भारतीय संसद की विशेष बैठक 16 अप्रैल 2026 से शुरू हो रही है और इसके एजेंडे पर जो विधेयक है, वह देश के संवैधानिक ढाँचे को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है। केंद्र सरकार ने संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 संसद में पेश करने का निर्णय किया है, जिसके तहत लोकसभा की सीटों की संख्या मौजूदा 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है। इसके साथ ही परिसीमन विधेयक, 2026 भी लाया जा रहा है जो 2002 के परिसीमन अधिनियम की जगह लेगा। इन दोनों विधेयकों ने राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है, जिसके केंद्र में है — दक्षिण भारत के राज्यों का संसदीय प्रतिनिधित्व और उनका राजनीतिक भविष्य। परिसीमन की यह कवायद दशकों पुरानी एक जटिल संवैधानिक पहेली का हिस्सा है। 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा में 543 सीटें निर्धारित की गई थीं, जब देश की आबादी लगभग 54.8 करोड़ थी। तब से लेकर अब तक जनसंख्या दोगुनी से भी अधिक हो चुकी है, लेकिन सीटों की संख्या जस की तस है। 1976 में इंदिरा गांधी सरकार ने 42वें संविधान संशोधन के जरिये सीटों के पुनर्निर्धारण पर रोक लगाई थी, ताकि जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहन देने वाले राज्यों को राजनीतिक दंड न भोगना पड़े। इस रोक को 2001 में 84वें संशोधन के माध्यम से 2026 तक बढ़ा दिया गया था। अब वह समयसीमा समाप्त हो गई है और इसी के साथ एक बड़ा सवाल सामने आ खड़ा हुआ है — क्या दक्षिण के राज्यों को उनकी सफल जनसंख्या नीतियों का राजनीतिक खामियाजा भुगतना होगा? दक्षिण भारत की चिंता निराधार नहीं है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ने जनसंख्या नियंत्रण में असाधारण सफलता पाई है। इन राज्यों में साक्षरता दर ऊँची है, शिशु मृत्यु दर कम है और विकास के अधिकतर सूचकांकों में ये उत्तर के राज्यों से काफी आगे हैं। इसके बावजूद, यदि परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर हुआ तो इन्हीं उपलब्धियों की कीमत इन राज्यों को संसदीय प्रतिनिधित्व गँवाकर चुकानी पड़ सकती है। विश्लेषकों का अनुमान है कि मौजूदा 543 सीटों के ढाँचे में जनसंख्या-आधारित पुनर्वितरण से दक्षिणी राज्यों को सामूहिक रूप से 24 सीटों का नुकसान हो सकता है। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश अकेले 17 या उससे अधिक सीटें पा सकता है। केंद्र सरकार ने इस चिंता को समझते हुए एक वैकल्पिक रास्ता चुना है — सीटों की कुल संख्या बढ़ाकर सभी राज्यों को कुछ न कुछ देने की कोशिश करना, ताकि किसी को भी सीटें न गँवानी पड़ें। गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट रूप से कहा है कि परिसीमन के बाद किसी भी दक्षिणी राज्य की एक भी सीट कम नहीं होगी। प्रस्तावित विधेयक में 850 सीटों का प्रावधान है जिसमें से 815 राज्यों के लिए और 35 केंद्र शासित प्रदेशों के लिए होंगी। इसका तर्क यह है कि पुराने 543 के ढाँचे को बनाए रखते हुए जनसंख्या के अनुपात में वितरण करने की बजाय, सीटों का दायरा बढ़ाकर दक्षिणी राज्यों के मौजूदा प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखा जाए। किंतु विपक्ष इस तर्क से सहमत नहीं है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने आरोप लगाया है कि संसद सदस्यों को जो विधेयक का मसौदा सौंपा गया है, वह केंद्र द्वारा दी गई उन आश्वासनों से मेल नहीं खाता जो दक्षिणी राज्यों को दिए गए थे। उनका कहना है कि सीटों की कुल संख्या भले ही न घटे, लेकिन लोकसभा में दक्षिणी राज्यों की आनुपातिक हिस्सेदारी कम हो जाएगी, जो एक तरह का राजनीतिक नुकसान ही है। उदाहरण के तौर पर, केरल की लोकसभा में हिस्सेदारी 3.7 प्रतिशत से घटकर लगभग 2.2 प्रतिशत रह सकती है। यह कोई छोटी बात नहीं है, क्योंकि संसदीय राजनीति में अनुपात ही असली शक्ति होती है। इस विवाद की जड़ में एक बुनियादी संवैधानिक तनाव है — "एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य" का लोकतांत्रिक सिद्धांत और संघीय न्याय का सिद्धांत। संविधान का अनुच्छेद 81 यह अपेक्षा करता है कि सभी राज्यों में प्रति निर्वाचन क्षेत्र जनसंख्या का अनुपात यथासंभव समान हो। यह सिद्धांत उत्तर के घनी आबादी वाले राज्यों को अधिक सीटें दिलाने का संवैधानिक आधार देता है। दूसरी ओर, संघीय न्याय का तकाजा है कि उन राज्यों को दंडित न किया जाए जिन्होंने राष्ट्र की भलाई के लिए जनसंख्या नियंत्रण के कठिन रास्ते पर चलने का साहस दिखाया। एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह विधेयक 2023 में पारित महिला आरक्षण अधिनियम — नारी शक्ति वंदन अधिनियम — के क्रियान्वयन से भी जुड़ा है। वह अधिनियम लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करता है, लेकिन उसका अमल जनगणना और परिसीमन के बाद ही होना था। 2021 की जनगणना अभी तक पूरी नहीं हुई है, इसलिए केंद्र ने 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर परिसीमन करने का प्रस्ताव किया है, जिससे महिला आरक्षण का रास्ता 2029 के चुनावों तक खुल सके। यह एक वैध और जरूरी उद्देश्य है, लेकिन इसे परिसीमन के साथ जोड़ने से विवाद और उलझ गया है। परिसीमन आयोग को लेकर भी कुछ चिंताएँ सामने आई हैं। प्रस्तावित ढाँचे में सरकार को गजट अधिसूचना के जरिये आयोग गठित करने का अधिकार होगा और किसी भी अदालत में आयोग के आदेशों को चुनौती नहीं दी जा सकेगी। आलोचकों का तर्क है कि परिसीमन को संवैधानिक रूप से अनिवार्य जनगणना-आधारित प्रक्रिया से हटाकर संसद की साधारण बहुमत वाली विवेकाधीन प्रक्रिया बनाना लोकतांत्रिक सुरक्षा कवच को कमजोर करता है। इस पूरी बहस में एक सकारात्मक पहलू भी है। 16वें वित्त आयोग ने फरवरी 2026 में अपनी रिपोर्ट में राज्यों के कर हिस्से के वितरण में जनसांख्यिकीय प्रयासों और राजकोषीय दक्षता को भी कसौटी बनाया है, जो दक्षिणी राज्यों के लिए एक वित्तीय राहत हो सकती है। अंततः यह बहस केवल संख्याओं की नहीं, बल्कि भारतीय संघवाद की आत्मा की है। जो राज्य विकास में आगे हैं, जिन्होंने जिम्मेदारी से जनसंख्या पर काबू पाया और देश की जीडीपी में अनुपातहीन योगदान किया, उन्हें लोकतंत्र के मंच पर हाशिये पर नहीं धकेला जाना चाहिए। संसद में होने वाली चर्चा इस सवाल का जवाब देगी कि भारत अपनी विविधता का सम्मान करते हुए समान प्रतिनिधित्व का सिद्धांत कैसे लागू करता है। यह बहस इसीलिए जरूरी है, क्योंकि इसका उत्तर न केवल अगले चुनाव, बल्कि अगली पीढ़ियों के लोकतंत्र को आकार देगा।