भूपिंदर शर्मा, चंडीगढ़: राजधानी की सुबह इस बार कुछ अलग है। सड़कों पर बैरिकेड हैं, चौराहों पर बूटों की आहट है, और रेलवे स्टेशनों पर सामान्य से ज़्यादा निगाहें हैं। वजह है 10 अक्टूबर, जब कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने जंतर-मंतर पर बड़े प्रदर्शन का ऐलान किया है। इसे संगठन "जंतर-मंतर 2.0" कह रहा है। सूत्रों के मुताबिक़ छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल से करीब 7,000 सीआरपीएफ जवानों को निकालकर दिल्ली भेजा गया है। साथ ही राजधानी की ओर आने वाली रेलगाड़ियों की आवाजाही पर भी कड़ी नज़र रखी जा रही है।
सीजेपी का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफ़ा देना चाहिए। आंदोलन की जड़ में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर उठे सवाल हैं। संगठन के संस्थापक अभिजीत दिपके पहले मुंबई के शिवाजी पार्क में बड़ी सभा कर चुके हैं। अब उनका दावा है कि देश भर से युवा दिल्ली पहुँचेंगे। सरकार और पुलिस इस दावे को हल्के में लेने के मूड में नहीं दिखती।
इस सख़्ती के पीछे जुलाई का अनुभव है। तब नीट-यूजी पेपर लीक के विरोध में सीजेपी की अगुवाई में हज़ारों प्रदर्शनकारी संसद की ओर कूच करने निकले थे। उस दौरान झड़पें हुईं, भारी बल लगाना पड़ा, और बंगाल से जवानों को हवाई मार्ग से लाना पड़ा। बस्तर के जंगलों में तैनात कंपनियाँ भी राजधानी बुलाई गईं। दिल्ली पुलिस उस दिन से सबक़ लेकर चल रही है। इसी कारण इस बार तैयारी महीनों पहले शुरू हो गई थी।
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार गृह मंत्रालय ने 8 से 12 अक्टूबर के लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की लगभग 221 कंपनियाँ, यानी करीब 23,000 जवान, दिल्ली पुलिस को उपलब्ध कराई हैं। इनमें केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की 85 कंपनियाँ हैं, और सशस्त्र सीमा बल, त्वरित कार्य बल, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस तथा केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल की टुकड़ियाँ भी शामिल हैं। इनके अलावा कम से कम 15,000 दिल्ली पुलिसकर्मी ज़मीन पर रहेंगे। यह तैनाती जी-20 शिखर सम्मेलन के स्तर के क़रीब बताई जा रही है। नई दिल्ली क्षेत्र में कई मार्ग प्रतिबंधित किए जा चुके हैं।
सवाल यह है कि क्या एक लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण धरने के लिए इतना बड़ा सुरक्षा घेरा ज़रूरी है? या फिर यह उस आशंका का नतीजा है कि भीड़ बेक़ाबू हो सकती है?
इस बार सिर्फ़ सड़कें नहीं, रेल मार्ग भी रणनीति का हिस्सा हैं। जानकारों के अनुसार बड़ी संख्या में लोग ट्रेनों से दिल्ली पहुँचते हैं, इसलिए स्टेशनों पर भीड़ की निगरानी और गाड़ियों के संचालन पर नियंत्रण पर ज़ोर है। पुलिस संगठित समूहों की आवाजाही पर ख़ास नज़र रख रही है। पिछले आंदोलन में बसें और अन्य संसाधन मुहैया कराने वालों की पड़ताल भी हो रही है, ताकि देखा जा सके कि इस बार भी उनसे संपर्क तो नहीं किया गया।
विपक्षी दलों और आंदोलनकारियों का आरोप है कि यह तैयारी असहमति को दबाने की कोशिश है। दिपके का दावा है कि कुछ राज्यों में पुलिस कार्यकर्ताओं को नोटिस भेजकर दिल्ली न जाने का दबाव बना रही है और यात्रा के ख़र्च का स्रोत पूछ रही है। उनका तर्क सीधा है: अगर कोई नागरिक ट्रेन का टिकट ख़रीदकर राजधानी जाना चाहता है, तो उसमें आपत्ति क्या? प्रशासन का पक्ष इसके उलट है। उसके मुताबिक़ क़ानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी ज़िम्मेदारी है, और पिछली घटनाएँ बताती हैं कि पहले से तैयारी न हो तो हालात बिगड़ सकते हैं।
सच यह है कि दोनों पक्षों के तर्क में दम है। संविधान शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है, और कोई सरकार इसे यूँ ही नहीं छीन सकती। लेकिन दिल्ली सिर्फ़ प्रदर्शनकारियों की नहीं है। यहाँ संसद है, दफ़्तर हैं, लाखों लोगों की रोज़ की आवाजाही है, और अस्पताल जाती एम्बुलेंस भी है। भीड़ अनियंत्रित हुई तो सबसे ज़्यादा क़ीमत आम आदमी चुकाता है। इसलिए सुरक्षा बलों की मौजूदगी अपने आप में ग़लत नहीं है। असली कसौटी यह है कि बल का इस्तेमाल कितना संयमित होता है और अनुमति, संवाद और जवाबदेही की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रहती है।
एक और पहलू को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। छत्तीसगढ़ और बंगाल जैसे इलाक़ों से जवानों को हटाने का मतलब है कि वहाँ की ज़िम्मेदारियाँ अस्थायी रूप से दूसरों पर आ गई हैं। बस्तर जैसे क्षेत्रों में जहाँ नक्सल-विरोधी अभियान चल रहे हैं, वहाँ बल की कमी का जोखिम कितना है, इस पर सरकार को स्पष्ट जवाब देना चाहिए। राजधानी की सुरक्षा ज़रूरी है, पर देश के बाक़ी हिस्से भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं।
10 अक्टूबर की सुबह तय करेगी कि यह तैनाती एहतियात साबित होती है या अति-प्रतिक्रिया। अगर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, तो बल की मौजूदगी निवारक के रूप में याद की जाएगी। अगर टकराव हुआ, तो दोनों तरफ़ से सवाल उठेंगे: आयोजकों से भीड़ के प्रबंधन पर, और प्रशासन से बल प्रयोग पर।
लोकतंत्र की ख़ूबसूरती यह है कि यहाँ असहमति भी सुनी जाती है और व्यवस्था भी क़ायम रखी जाती है। ज़रूरत इस संतुलन को बनाए रखने की है। प्रदर्शनकारियों को शांति रखनी होगी, और सत्ता को संयम। राजधानी की नज़रें अब इस बात पर हैं कि कल जंतर-मंतर पर इतिहास कौन-सा रूप लेता है।