फरवरी 2022 में शुरू हुआ रूस-यूक्रेन युद्ध अब चौथे वर्ष में प्रवेश कर चुका है। यह संघर्ष केवल सीमाओं और सैन्य रणनीतियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने यूक्रेन के सामाजिक ताने-बाने को गहराई से झकझोर दिया है। हजारों परिवार बिखर गए, लाखों लोग विस्थापित हुए और अनगिनत महिलाएं व बच्चे इस युद्ध की सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं।
युद्ध के शुरुआती महीनों में ही कई बड़े शहरों पर हमले हुए। औद्योगिक ढांचा, ऊर्जा संयंत्र और रिहायशी इमारतें निशाना बनीं। राजधानी कीव से लेकर पूर्वी इलाकों तक, लगातार हमलों ने सामान्य जीवन को ठप कर दिया। लाखों लोग पड़ोसी देशों की ओर पलायन करने को मजबूर हुए। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों के अनुसार, बड़ी संख्या में नागरिकों ने शरणार्थी के रूप में यूरोप के विभिन्न देशों में शरण ली, जबकि करोड़ों लोग देश के भीतर ही विस्थापित हो गए।
सबसे मार्मिक असर परिवारों पर पड़ा है। हजारों सैनिकों और आम नागरिकों की मौत ने देश में विधवाओं और अनाथ बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ा दी है। कई गांवों और कस्बों में ऐसे घर मिल जाएंगे जहां पुरुष सदस्य या तो मोर्चे पर मारे गए या लापता हैं। महिलाओं पर अब परिवार चलाने और बच्चों की परवरिश की दोहरी जिम्मेदारी आ गई है। युद्ध ने बच्चों की शिक्षा भी बुरी तरह प्रभावित की है। स्कूल या तो क्षतिग्रस्त हो चुके हैं या अस्थायी शेल्टर में बदल दिए गए हैं।
आर्थिक मोर्चे पर भी हालात चुनौतीपूर्ण हैं। कृषि और उद्योग को भारी नुकसान पहुंचा है। बुनियादी ढांचे के नष्ट होने से उत्पादन और निर्यात प्रभावित हुआ है। अंतरराष्ट्रीय सहायता के बावजूद पुनर्निर्माण की राह लंबी और कठिन है। ऊर्जा संकट और महंगाई ने आम नागरिकों का जीवन और कठिन बना दिया है।
इस संघर्ष की जड़ में रूस और यूक्रेन के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव हैं, जो अंततः रूस और यूक्रेन के बीच खुली जंग में बदल गए। चार साल बाद भी समाधान की ठोस राह स्पष्ट नहीं दिखती। समय-समय पर शांति वार्ता की कोशिशें हुईं, लेकिन स्थायी युद्धविराम अब तक संभव नहीं हो पाया।
युद्ध ने यूक्रेन को केवल भौतिक रूप से नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी गहरा आघात पहुंचाया है। एक पूरी पीढ़ी बमबारी, विस्थापन और अनिश्चितता के बीच बड़ी हो रही है। पुनर्निर्माण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, राजनीतिक इच्छाशक्ति और स्थायी शांति की दिशा में ठोस कदम अनिवार्य होंगे।
चार वर्षों की यह त्रासदी याद दिलाती है कि युद्ध का सबसे बड़ा बोझ आम नागरिक उठाते हैं। जब तक बंदूकें शांत नहीं होंगी, तब तक उजड़े घरों में लौटती खुशियों की उम्मीद अधूरी ही रहेगी।