केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय को बताया है कि वह गंगा नदी के ऊपरी क्षेत्रों में नए जलविद्युत परियोजनाओं को अनुमति देने के पक्ष में नहीं है। सरकार का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र की पारिस्थितिकी बेहद संवेदनशील है और नए हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स से पर्यावरण, नदी प्रवाह और जैव विविधता पर गंभीर असर पड़ सकता है। यह मामला गंगा और उसकी सहायक नदियों पर प्रस्तावित परियोजनाओं से जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर लंबे समय से अदालत में विचाराधीन है।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में केंद्र ने कहा कि उत्तराखंड के ऊपरी गंगा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियां प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं। सरकार ने यह भी माना कि लगातार सुरंग निर्माण, पहाड़ों की कटाई और नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव से भूस्खलन और आपदा का खतरा बढ़ जाता है। विशेष रूप से 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद हिमालयी परियोजनाओं को लेकर चिंताएं और गहरी हुई हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों और कई सामाजिक संगठनों ने पहले भी अदालत में दलील दी थी कि गंगा के उद्गम क्षेत्र में बनने वाली जलविद्युत परियोजनाएं नदी की अविरलता और निर्मलता पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। उनका कहना है कि इन परियोजनाओं के कारण नदी के कई हिस्से सूखे जैसे दिखाई देने लगते हैं, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी और धार्मिक महत्व दोनों प्रभावित होते हैं। गंगा को करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र माना जाता है, इसलिए इसके प्राकृतिक स्वरूप को सुरक्षित रखना आवश्यक बताया गया है।
केंद्र सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि मौजूदा परियोजनाओं की समीक्षा की जा रही है और भविष्य में पर्यावरणीय मानकों को और सख्त किया जा सकता है। सरकार का जोर अब ऐसे विकास मॉडल पर है जिसमें ऊर्जा जरूरतों और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि सौर और पवन ऊर्जा जैसे वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देकर हिमालयी क्षेत्रों पर दबाव कम किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पहले भी कई बार चिंता जता चुका है और गंगा बेसिन में निर्माण गतिविधियों के दीर्घकालिक प्रभावों पर सवाल उठा चुका है। अब केंद्र के इस रुख को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। आने वाले समय में अदालत इस विषय पर आगे की सुनवाई करते हुए नई दिशानिर्देश जारी कर सकती है।