मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान और अमेरिका के बीच शांति बहाली की कोशिशें एक बार फिर तेज होती नजर आ रही हैं। हालिया घटनाक्रम के अनुसार, दोनों देशों के प्रतिनिधि पाकिस्तान में दूसरे दौर की वार्ता के लिए तैयार हो रहे हैं, जहां एक नाजुक संघर्षविराम (ceasefire) फिलहाल कायम है।
यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब करीब नौ सप्ताह से जारी संघर्ष ने क्षेत्रीय स्थिरता को गंभीर चुनौती दी है। पहले दौर की बातचीत अप्रैल के मध्य में इस्लामाबाद में हुई थी, लेकिन परमाणु कार्यक्रम, यूरेनियम संवर्धन और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई थी।
दूसरे दौर की संभावित वार्ता के लिए अमेरिका की ओर से विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जारेड कुशनर को भेजे जाने की तैयारी है, जबकि ईरान का प्रतिनिधित्व उसके विदेश मंत्री अब्बास अराघची करेंगे। इस बीच पाकिस्तान एक मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है और दोनों देशों के बीच संवाद बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
हालांकि हालात पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, ईरान सीधे अमेरिका के साथ बातचीत को लेकर अभी भी सतर्क रुख अपनाए हुए है और कई मुद्दों पर असहमति बनी हुई है। वहीं अमेरिकी पक्ष भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम और सुरक्षा संबंधी आशंकाओं पर ठोस आश्वासन चाहता है।
दिलचस्प बात यह है कि इन वार्ताओं की तैयारी के चलते पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में कड़े सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं। कई इलाकों में लॉकडाउन जैसी स्थिति देखने को मिली, जिससे आम जनजीवन भी प्रभावित हुआ।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह वार्ता केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजारों के लिए भी बेहद अहम है। खासकर होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे रणनीतिक मार्ग पर तनाव कम होने से तेल आपूर्ति पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।
फिलहाल, संघर्षविराम बना हुआ है, लेकिन इसे “नाज़ुक” माना जा रहा है। किसी भी छोटे विवाद से स्थिति फिर से बिगड़ सकती है। ऐसे में पाकिस्तान में प्रस्तावित यह दूसरा दौर निर्णायक साबित हो सकता है—या फिर एक और असफल प्रयास भी बन सकता है।
आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि क्या यह कूटनीतिक पहल स्थायी शांति का रास्ता खोल पाएगी या फिर क्षेत्र एक बार फिर टकराव की ओर बढ़ेगा।