भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः पिछले छह वर्षों से भारत में डिजिटल भुगतान की सबसे बड़ी ताकत यही रही है कि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई पर कोई लेनदेन शुल्क नहीं लगता। जनवरी 2020 से लागू शून्य-एमडीआर व्यवस्था ने करोड़ों छोटे दुकानदारों और आम नागरिकों को बिना किसी अतिरिक्त लागत के डिजिटल भुगतान अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। यही वजह है कि आज यूपीआई देश में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला भुगतान माध्यम बन चुका है, जिससे पचपन करोड़ से अधिक लोग जुड़े हैं। लेकिन अब यह मुफ्त व्यवस्था अपने मौजूदा स्वरूप में शायद ही आगे बनी रह पाए। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी एनपीसीआई ने दो हजार रुपये से अधिक मूल्य के यूपीआई भुगतानों पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर लगाने की दिशा में बैंकों और उद्योग जगत के साथ परामर्श शुरू कर दिया है।
यह बदलाव अचानक नहीं आया। संसद ने हाल ही में कराधान एवं अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया, जिसने भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 में संशोधन करते हुए सरकार को यह अधिकार दिया कि वह किन इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों को शुल्क से मुक्त रखेगी। इसके बाद वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि दो हजार रुपये तक के यूपीआई भुगतान पूरी तरह शुल्क-मुक्त बने रहेंगे। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि इससे ऊपर के लेनदेन अब कानूनी रूप से शुल्क के दायरे में आ सकते हैं। अंतिम दर और श्रेणियाँ तय करने की जिम्मेदारी एनपीसीआई की अगुवाई वाली यूपीआई एंड सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी को सौंपी गई है, जिसमें बैंक, भुगतान कंपनियाँ और उद्योग संगठन शामिल हैं।
इस पूरे प्रस्ताव की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आम उपभोक्ता की जेब पर सीधा बोझ नहीं डालता। भुगतान परिषद जैसे उद्योग निकायों ने स्पष्ट किया है कि यूपीआई ग्राहकों के लिए मुफ्त बना रहेगा। जो शुल्क प्रस्तावित है, वह व्यक्ति-से-व्यक्ति यानी पी2पी हस्तांतरण पर लागू नहीं होगा—चाहे वह परिवार को पैसे भेजना हो या दोस्तों के साथ बिल बाँटना, राशि चाहे जितनी भी बड़ी क्यों न हो। यह शुल्क केवल व्यक्ति-से-व्यापारी यानी पी2एम लेनदेन पर, वह भी दो हजार रुपये से ऊपर की राशि पर, विचाराधीन है। किराना दुकानों, सब्जी विक्रेताओं और छोटे स्थानीय कारोबारियों को भी इस दायरे से बाहर रखने का आश्वासन दिया गया है, ताकि रोजमर्रा की खरीदारी—राशन, परिवहन या दवाइयाँ—पर कोई असर न पड़े।
आँकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह कदम व्यापक जनता को नहीं, बल्कि एक सीमित वर्ग को प्रभावित करेगा। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार पी2एम लेनदेन कुल यूपीआई मूल्य का लगभग उनतीस प्रतिशत हिस्सा हैं, और इसका करीब उन्नीस प्रतिशत ही संभावित एमडीआर सीमा में आता है। उद्योग के अनुमान बताते हैं कि छियानबे प्रतिशत लेनदेन इस दायरे से पूरी तरह बाहर रहेंगे और केवल चार से पाँच प्रतिशत बड़े व्यापारी ही इससे प्रभावित होंगे। तुलना करें तो क्रेडिट कार्ड पर पहले से एक से तीन प्रतिशत तक और डेबिट कार्ड पर लगभग नौ दशमलव आठ प्रतिशत तक एमडीआर लगता है। ऐसे में 0.4 प्रतिशत की दर अपेक्षाकृत मामूली प्रतीत होती है।
फिर सवाल उठता है कि आखिर मुफ्त सेवा को अब शुल्क के दायरे में क्यों लाया जा रहा है। इसका उत्तर बुनियादी ढाँचे की लागत में छिपा है। यूपीआई नेटवर्क को सुरक्षित, तेज़ और विश्वसनीय बनाए रखने के लिए साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी-रोकथाम प्रणाली और तकनीकी क्षमता विस्तार पर भारी निवेश आवश्यक है। उद्योग अनुमानों के अनुसार इस पारिस्थितिकी तंत्र को चलाने की वार्षिक लागत लगभग बीस हजार करोड़ रुपये तक पहुँच चुकी है, जबकि आमदनी का कोई स्थायी स्रोत नहीं रहा। बैंक और भुगतान ऐप वर्षों से घाटे में यह सेवा चला रहे थे, और सरकार की सब्सिडी भी इस अंतर को पूरी तरह नहीं भर पाई। इस लिहाज से देखें तो सीमित दायरे में एमडीआर लाना एक व्यावहारिक कदम कहा जा सकता है, जो प्रणाली की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी हो सकता है।
फिर भी, इस बदलाव के साथ सावधानी की ज़रूरत भी उतनी ही वास्तविक है। यद्यपि एमडीआर तकनीकी रूप से व्यापारी पर लगता है, ग्राहक के खाते से सीधे नहीं काटा जाता, लेकिन यह आशंका बनी रहती है कि व्यापारी इस लागत को अंततः उत्पादों की कीमत बढ़ाकर या सुविधा शुल्क जोड़कर ग्राहक पर ही स्थानांतरित कर दें। कुछ व्यापारी ग्राहकों को दूसरे भुगतान माध्यम अपनाने के लिए प्रोत्साहित भी कर सकते हैं, जिससे यूपीआई की सार्वभौमिक स्वीकार्यता प्रभावित हो सकती है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि दो हजार रुपये की सीमा प्रति लेनदेन लागू होगी या प्रतिदिन अथवा व्यापारी श्रेणी के अनुसार तय होगी। जब तक स्टीयरिंग कमेटी अंतिम रूपरेखा और दर की विधिवत घोषणा नहीं करती, तब तक अनिश्चितता बनी रहेगी।
सार यह है कि यूपीआई पर प्रस्तावित एमडीआर कोई सर्वग्राही शुल्क नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और सीमित हस्तक्षेप प्रतीत होता है, जो आम उपभोक्ता, छोटे व्यापारी और पी2पी लेनदेन को शुल्क से बचाते हुए केवल बड़े व्यापारिक लेनदेन पर लागू होगा। यह नीति यदि पारदर्शी ढंग से लागू की जाए और राजस्व का उपयोग वास्तव में बुनियादी ढाँचे को मज़बूत करने में हो, तो यह यूपीआई पारिस्थितिकी तंत्र को अधिक टिकाऊ बना सकती है। लेकिन नियामकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि इसका बोझ अप्रत्यक्ष रूप से आम ग्राहक या छोटे कारोबारियों तक न पहुँचे, और छूट की सीमाएँ स्पष्ट व सतत निगरानी में रहें। डिजिटल भुगतान क्रांति की सफलता इसी संतुलन को बनाए रखने में निहित है—पहुँच और समावेशन बनाम प्रणाली की वित्तीय स्थिरता के बीच।