पश्चिम बंगाल की राजनीति में शुक्रवार को बड़ा संवैधानिक संकट पैदा हो गया जब राज्यपाल ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इस्तीफा देने से इनकार करने के बाद विधानसभा भंग करने की घोषणा कर दी। इस फैसले के बाद राज्य में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है और सभी प्रमुख दल आम चुनाव की संभावनाओं को लेकर सक्रिय हो गए हैं।
सूत्रों के अनुसार, हालिया राजनीतिक घटनाक्रम और विधानसभा में बहुमत को लेकर जारी विवाद के बीच राज्यपाल ने मुख्यमंत्री से स्थिति स्पष्ट करने और आवश्यक होने पर इस्तीफा देने को कहा था। हालांकि ममता बनर्जी ने दावा किया कि उनकी सरकार के पास अब भी पर्याप्त समर्थन मौजूद है और उन्होंने पद छोड़ने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद राजभवन ने संवैधानिक अधिकारों का हवाला देते हुए विधानसभा भंग करने का आदेश जारी कर दिया।
राज्यपाल के इस फैसले के तुरंत बाद तृणमूल कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र पर हमला करार दिया। पार्टी नेताओं ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार राजनीतिक लाभ के लिए संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग कर रही है। वहीं भाजपा ने राज्यपाल के कदम का समर्थन करते हुए कहा कि राज्य में राजनीतिक अस्थिरता और प्रशासनिक अव्यवस्था को देखते हुए यह फैसला जरूरी था।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उनकी पार्टी जनता के बीच जाएगी और लोकतांत्रिक तरीके से जवाब देगी। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष राज्य की जनता के जनादेश का अपमान कर रहा है। ममता ने यह भी संकेत दिया कि उनकी पार्टी इस फैसले को अदालत में चुनौती दे सकती है।
इस घटनाक्रम के बाद राज्य में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। कोलकाता सहित कई संवेदनशील जिलों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है ताकि किसी भी प्रकार की हिंसा या विरोध प्रदर्शन को नियंत्रित किया जा सके। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में आने वाले दिनों में राजनीतिक संघर्ष और तेज हो सकता है।
यदि विधानसभा भंग करने का फैसला कायम रहता है, तो राज्य में जल्द ही नए चुनाव कराए जा सकते हैं। ऐसे में तृणमूल कांग्रेस, भाजपा और अन्य विपक्षी दलों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है। फिलहाल पूरे देश की नजर पश्चिम बंगाल के इस राजनीतिक घटनाक्रम पर टिकी हुई है, जिसने राष्ट्रीय राजनीति में भी नई बहस छेड़ दी है।