भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 14 अप्रैल 2026 का दिन एक महत्त्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज होगा। केंद्र सरकार ने संविधान (एक सौ इकत्तीसवाँ संशोधन) विधेयक, 2026 के माध्यम से लोकसभा की सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का ऐतिहासिक प्रस्ताव रखा है। यह प्रस्ताव संसद के विशेष सत्र में 16 और 17 अप्रैल को पेश किया जाएगा। इसके साथ ही परिसीमन विधेयक 2026 भी लाया जा रहा है, जो 2002 के परिसीमन अधिनियम को निरस्त कर उसकी जगह लेगा। यह सब मिलकर भारत की प्रतिनिधित्व प्रणाली में एक आमूल-चूल बदलाव का संकेत देते हैं।लोकसभा की 543 सीटों की संख्या 1977 से अपरिवर्तित है। यह स्थिति 1976 के 42वें संविधान संशोधन के कारण बनी, जिसने परिसीमन को वर्ष 2001 के बाद की जनगणना तक स्थगित कर दिया था। बाद में 84वें संशोधन ने इस स्थगन को 2026 तक और बढ़ा दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत की संसदीय प्रतिनिधित्व व्यवस्था आज भी 1971 की जनगणना के आधार पर चल रही है, जबकि देश की जनसंख्या उस समय से लगभग तीन गुना हो चुकी है।1971 में भारत की जनसंख्या लगभग 54.8 करोड़ थी जो आज बढ़कर 1.4 अरब से अधिक हो गई है। इस विशाल जनसंख्या वृद्धि के बावजूद संसदीय क्षेत्रों का आकार नहीं बदला, जिससे निर्वाचन क्षेत्रों में भारी असमानता आ गई है। उत्तर प्रदेश या बिहार के एक लोकसभा क्षेत्र में लाखों मतदाता होते हैं, जबकि छोटे राज्यों के क्षेत्रों में उसका एक अंश भी नहीं। यह असंतुलन लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के मूल सिद्धांत के विरुद्ध है।प्रस्तावित संशोधन के तहत संविधान के अनुच्छेद 81 में बदलाव किया जाएगा, जिससे लोकसभा में अधिकतम 815 सदस्य राज्यों से और 35 सदस्य केंद्रशासित प्रदेशों से चुने जाएंगे, यानी कुल सीटें 850 हो जाएंगी। यह संख्या न केवल संसद को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाएगी, बल्कि जनगणना आधारित नई वास्तविकताओं को भी संवैधानिक स्वीकृति देगी।इस विधेयक का दूसरा और अत्यंत महत्त्वपूर्ण पहलू है — परिसीमन को जनगणना से अलग करना। संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत अभी यह अनिवार्य है कि परिसीमन 2026 के बाद की पहली जनगणना के आधार पर हो। प्रस्तावित संशोधन इस प्रावधान को पूरी तरह हटाने की बात करता है, जिससे 2026-27 की जनगणना से पहले ही परिसीमन हो सकेगा। इसका सीधा अर्थ है कि परिसीमन 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर हो सकेगा, जो अभी उपलब्ध सबसे नवीनतम जनगणना डेटा है।सरकार का तर्क है कि अगली जनगणना और उसके बाद के परिसीमन में काफी समय लगेगा, जिससे महिला आरक्षण लागू करने में और देरी होगी। यह तर्क न केवल व्यावहारिक है बल्कि राजनीतिक रूप से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण अधिनियम) में महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें देने का प्रावधान है, लेकिन इसे परिसीमन से जोड़ दिया गया था।वर्तमान विधेयक अनुच्छेद 334A में संशोधन का प्रस्ताव करता है, ताकि परिसीमन के तुरंत बाद महिला आरक्षण लागू हो सके। इसमें यह भी प्रावधान है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें उन्हीं वर्गों के लिए पहले से आरक्षित क्षेत्रों में रोटेशन के आधार पर तय होंगी। यह एक दूरदर्शी कदम है जो महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को वास्तविक रूप देने की दिशा में आगे बढ़ता है।परिसीमन विधेयक 2026 के तहत एक स्वतंत्र परिसीमन आयोग गठित किया जाएगा जिसकी अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश करेंगे। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त या नामित चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्य के राज्य चुनाव आयुक्त पदेन सदस्य होंगे। यह संरचना आयोग की निष्पक्षता और संवैधानिक विश्वसनीयता को सुनिश्चित करती है।परिसीमन आयोग के आदेश, गजट में प्रकाशन के बाद, कानून का बल रखेंगे और किसी भी न्यायालय में उन्हें चुनौती नहीं दी जा सकेगी। यह प्रावधान निर्णयों की अंतिमता और शीघ्र कार्यान्वयन की दृष्टि से आवश्यक है।हालाँकि, इस प्रस्ताव के साथ कुछ गंभीर राजनीतिक चिंताएँ भी जुड़ी हुई हैं। दक्षिणी राज्यों — तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना — ने गहरी आपत्ति व्यक्त की है। उनका तर्क है कि जनसंख्या आधारित सीट विस्तार उन्हें उनकी सफल जनसंख्या नियंत्रण नीतियों के लिए दंडित करेगा। यह एक न्यायसंगत चिंता है, क्योंकि दशकों तक परिवार नियोजन में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले राज्यों को यदि प्रतिनिधित्व में नुकसान उठाना पड़े, तो यह नीतिगत विसंगति होगी।तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार राज्यों के साथ उचित परामर्श के बिना संवैधानिक संशोधन को 'बुलडोज' करना चाहती है। विपक्षी दलों का एक वर्ग यह भी माँग कर रहा है कि परिसीमन 2021 की जनगणना के आधार पर हो न कि 2011 की।विपक्ष की एक और माँग यह है कि महिला आरक्षण में पिछड़े वर्गों की महिलाओं के लिए 'कोटे के अंदर कोटे' का प्रावधान किया जाए। यह माँग सामाजिक न्याय की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है और इस पर गंभीर विचार-विमर्श आवश्यक है। 850 सीटों की यह नई व्यवस्था यदि लागू होती है, तो प्रत्येक सांसद एक छोटे निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करेगा, जिससे जनता और जनप्रतिनिधि के बीच की दूरी कम होगी और जवाबदेही बढ़ेगी। इसके अलावा 307 नई सीटें राजनीतिक दलों के लिए नई संगठनात्मक और चुनावी संभावनाओं के द्वार खोलेंगी। यह विधेयक भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे में पाँच दशकों की जड़ता को तोड़ने का साहसिक प्रयास है। संसद में बहुमत के साथ इसे पारित कराना सरकार के लिए संभव है, किंतु इसकी सामाजिक और राजनीतिक स्वीकार्यता के लिए व्यापक सहमति अनिवार्य है। दक्षिण बनाम उत्तर की खाई पाटे बिना यह सुधार अधूरा रहेगा। सरकार को चाहिए कि वह सभी राज्यों को विश्वास में लेकर एक 'क्षतिपूर्ति सिद्धांत' तैयार करे, जिससे जनसंख्या नियंत्रण में अग्रणी रहे राज्यों को नुकसान न हो। अंततः यह विधेयक केवल सीटें बढ़ाने का मामला नहीं है — यह 140 करोड़ नागरिकों के लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को युग के अनुरूप बनाने की आवश्यकता है। यदि इसे समझदारी, समावेश और सर्वसम्मति के साथ लागू किया गया, तो यह भारत के संसदीय लोकतंत्र को नई ऊँचाइयों पर ले जा सकता है।