पश्चिम एशिया में जारी तनाव और हॉर्मुज जलडमरूमध्य में उभरते संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति को गंभीर चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है। दुनिया के सबसे व्यस्त और रणनीतिक समुद्री मार्गों में शामिल यह जलडमरूमध्य आज भू-राजनीतिक संघर्ष का केंद्र बन चुका है। ऐसे नाजुक समय में भारत ने एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में सक्रिय कूटनीतिक पहल करते हुए ईरान के साथ संवाद को प्राथमिकता दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच हाल ही में हुई बातचीत इसी दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है। यह वार्ता केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसके केंद्र में वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्गों की निर्बाध आवाजाही और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल रहे। भारत ने स्पष्ट रूप से यह संदेश दिया है कि किसी भी परिस्थिति में अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लेन बाधित नहीं होनी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने बातचीत के दौरान अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर जोर देते हुए कहा कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए इनका खुला रहना अनिवार्य है। हालिया घटनाओं में वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए भारत ने इसे अस्वीकार्य करार दिया। यह रुख दर्शाता है कि भारत न केवल अपने हितों की रक्षा कर रहा है, बल्कि वैश्विक व्यापारिक व्यवस्था की स्थिरता के लिए भी प्रतिबद्ध है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस की आपूर्ति होती है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार का अवरोध न केवल क्षेत्रीय, बल्कि वैश्विक आर्थिक संकट को जन्म दे सकता है। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इस स्थिति से सीधे प्रभावित होता है। भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और इसके साथ ही ऊर्जा की मांग भी लगातार बढ़ रही है। पश्चिम एशिया भारत के लिए प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता क्षेत्र है। ऐसे में हॉर्मुज में बढ़ते तनाव से तेल की कीमतों में उछाल और आपूर्ति में बाधा की आशंका बढ़ गई है। सरकार इस चुनौती से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति पर काम कर रही है। एक ओर कूटनीतिक स्तर पर संवाद बनाए रखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और आपूर्ति मार्गों की तलाश भी की जा रही है। इसके अलावा, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को मजबूत करने की दिशा में भी प्रयास तेज किए गए हैं, ताकि आपात स्थिति में देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सके। ईरान ने इस पूरे संकट के लिए अमेरिका और इज़राइल को जिम्मेदार ठहराते हुए क्षेत्र में जारी आक्रामक गतिविधियों को रोकने की आवश्यकता पर बल दिया है। ईरान का यह रुख दर्शाता है कि यह संकट केवल समुद्री मार्गों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे व्यापक भू-राजनीतिक टकराव मौजूद है। इस परिदृश्य में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि वह एक ओर अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ ऐतिहासिक और ऊर्जा संबंधों को भी संतुलित कर रहा है। भारत की विदेश नीति लंबे समय से ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ पर आधारित रही है। हॉर्मुज संकट के दौरान भी भारत ने इसी नीति का पालन करते हुए किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय संतुलित रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री मोदी और ईरानी राष्ट्रपति के बीच संवाद इसी रणनीति का हिस्सा है। भारत का यह दृष्टिकोण उसे वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार और भरोसेमंद साझेदार के रूप में स्थापित करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह नीति उसे भविष्य में मध्यस्थ की भूमिका निभाने में भी सक्षम बना सकती है। हॉर्मुज संकट का असर केवल ऊर्जा आपूर्ति तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव वैश्विक व्यापार, बीमा लागत और समुद्री सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। जहाजों पर बढ़ते हमलों के कारण शिपिंग कंपनियों की लागत बढ़ रही है, जिसका सीधा असर वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है। भारत ने इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सहयोग की अपील की है। साथ ही, भारतीय नौसेना और संबंधित एजेंसियां क्षेत्र में अपने जहाजों और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सतर्क हैं। भारत लगातार यह स्पष्ट कर रहा है कि इस संकट का समाधान केवल संवाद और कूटनीति के माध्यम से ही संभव है। सैन्य कार्रवाई या टकराव से स्थिति और बिगड़ सकती है। ऐसे में भारत की पहल क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। विदेश मंत्रालय और अन्य संबंधित विभाग लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और जरूरत पड़ने पर त्वरित कार्रवाई के लिए तैयार हैं। प्रधानमंत्री स्तर पर हुई बातचीत इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत है। हॉर्मुज संकट ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वैश्विक राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। भारत के लिए यह केवल एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक स्थिरता और रणनीतिक हितों से जुड़ा हुआ प्रश्न है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच हुई बातचीत इस बात का प्रमाण है कि भारत सक्रिय और संतुलित कूटनीति के जरिए न केवल अपने हितों की रक्षा कर रहा है, बल्कि वैश्विक शांति और स्थिरता में भी योगदान देने का प्रयास कर रहा है।