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संपादकीय

ऊर्जा संकट के बीच भारत का मास्टरस्ट्रोक: हर देश से तेल-गैस खरीदने की तैयारी

March 24, 2026 07:30 PM

वैश्विक ऊर्जा संकट, भू-राजनीतिक तनाव और अनिश्चित बाजार परिस्थितियों के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता में रखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में यह स्पष्ट किया कि सरकार कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए हर संभव स्रोत का उपयोग करने की दिशा में काम कर रही है। यह बयान न केवल वर्तमान हालात की गंभीरता को दर्शाता है, बल्कि भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा नीति के बदलते स्वरूप को भी उजागर करता है। भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, और इसके साथ ही ऊर्जा की मांग भी लगातार बढ़ रही है। वर्तमान में भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिससे वह वैश्विक बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बना रहता है। ऐसे में ऊर्जा आपूर्ति में किसी भी प्रकार की बाधा सीधे तौर पर महंगाई, औद्योगिक उत्पादन और आम नागरिक के जीवन पर असर डाल सकती है।पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई ऐसे घटनाक्रम हुए हैं, जिन्होंने ऊर्जा बाजार को अस्थिर बना दिया है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में लगातार तनाव, और प्रमुख तेल उत्पादक देशों के उत्पादन में कटौती जैसे कारकों ने कच्चे तेल की कीमतों को प्रभावित किया है। इन परिस्थितियों में भारत ने व्यावहारिक और संतुलित कूटनीति का परिचय देते हुए विभिन्न देशों के साथ अपने ऊर्जा संबंधों को मजबूत किया है।रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदने का निर्णय भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक कदम साबित हुआ। जहां कई पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, वहीं भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए सस्ते तेल का आयात जारी रखा। इसके साथ ही, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका जैसे देशों के साथ दीर्घकालिक ऊर्जा समझौते भी किए गए हैं, ताकि आपूर्ति की निरंतरता बनी रहे।सरकार का फोकस केवल आयात तक सीमित नहीं है, बल्कि ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण पर भी जोर दिया जा रहा है। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों में निवेश बढ़ाना, नई आपूर्ति लाइनों की तलाश करना और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को अपनाना—ये सभी प्रयास इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। इससे भारत किसी एक क्षेत्र या देश पर निर्भर रहने से बच सकेगा।प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में भी भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। सरकार का लक्ष्य देश को ‘गैस आधारित अर्थव्यवस्था’ में बदलना है। इसके तहत एलएनजी आयात को बढ़ावा दिया जा रहा है, गैस पाइपलाइन नेटवर्क का विस्तार किया जा रहा है और शहर गैस वितरण परियोजनाओं को गति दी जा रही है। इससे न केवल ऊर्जा आपूर्ति मजबूत होगी, बल्कि पर्यावरण प्रदूषण में भी कमी आएगी।ऊर्जा सुरक्षा की इस व्यापक रणनीति में नवीकरणीय ऊर्जा की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत ने सौर और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है और 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इसके अलावा, ग्रीन हाइड्रोजन जैसे उभरते क्षेत्रों में भी निवेश बढ़ाया जा रहा है, जिससे भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा के विकल्प तैयार किए जा सकें।हालांकि, इस रणनीति के सामने कई चुनौतियां भी हैं। वैश्विक बाजार में कीमतों की अस्थिरता, डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी, परिवहन लागत में वृद्धि और पर्यावरणीय प्रतिबद्धताएं—ये सभी कारक नीति निर्माण को जटिल बनाते हैं। इसके अलावा, घरेलू स्तर पर ऊर्जा दक्षता बढ़ाने और वैकल्पिक ईंधनों को अपनाने की गति को और तेज करने की आवश्यकता है।विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी ऊर्जा नीति में लचीलापन बनाए रखना होगा। बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार रणनीति में समय-समय पर बदलाव करना आवश्यक है। ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, दीर्घकालिक अनुबंध, और रणनीतिक भंडारण क्षमता का विस्तार—ये सभी उपाय भविष्य की अनिश्चितताओं से निपटने में सहायक होंगे।इसके साथ ही, घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना भी बेहद जरूरी है। ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत तेल और गैस के अन्वेषण में निजी और विदेशी निवेश को आकर्षित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। नई तकनीकों के उपयोग, नीतिगत सुधारों और बुनियादी ढांचे के विकास से इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी लाई जा सकती है।ऊर्जा कूटनीति के स्तर पर भी भारत की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत अब केवल एक उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक प्रभावशाली भागीदार के रूप में उभर रहा है। प्रधानमंत्री मोदी का यह बयान इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है, जिसमें ऊर्जा सुरक्षा को आर्थिक और रणनीतिक शक्ति से जोड़ा जा रहा है।अंततः, भारत की ऊर्जा रणनीति बहुआयामी और दूरदर्शी होती जा रही है। हर संभव स्रोत से तेल और गैस जुटाने की नीति न केवल वर्तमान संकट से निपटने का उपाय है, बल्कि यह भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित करने की दिशा में एक ठोस कदम भी है। यदि सरकार इसी तरह संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाती रही, तो आने वाले वर्षों में भारत ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर मजबूती से बढ़ सकता है।

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