भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः व्हाइट हाउस के सामने बिछा लाल कालीन, सैन्य बैंड की धुन, तोपों की सलामी और आसमान में गरजते बी-1 बॉम्बर विमान — 23 सितंबर 2026 की शाम अमेरिका ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का ऐसा स्वागत किया, जैसा किसी विदेशी नेता को शायद ही कभी नसीब हुआ हो। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक बड़ा सवाल छिपा है — क्या यह भव्य आयोजन सच में अमेरिका-चीन रिश्तों में पिघलाव की शुरुआत है, या सिर्फ कैमरों के लिए सजाया गया एक तमाशा?
आमतौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति विदेशी मेहमानों का स्वागत व्हाइट हाउस में करते हैं, लेकिन इस बार डोनाल्ड ट्रंप खुद मेलानिया ट्रंप के साथ मैरीलैंड के ज्वाइंट बेस एंड्रयूज पहुंचे, जहां शी जिनपिंग और उनकी पत्नी पेंग लियुआन एक विशाल एयर चाइना विमान से उतरे। पिछले 11 वर्षों में यह पहला मौका था जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने किसी विदेशी नेता का स्वागत एयरबेस पर जाकर किया — इससे पहले यह सम्मान 2015 में बराक ओबामा ने पोप फ्रांसिस को दिया था। यह शी जिनपिंग की 11 साल में पहली अमेरिका राजकीय यात्रा भी है, और तीन दिन तक चलने वाले इस दौरे में व्हाइट हाउस में औपचारिक बातचीत, दक्षिणी लॉन पर सैनिकों का निरीक्षण और भव्य राजकीय भोज जैसे आयोजन शामिल हैं।
चीनी सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक, शी जिनपिंग ने अपने बयान में कहा कि चीन और अमेरिका को "प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि साझेदार" बनना चाहिए और दोनों देशों के बीच "शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का ऐतिहासिक तर्क" आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
इस भव्य स्वागत को लेकर खुद अमेरिका में तीखी आलोचना हो रही है। सीनेट की सशस्त्र सेवा समिति के अध्यक्ष रोजर विकर ने सीनेट के पटल पर साफ कहा कि अगर व्हाइट हाउस उनसे सलाह लेता, तो वे कभी शी जिनपिंग को इतने शानदार स्वागत के लिए वॉशिंगटन बुलाने की सिफारिश नहीं करते — उनका कहना था कि चीन और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े इतने विवादित मुद्दे हैं कि यह सम्मान बेमानी लगता है। वहीं डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने भी सवाल उठाते हुए कहा कि ट्रंप को शी की तारीफ करने के बजाय ईरान मामले में चीन की भूमिका पर सख्ती दिखानी चाहिए थी। यानी यह मामला सिर्फ विपक्ष बनाम सत्ता का नहीं, बल्कि खुद सत्तारूढ़ पार्टी के भीतर भी असहमति का है।
इस दौरे की एक बड़ी उपलब्धि जरूर सामने आई — अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने ऐलान किया कि दोनों देशों ने ग्यारह महीने पुराने व्यापार समझौते, जिसे "बुसान एग्रीमेंट" कहा जाता है, को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई है। यह समझौता 10 नवंबर को खत्म होने वाला था, अब इसे 10 जनवरी तक बढ़ा दिया गया है। इससे भारी-भरकम टैरिफ की मार से फिलहाल राहत मिली है। ट्रंप ने भी कहा कि दोनों देशों ने व्यापार संबंधों में "जबरदस्त प्रगति" की है।
लेकिन विश्लेषकों की मानें तो यह सिर्फ एक अस्थायी राहत भर है, कोई स्थायी समाधान नहीं। असली और बड़े मुद्दे — जैसे बोइंग विमानों और कृषि उत्पादों की बड़े पैमाने पर खरीद, या पारस्परिक टैरिफ में स्थायी कटौती — अब भी अधर में लटके हैं।
इस पूरी बातचीत में सबसे संवेदनशील मुद्दा रहा ताइवान। खुद व्हाइट हाउस की बैठक में शी जिनपिंग ने ट्रंप से कहा कि अमेरिका को ताइवान की स्वतंत्रता का विरोध करना चाहिए — चीनी सरकारी मीडिया के मुताबिक यह बयान सीधे तौर पर दिया गया। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, शी यह उम्मीद कर रहे हैं कि ट्रंप ताइवान को हथियारों की बिक्री रोक दें, और इसके बदले चीन ईरान पर दबाव बनाने में अमेरिका की मदद करने को तैयार है। जानकारों की चिंता यह है कि कहीं ट्रंप आर्थिक फायदे के लालच में ताइवान को लेकर अमेरिका के पारंपरिक रुख से समझौता न कर लें — यह वह रुख है जिस पर एशिया में अमेरिका के सहयोगी देशों की नजरें टिकी हैं।
इसके अलावा एआई सेफ्टी को लेकर एक नई नोटिफिकेशन व्यवस्था पर भी दोनों पक्षों के बीच चर्चा हुई, लेकिन इस पर भी कोई ठोस समझौता सामने नहीं आया।
सी एस आई एस जैसे थिंक टैंकों के विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा शिखर सम्मेलन "प्रतीकों पर भारी, नतीजों पर हल्का" साबित हुआ। दोनों नेताओं के बीच निजी तालमेल भले ही कैमरों में दिखा हो, लेकिन ताइवान, टैरिफ, टेक्नोलॉजी और ईरान जैसे मुद्दों पर गहरा अविश्वास अब भी कायम है।
तो सवाल यही रह जाता है — क्या शी जिनपिंग को मिला यह भव्य स्वागत वाकई अमेरिका-चीन रिश्तों में नई शुरुआत की झलक है, या सिर्फ एक तस्वीर, जिसके पीछे छिपे असली मतभेद जस के तस बने हुए हैं? आने वाले हफ्तों में जब टैरिफ ट्रूस की नई समयसीमा नजदीक आएगी और ताइवान को हथियारों की बिक्री का मामला सामने आएगा, तभी इस सवाल का असली जवाब मिलेगा।