भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः महाराष्ट्र एक बार फिर सूखे की भीषण चपेट में आ गया है, और इस बार आंकड़े पहले से कहीं ज़्यादा डरावने हैं। राज्य सरकार ने शनिवार को आधिकारिक रूप से घोषणा की कि प्रदेश के कुल 358 तालुकों में से 265 तालुके सूखाग्रस्त घोषित किए गए हैं। यानी राज्य का करीब पचहत्तर प्रतिशत हिस्सा इस समय पानी और फसल के संकट से जूझ रहा है। यह आंकड़ा सिर्फ सरकारी फाइलों की एक पंक्ति नहीं, बल्कि लाखों किसान परिवारों की रोज़ी-रोटी, उनके खेतों की मिट्टी और आने वाले महीनों की अनिश्चितता की कहानी है।
राहत एवं पुनर्वास विभाग द्वारा जारी सरकारी प्रस्ताव के अनुसार, यह निर्णय खरीफ़ 2026 सीज़न के दौरान हुई कम बारिश और सूखा प्रबंधन संहिता 2016 के तहत निर्धारित मानदंडों के आधार पर लिया गया है। कृषि आयुक्त की रिपोर्ट के बाद यह स्पष्ट हो गया कि इन 265 तालुकों में "ट्रिगर-1" यानी पहली चेतावनी की स्थिति लागू हो चुकी है। सीधे शब्दों में कहें तो बारिश की कमी और फसल की बुवाई के प्रतिशत ने वैज्ञानिक मानकों को पार कर दिया, जिसके चलते सरकार को यह कदम उठाना पड़ा।
सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाकों की बात करें तो मराठवाड़ा और विदर्भ इस संकट के केंद्र में हैं। छत्रपति संभाजीनगर मंडल में ही 74 तालुके सूखाग्रस्त घोषित हुए हैं, जिनमें नांदेड़ में 14, बीड में 11, लातूर में 10 और जालना, धाराशिव व परभणी जैसे जिले शामिल हैं। कोंकण जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित समझे जाने वाले क्षेत्र में भी रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग और रायगढ़ के कुछ तालुके इस सूची में आ गए हैं, जो यह दिखाता है कि इस बार सूखे का असर सिर्फ पारंपरिक रूप से कमज़ोर इलाकों तक सीमित नहीं रहा।
अब सवाल यह है कि सरकार इस संकट से निपटने के लिए क्या कर रही है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, जो कुछ दिन पहले ही मराठवाड़ा, विदर्भ और सोलापुर के दौरे पर गए थे, ने साफ़ शब्दों में कहा कि इस कृषि संकट से निपटने में धन की कोई कमी नहीं आने दी जाएगी। उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार, जो फिलहाल नांदेड़ जिले के सूखा प्रभावित गांवों का दौरा कर रही हैं, ने भरोसा दिलाया कि सरकार किसानों के साथ खड़ी है और उन्हें अकेला नहीं छोड़ा जाएगा। वहीं उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने विदर्भ के प्रभावित गांवों में जाकर किसानों से हिम्मत न हारने की अपील की और पर्याप्त आर्थिक सहायता का वादा किया।
सरकार ने जो 12-सूत्री राहत पैकेज घोषित किया है, उसमें कई अहम प्रावधान शामिल हैं। सूखाग्रस्त तालुकों में भूमि राजस्व में छूट दी जाएगी, फसल ऋण का पुनर्गठन होगा और कृषि संबंधी कर्जों की वसूली पर रोक लगाई जाएगी। इसके अलावा कृषि पंपों की बिजली आपूर्ति काटे जाने पर सख्त पाबंदी लगाई गई है, ताकि किसान सिंचाई से वंचित न रह जाएं। खाद्यान्न की कमी न हो, इसके लिए लक्षित वितरण प्रणाली लागू करने के निर्देश दिए गए हैं, खासकर उन खेतिहर मजदूरों के लिए जो दिहाड़ी पर निर्भर हैं। पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने और प्रभावित इलाकों में जल संरक्षण कार्यों को तुरंत शुरू करने के आदेश भी दिए गए हैं। साथ ही पीने के पानी और पशुधन के लिए जल संसाधनों की व्यापक योजना बनाने की बात भी कही गई है। प्रशासन को नुकसान का सटीक आकलन करने के लिए क्षतिग्रस्त खेतों की जीपीएस टैगिंग वाली तस्वीरें एकत्र करने और कृषि आयुक्त के माध्यम से विस्तृत फसल क्षति रिपोर्ट सरकार को सौंपने का भी निर्देश दिया गया है।
लेकिन क्या सिर्फ घोषणाएं और रियायतें काफी हैं? विपक्ष इस सवाल को लगातार उठा रहा है। महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने कहा कि सूखे की व्यापकता और किसानों की आर्थिक स्थिति को देखते हुए अब सिर्फ रियायतों की नहीं, बल्कि सीधी और पर्याप्त आर्थिक मदद की ज़रूरत है। उनका यह भी कहना है कि पशुओं को बचाने के लिए पर्याप्त चारा और पशु आहार उपलब्ध कराया जाना चाहिए, और सूखा घोषित करने से सरकार की ज़िम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।
इतिहास पर नज़र डालें तो महाराष्ट्र के लिए सूखा कोई नई बात नहीं है। बीते दशकों में भी राज्य ने कई बार ऐसी स्थितियां देखी हैं, जब सैकड़ों गांवों में भूजल स्तर मीटरों में गिर गया था। लेकिन इस बार पचहत्तर प्रतिशत तालुकों का प्रभावित होना यह संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन और अनियमित मानसून का असर अब पहले से कहीं अधिक व्यापक और गहरा होता जा रहा है।
आने वाले महीनों में असली परीक्षा इस बात की होगी कि सरकार की घोषणाएं ज़मीन पर कितनी तेज़ी से और कितनी ईमानदारी से लागू होती हैं। किसानों के खातों में मुआवज़ा कब पहुंचेगा, बिजली और पानी की आपूर्ति सुचारु रहेगी या नहीं, और चारे की कमी से पशुधन बचेगा या नहीं—इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि यह राहत पैकेज सिर्फ कागज़ी दस्तावेज़ बनकर रह जाता है या वाकई महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त किसानों के लिए संजीवनी साबित होता है।