Thursday, October 08, 2026
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संपादकीय

जीएसटी अफसरों से छिनी गिरफ्तारी की ताकत! ₹5 करोड़ से नीचे अब जेल का डर नहीं? कारोबारियों को राहत, पर सरकार के सामने बड़ी परीक्षा

October 08, 2026 09:26 PM

 भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः सुबह-सुबह दफ्तर की घंटी बजे, दरवाज़े पर कर अधिकारी खड़े हों और कुछ ही घंटों में आप हिरासत में हों। यह डर बरसों से छोटे-बड़े कारोबारियों की नींद उड़ाता रहा है। अब जीएसटी परिषद के फ़ैसले ने इस डर की जड़ पर चोट की है। अधिकारियों से गिरफ्तारी का अधिकार लेने और अभियोजन की सीमा ₹1 करोड़ से बढ़ाकर ₹5 करोड़ करने का कदम देश के कर-प्रशासन के सबसे बड़े मोड़ों में गिना जाएगा। सवाल यह है कि यह ईमानदार करदाता के लिए खुला रास्ता बनेगा या बेईमानों के लिए चोर दरवाज़ा।

पहले समझ लें कि बदल क्या रहा है। केंद्रीय जीएसटी क़ानून की धारा 69 के तहत आयुक्त की अनुमति से अधिकारी किसी को सीधे गिरफ्तार कर सकते थे, बशर्ते मामला गंभीर अपराध का हो और कर चोरी, फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट या ग़लत रिफंड की रकम ₹1 करोड़ से ऊपर हो। नए प्रस्ताव में यह फ़ैसला अफसर की मेज़ से हटकर अदालत की चौखट पर पहुँच जाता है। यानी मुकदमा चलाने की नौबत आए और अपराध साबित होने लायक आधार हो, तो गिरफ्तारी न्यायिक आदेश से ही होगी। साथ ही आपराधिक कार्यवाही की न्यूनतम सीमा सीधे पाँच गुना होकर ₹5 करोड़ हो जाएगी।

इस फ़ैसले के पीछे सरकार का तर्क "करदाता पर भरोसा" है। वित्त मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, गिरफ्तारी की शक्ति जीएसटी में इसलिए आई कि यह उस पुराने उत्पाद शुल्क क़ानून से विरासत में मिली थी, जो 2017 में जीएसटी में समा गया। वैट और सेवा कर जैसे अन्य कर क़ानूनों में अधिकारियों के पास ऐसा अधिकार कभी था ही नहीं। उस दौर में इनवॉइस का मिलान हाथ से करना मुश्किल था, इसलिए डर को हथियार बनाया गया। आज तकनीक इतनी आगे है कि जीएसटीएन के आँकड़े खुद बता देते हैं कि कहाँ गड़बड़ी है। तर्क यह है कि जब डेटा पकड़ सकता है, तो हथकड़ी की क्या ज़रूरत।

आँकड़े इस बहस को और दिलचस्प बनाते हैं। रिपोर्टों के अनुसार 2021-22 से 2024-25 के बीच केंद्रीय जीएसटी इकाइयों ने उल्लंघन के 72,393 मामले दर्ज किए, पर गिरफ्तारियाँ सिर्फ़ 887 हुईं। यानी हज़ारों मामलों में गिरफ्तारी की ज़रूरत नहीं पड़ी, फिर भी उसका साया पूरे कारोबारी जगत पर मंडराता रहा। उद्योग जगत की पुरानी शिकायत रही है कि वर्गीकरण, मूल्यांकन या इनपुट टैक्स क्रेडिट पर मतभेद जैसे सामान्य विवाद भी अपराध जैसा रूप ले लेते थे। नया ढाँचा ऐसे विवादों को आपराधिक दायरे से बाहर रखने की कोशिश करता है।

प्रस्तावित पैकेज में अपराधों की सूची भी छाँटी जा रही है। बताया गया है कि अभियोजन से जुड़े 24 अपराधों को नरम किया जाएगा, नौ को पूरी तरह हटाया जाएगा और 11 को जस का तस रखा जाएगा। अदालतों को सज़ा तय करने में ज़्यादा विवेक देने की बात भी है। इसी कड़ी में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड पहले ही प्रत्यक्ष कर की वसूली के नियमों से "गिरफ्तारी और हिरासत" का प्रावधान हटा चुका है। साफ़ है कि सरकार अब कर-चूक को हर हाल में अपराध मानने की सोच से पीछे हट रही है।

अब वह बात, जो सुर्खियों में अक्सर छूट जाती है। यह छूट का लाइसेंस नहीं है। अधिकारियों के पास टैक्स, ब्याज और जुर्माना वसूलने की ताकत पहले की तरह बनी रहेगी। जानबूझकर की गई चोरी और संगठित फर्जीवाड़े में आपराधिक मुकदमा चल सकेगा, और अदालत के आदेश पर गिरफ्तारी भी होगी। सूत्रों के मुताबिक गिरफ्तारी का प्रावधान क़ानून से पूरी तरह नहीं मिट रहा, सिर्फ़ मुकदमे से पहले की मनमानी गिरफ्तारी पर रोक लग रही है। ऐसे मामलों में भारतीय न्याय संहिता का सहारा भी लिया जा सकता है। यानी असली दोषी के लिए बचाव का रास्ता नहीं खुला, बस रास्ते पर एक जज की निगरानी जुड़ गई है।

फिर भी चुनौतियाँ कम नहीं हैं। पहली चिंता यह है कि ₹5 करोड़ की सीमा से नीचे रहकर चोरी करने वालों के हौसले बढ़ेंगे, खासकर फर्जी बिल बनाने वाले गिरोहों के। हाल ही में फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट के सैकड़ों करोड़ के मामलों में कई फर्जी कंपनियों का भंडाफोड़ हुआ है, और ऐसे जाल को तोड़ने में गिरफ्तारी का डर अक्सर कारगर रहा है। दूसरी चिंता राज्यों की है। सूत्रों के मुताबिक एक-दो राज्य इस अधिकार को बनाए रखना चाहते हैं, हालाँकि सरकार को उम्मीद है कि वे सहमत हो जाएँगे। तीसरी चिंता व्यावहारिक है। परिषद की सिफ़ारिश के बाद क़ानून में संशोधन ज़रूरी है, जो संसद के शीतकालीन सत्र में आने की उम्मीद है, और बदलाव के लागू होने में 2027 की शुरुआत तक का समय लग सकता है। तब तक पुराना डर पूरी तरह खत्म नहीं होगा।

सबसे बड़ी परीक्षा सरकार की डेटा-आधारित निगरानी की होगी। अगर जीएसटीएन का तंत्र समय रहते फर्जीवाड़ा पकड़ पाया, तो यह सुधार भरोसे और निवेश का नया दौर शुरू कर सकता है। अगर नहीं, तो राजस्व के रिसाव की कीमत पूरा देश चुकाएगा।

यह बदलाव कारोबारी जगत के लिए साँस लेने की जगह है, पर सरकार के लिए अपनी नई ताकत, यानी तकनीक, साबित करने की चुनौती भी। भरोसे की नींव तभी टिकेगी जब ईमानदार को चैन मिले और बेईमान को सज़ा।

 

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