पश्चिम एशिया की सामरिक राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। अमेरिका और सऊदी अरब के बीच दशकों पुराने रक्षा सहयोग के बावजूद अब रियाद की नई सैन्य रणनीति ने वॉशिंगटन की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्टों के अनुसार सऊदी अरब पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के विकल्प तलाश रहा है और तुर्की के उभरते स्टील्थ जेट कार्यक्रम में भागीदारी पर गंभीरता से विचार कर रहा है। यह कदम क्षेत्रीय हथियार बाज़ार की प्रतिस्पर्धा को नई दिशा दे सकता है।
हाल के संकेत बताते हैं कि सऊदी अरब और तुर्किये के बीच विकसित हो रहे ‘कान’ (Kaan) फाइटर जेट कार्यक्रम को लेकर बातचीत उन्नत स्तर पर पहुंच चुकी है और वर्ष 2026 में किसी औपचारिक समझौते की संभावना जताई जा रही है। चर्चा केवल विमानों की खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें संयुक्त उत्पादन और रक्षा औद्योगिक सहयोग जैसे विकल्प भी शामिल हैं। बातचीत में संभावित संख्या 20 से लेकर 100 विमानों तक बताई जा रही है, जो सौदे के पैमाने और स्थानीय उत्पादन ढांचे पर निर्भर करेगी।
यह कदम अमेरिका के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इसलिए भी माना जा रहा है क्योंकि वॉशिंगटन लंबे समय से खुद को रियाद का प्रमुख हथियार आपूर्तिकर्ता बनाए रखना चाहता है। अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि तुर्की के साथ संभावित समझौते को सीधे अमेरिकी विमानों का विकल्प नहीं माना जा रहा, लेकिन यह सऊदी अरब की बहु-विकल्पीय खरीद नीति को दर्शाता है जो अमेरिकी प्रभाव को चुनौती दे सकती है।
दरअसल, अमेरिका पहले ही सऊदी अरब को अत्याधुनिक एफ-35 स्टील्थ विमानों की बिक्री को लेकर नीतिगत बदलाव कर चुका है। इस निर्णय को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर असर डालने वाला कदम माना गया, क्योंकि इससे पहले ऐसे जेट सीमित सहयोगी देशों तक ही सीमित थे। हालांकि इन विमानों को लेकर सुरक्षा और क्षेत्रीय संतुलन के मुद्दों पर चिंताएं भी उठती रही हैं, विशेषकर इज़राइल की सामरिक बढ़त को लेकर।
इसी पृष्ठभूमि में तुर्की का ‘कान’ कार्यक्रम तेजी से चर्चा में आया है। यह पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ जेट है, जिसका पहला प्रोटोटाइप 2024 में उड़ान भर चुका है और इसके उत्पादन की योजना आने वाले वर्षों में चरणबद्ध रूप से आगे बढ़ाने की है। सऊदी अरब का इसमें निवेश या खरीद विकल्प तलाशना इस बात का संकेत है कि वह अपने रक्षा आधुनिकीकरण और घरेलू एयरोस्पेस उद्योग को मजबूत करने की दिशा में विविध साझेदारियों पर काम कर रहा है।
विश्लेषकों के अनुसार यह घटनाक्रम केवल एक सैन्य सौदे से अधिक है। यह वैश्विक रक्षा बाज़ार में बदलते समीकरणों, तकनीकी साझेदारी की राजनीति और बहुध्रुवीय सैन्य सहयोग की ओर बढ़ते रुझान को दर्शाता है। सऊदी अरब की यह रणनीति उसे अमेरिका, यूरोप और एशिया के रक्षा निर्माताओं के बीच संतुलन बनाकर चलने का अवसर देती है, जबकि अमेरिका के लिए यह अपने पारंपरिक प्रभाव को बनाए रखने की चुनौती बन सकती है।
कुल मिलाकर, पश्चिम एशिया की रक्षा राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है — जहां सहयोग, प्रतिस्पर्धा और तकनीकी साझेदारी की जटिल परतें भविष्य की सामरिक दिशा तय करेंगी।