भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः एक अक्टूबर 1926 की तारीख़ भारतीय प्रशासनिक इतिहास में एक नई शुरुआत की गवाह बनी। जब देश परतंत्रता के दौर से गुज़र रहा था, तब लोक सेवा आयोग की स्थापना हुई, जिसे आगे चलकर करोड़ों युवाओं के सपनों का भरोसेमंद द्वार बनना था। आज वही संस्था अपने सौ वर्ष पूरे कर चुकी है। इस गौरवशाली अवसर पर नई दिल्ली में आयोजित शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इक्कीसवीं सदी की भारतीय कार्यसंस्कृति जन-हितैषी, सक्रिय और सुशासन, इन तीन स्तंभों पर टिकी है। यह संदेश केवल एक संस्था के उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले दशकों में शासन की दिशा का उजला संकेत भी है।
इन तीनों शब्दों की गहराई को समझना ज़रूरी है। "जन-हितैषी" होने का अर्थ है कि शासन की हर योजना और हर निर्णय का केंद्र आम नागरिक हो। जब कोई किसान, विद्यार्थी, श्रमिक या गृहिणी सरकारी तंत्र के पास जाए, तो उसे सहयोग और सम्मान मिले, भटकाव और असुविधा नहीं। यही वह भावना है जो व्यवस्था और नागरिक के बीच भरोसे का पुल बनाती है। लोकतंत्र की असली सफलता भी इसी में है कि अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक विकास की रोशनी पहुँचे।
दूसरा स्तंभ "सक्रियता" है। अच्छा प्रशासन वह है जो समस्या के आने से पहले उसकी आहट पहचान ले। समय रहते निर्णय लेना, तकनीक का सदुपयोग करना और नागरिकों की ज़रूरतों का पूर्वानुमान लगाकर आगे बढ़ना ही आज की कार्यसंस्कृति की पहचान बनना चाहिए। डिजिटल सेवाओं के विस्तार ने यह दिखाया है कि जब इच्छाशक्ति हो, तो प्रक्रियाएँ सरल और गति तेज़ हो सकती हैं। सक्रिय अधिकारी केवल आदेश का पालन करने वाला नहीं, बल्कि समाधान खोजने वाला साथी होता है।
तीसरा स्तंभ "सुशासन" है, जिसमें पारदर्शिता, जवाबदेही और परिणाम-केंद्रित सोच समाई हुई है। योजनाओं की घोषणा से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उनका लाभ सही व्यक्ति तक, सही समय पर पहुँचे। सुशासन वह कसौटी है जिस पर किसी भी सरकार और उसकी मशीनरी को परखा जाता है, और इसी से जनता का विश्वास गहरा होता है।
अब ज़रा इस संस्था की यात्रा पर नज़र डालिए। 1926 में स्थापित लोक सेवा आयोग को 1935 में संघीय लोक सेवा आयोग का रूप मिला। फिर 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ यह संघ लोक सेवा आयोग बना और इसे संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ। संविधान का अनुच्छेद 315 इसकी बुनियाद है। सरदार वल्लभभाई पटेल ने सिविल सेवाओं को देश का "स्टील फ़्रेम" कहा था, और सौ वर्षों में इस संस्था ने उस मज़बूती को बनाए रखने का प्रयास किया है। निष्पक्ष चयन, योग्यता की प्रतिष्ठा और संवैधानिक मर्यादा, यही इसकी सबसे बड़ी पूँजी रही है।
इस यात्रा का सबसे प्रेरक पहलू वे असंख्य युवा हैं जिन्होंने साधारण पृष्ठभूमि से आकर असाधारण मुकाम हासिल किया। किसी छोटे गाँव के सरकारी स्कूल में पढ़ा विद्यार्थी, किसी किसान या मज़दूर का बेटा-बेटी, किसी छोटे शहर की मेहनती लड़की, ये सब कड़ी मेहनत के बल पर प्रशासन की अग्रिम पंक्ति में पहुँचे हैं। यह परीक्षा इस विश्वास का प्रतीक है कि भारत में प्रतिभा को अवसर मिल सकता है, और यही भरोसा करोड़ों परिवारों को सपने देखने का साहस देता है।
प्रधानमंत्री के संबोधन का सार यही है कि प्रशासनिक सेवा केवल एक प्रतिष्ठित करियर नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का सुअवसर है। जो युवा आज तैयारी में जुटे हैं, उनके लिए यह प्रेरणा है कि पद की चमक से बड़ा लक्ष्य जनसेवा है। जो अधिकारी हर नागरिक की समस्या को अपनी ज़िम्मेदारी मानता है, वही सही अर्थों में बदलाव का वाहक बनता है। और जो वर्तमान सेवारत अधिकारी हैं, उनके लिए यह अवसर अपने कार्य का मूल्यांकन करने और नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ने का है।
आयोग ने भी शताब्दी वर्ष को केवल उत्सव तक सीमित न रखकर, साल भर चलने वाली पहलों के माध्यम से इसे सार्थक बनाने का संकल्प लिया है। विशेष प्रतीक-चिह्न, अभ्यर्थियों के लिए नया पोर्टल और संवाद के नए माध्यम इसी दिशा के कदम हैं। परीक्षा-प्रणाली की पारदर्शिता, बदलते समय के अनुरूप कौशल की परख और अभ्यर्थियों के भरोसे को बनाए रखना आगे भी प्राथमिकता रहेगी।
विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब नीतियों के साथ उन्हें लागू करने वाली मशीनरी भी संवेदनशील, सक्षम और समर्पित हो। इसलिए "जन-हितैषी, सक्रिय और सुशासन" का यह त्रिसूत्र केवल भाषण का वाक्य नहीं, बल्कि हर कार्यालय की दीवार पर लिखा जाने योग्य संकल्प है। ज़िला मुख्यालय से लेकर सुदूर गाँव तक, जब यह भावना व्यवहार में उतरेगी, तब नागरिक का अनुभव बदलेगा।
इतिहास गवाह है कि संस्थाएँ तभी अमर होती हैं जब वे समय के साथ स्वयं को निरंतर निखारती हैं। सौ वर्ष पूरे करना गर्व की बात है, पर उससे भी बड़ी बात यह है कि अगले सौ वर्षों की नींव आज के संकल्पों से रखी जा रही है। यदि यह कार्यसंस्कृति सचमुच जड़ें जमाती है, तो भारत केवल एक बड़ी अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील, कुशल और भरोसेमंद शासन-व्यवस्था वाला राष्ट्र भी कहलाएगा। शताब्दी का यह पड़ाव अंत नहीं, एक उज्ज्वल शुरुआत है।