीएमएसएमए के तहत सभी गर्भवती महिलाओं को नामित सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं (जैसे कि जिला अस्पताल, उपमंडल अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्-एफआरयू, गैर-सीएचसी-एफआरयू और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र) स्त्री रोग विशेषज्ञों/चिकित्सा अधिकारियों द्वारा दवाओं, प्रयोगशाला जांच, अल्ट्रासाउंड और प्रसवपूर्व जांच सहित सेवाएं प्रदान की जाती हैं।
  • निजी क्षेत्र के प्रसूति रोग विशेषज्ञों/चिकित्सकों और सेवानिवृत्त विशेषज्ञों को प्रत्येक माह की 9 तारीख को नामित सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों पर स्वैच्छिक सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
  • सभी गर्भवती महिलाओं को आहार, नींद, नियमित प्रसव पूर्व जांच, संस्थागत प्रसव और स्तनपान सहित पूरक पोषण के बारे में जागरूकता के लिए समूह परामर्श भी प्रदान किया जाता है।
  • सूचना, शिक्षा एवं संचार (आईईसी), अंतरवैयक्तिक संचार (आईपीसी) और व्यवहार परिवर्तन संचार (बीसीसी) गतिविधियाँ संचालित की जाती हैं।

प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएमएसएमए) के शुभारंभ के बाद से हुई प्रगति और मातृ स्वास्थ्य संकेतकों में हुए सुधार निम्नलिखित हैं:

  • इसकी स्थापना (2016) के बाद से 7.91 करोड़ से अधिक गर्भवती महिलाओं को प्रसवपूर्व देखभाल सेवाएं प्राप्त हुई हैं और 1.24 करोड़ से अधिक उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं  की पहचान की गई है।
  • नमूना पंजीकरण प्रणाली (एसआरएस) के अनुसार भारत में मातृ मृत्यु अनुपात (एमएमआर) एसआरएस (2014-16) में प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर 130 से घटकर एसआरएस (2022-24) में प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर 87 हो गया यानी इसमें 43 अंकों की गिरावट आई है।
  • पहली तिमाही में प्रसवपूर्व पंजीकरण 58.6 प्रतिशत एनएफएचएस-4  (2015-16) से बढ़कर एनएफएचएस-6 (2023-24) में 76.2 प्रतिशत हो गया।
  • भारत में चार या उससे अधिक एएनसी जांच प्राप्‍त करने वाली माताओं का प्रतिशत एनएफएचएस-4 (2015-16) में 51.2 प्रतिशत से बढ़कर एनएफएचएस-6 (2023-24) में 65.2 प्रतिशत हो गया।
  • भारत में संस्थागत प्रसव एनएफएचएस-4 (2015-16) में 78.9 प्रतिशत से बढ़कर एनएफएचएस-6 (2023-24) में 90.6 प्रतिशत हो गया।

भारत सरकार ने इस अभियान के अंतर्गत उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की शीघ्र पहचान, रेफरल और प्रबंधन के लिए कई उपाय अपनाए हैं, जिनमें विस्तारित ई-पीएमएसएमए रणनीति के तहत जांच की जाने वाली स्थितियों का विस्तार और मां और बच्चे के स्वस्थ होने तक ऐसी गर्भावस्थाओं की व्यक्तिगत निगरानी शामिल है। प्रमुख कदम निम्‍नलिखित हैं:

  • पीएमएसएमए एक निश्चित दिन की रणनीति पर आधारित है और यह हर महीने की 9 तारीख को विशेषज्ञों/चिकित्सा अधिकारियों द्वारा नि:शुल्क सुनिश्चित और गुणवत्तापूर्ण प्रसवपूर्व जांच प्रदान करता है।
  • व्यापक प्रसवपूर्व जांच के माध्यम से उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं (एचआरपी) की शीघ्र पहचान और नैदानिक प्रबंधन।
  • विस्तारित ई-पीएमएसएमए के तहत सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में मां और नवजात शिशु दोनों के लिए स्वस्थ परिणाम सुनिश्चित करने के लिए प्रसव के 45 दिन बाद तक प्रत्येक पहचान की गई उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था की नाम-आधारित ट्रैकिंग की जाएगी।
  • सभी एचआरपी के लिए तीन अतिरिक्त प्रसवपूर्व जांच की व्यवस्था की गई है, जिनकी जांच चिकित्सा अधिकारियों/प्रसूति विशेषज्ञों द्वारा की जाएगी, ताकि मां और भ्रूण के स्वास्थ्य की निगरानी की जा सके।
  • एचआरपी पंजीकरण के समय लाभार्थियों और आशा कार्यकर्ताओं को स्वचालित एसएमएस अलर्ट, निर्धारित दौरों के लिए अनुस्मारक और अनुवर्ती मुलाकातों के लिए संदेश।
  • सुरक्षित प्रसव और जटिलताओं के समय पर प्रबंधन को सुनिश्चित करने के लिए एचआरपी को निकटतम प्राथमिक रेफरल इकाइयों (एफआरयू) से जोड़ना।
  • फॉलोअप एएनसी जांच के लिए उपस्थित होने हेतु उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं के लिए नि:शुल्‍क परिवहन हेतु प्रोत्साहन राशि का प्रावधान।

सरकार ने निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों और स्वयंसेवी डॉक्टरों को अभियान के तहत गर्भवती महिलाओं को स्वेच्छा से अपनी सेवाएं देने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु निम्नलिखित कदम उठाए हैं:

  • पीएमएसएमए के लिए निजी डॉक्टरों द्वारा किए गए स्वैच्छिक योगदान को मान्यता देने के लिए 'आई प्लेजफॉर9' अचीवर्स अवार्ड्स का प्रावधान।
  • निजी चिकित्सकों के पंजीकरण के लिए एक केंद्रीकृत पीएमएसएमए पोर्टल बनाया गया है।
  • पेशेवर संगठनों की भागीदारी, जैसे कि एफओजीएसआई (फेडरेशन ऑफ ऑब्स्टेट्रिक एंड गायनेकोलॉजिकल सोसाइटीज ऑफ इंडिया) और आईएमए (इंडियन मेडिकल एसोसिएशन)।

सरकार ने पीएमएसएमए को और मजबूत करने के लिए कई उपाय किए हैं, विशेष रूप से देश के ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं:

  • विस्तारित प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (ई-पीएमएसएमए) के तहत प्रत्येक माह के निर्धारित 9वें दिन के अलावा अतिरिक्त पीएमएसएमए सत्रों का प्रावधान  उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं के लिए समय पर अनुवर्ती कार्रवाई और प्रसवपूर्व देखभाल की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए किया गया है।
  • केंद्रीकृत पीएमएसएमए पोर्टल के माध्यम से व्यक्तिगत नाम-आधारित सूचीकरण, ट्रैकिंग और उच्च जोखिम वाली गर्भावस्‍था की निगरानी को मजबूत करना।
  • उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की शीघ्र पहचान, जोखिम वर्गीकरण, समय पर रेफरल और उचित प्रबंधन के लिए सभी स्तरों पर स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की क्षमता निर्माण करना।
  • उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की शीघ्र पहचान और प्रसूति संबंधी जटिलताओं के समय पर प्रबंधन तथा मां और नवजात शिशु के प्रतिकूल परिणामों की रोकथाम के लिए रेफरल लिंकेज।
  • उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं को संगठित करने और उनकी निगरानी करने के लिए आशा कार्यकर्ताओं को मामले-आधारित प्रोत्साहन प्रदान करना, साथ ही लाभार्थियों को निर्धारित प्रसवपूर्व देखभाल (एएनसी) मुलाकातों में उपस्थिति को सुविधाजनक बनाने के लिए परिवहन प्रोत्साहन प्रदान करना।
  • सेवा वितरण और कवरेज में सुधार के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कार्यक्रम कार्यान्वयन की नियमित निगरानी और समीक्षा।
  • नियमित सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) तथा व्यवहार परिवर्तन संचार (बीसीसी) गतिविधियों के माध्यम से जागरूकता बढ़ाना।

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री श्रीमती अनुप्रिया पटेल ने यह जानकारी आज लोकसभा में एक लिखित उत्तर में दी।

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