भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक बयान अचानक सुर्खियों में छा गया, और वजह थी उनका सीधा इशारा उस समुद्री रास्ते की तरफ, जिस पर आज पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं—होर्मुज जलडमरूमध्य। ब्रिक्स बिजनेस फोरम के लीडर्स सेशन में बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि वैश्विक व्यापार तभी आगे बढ़ सकता है जब समुद्री रास्ते सुरक्षित हों, सप्लाई चेन बाधित न हो और जहाजों पर काम करने वाले नाविकों की जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित हो। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत हमेशा से नौवहन की स्वतंत्रता और नाविकों की सुरक्षा का प्रबल समर्थक रहा है। जिस वक्त यह बयान आया, ठीक उसी वक्त पश्चिम एशिया में जारी तनाव और अमेरिका-ईरान युद्ध की वजह से वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल मची हुई है, जिससे मोदी का यह कथन कूटनीतिक और आर्थिक, दोनों ही नजरिए से बेहद अहम माना जा रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त और सामरिक रूप से सबसे संवेदनशील समुद्री रास्तों में गिना जाता है। खाड़ी देशों से निकलने वाला कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस का एक बड़ा हिस्सा इसी संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है। भारत के लिए इसकी अहमियत और भी ज्यादा है, क्योंकि देश अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का करीब 85 प्रतिशत आयात करता है, और इसमें एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है। जब से पश्चिम एशिया में संघर्ष तेज हुआ है और होर्मुज क्षेत्र में तनाव बढ़ा है, तब से कच्चे तेल की कीमतें उछाल पर हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सौ डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुका है। जाहिर है, इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है—आयात बिल बढ़ता है, रुपया कमजोर होता है, महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा होता है और आर्थिक विकास की रफ्तार पर भी असर पड़ सकता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी का यह बयान महज एक कूटनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ मुद्दा बन जाता है।
इस साल भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और इसी थीम के तहत नई दिल्ली में दो दिवसीय शिखर सम्मेलन का आयोजन हो रहा है। यह वह मौका है जब दुनिया की करीब आधी आबादी और वैश्विक जीडीपी के करीब चालीस प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाले देश एक मंच पर इकट्ठा हुए हैं। ऐसे में जब ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान खुद इस सम्मेलन में शिरकत करने नई दिल्ली पहुंचे और प्रधानमंत्री मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक भी की, तो होर्मुज संकट का मुद्दा और भी केंद्र में आ गया। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी इस मौके पर कहा कि मौजूदा वैश्विक संकट, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी परिस्थितियों को देखते हुए, ब्रिक्स पर दुनिया को दिशा दिखाने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी है। उनका मानना था कि भारत की अगुआई में यह संगठन शांति और समृद्धि की दिशा में ठोस कदम उठा सकता है।
गौरतलब है कि यह पहला मौका नहीं है जब प्रधानमंत्री मोदी ने होर्मुज को लेकर चिंता जताई हो। इससे पहले संसद में बोलते हुए भी उन्होंने कहा था कि भारत लगातार कूटनीतिक माध्यमों से इस इलाके में तनाव कम करने और जलमार्ग को फिर से खोलने की दिशा में प्रयासरत है। उन्होंने खाड़ी देशों के नेताओं के साथ-साथ ईरान, इजरायल और अमेरिका के नेतृत्व से भी लगातार बातचीत की जानकारी दी थी और कहा था कि व्यावसायिक जहाजों पर हमले और अंतरराष्ट्रीय नौवहन में बाधा डालना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। साफ है कि यह मुद्दा भारत की विदेश नीति के केंद्र में लंबे समय से बना हुआ है, और ब्रिक्स मंच ने इसे एक बार फिर वैश्विक पटल पर ला खड़ा किया है।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि भारत इस पूरे मामले में एक संतुलित रुख अपनाने की कोशिश कर रहा है। एक तरफ ईरान जैसे देश ब्रिक्स मंच का इस्तेमाल डॉलर-मुक्त व्यापार और नए विकास बैंक जैसे विकल्पों को बढ़ावा देने के लिए कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ भारत ने साफ कर दिया है कि वह ब्रिक्स को किसी पश्चिम-विरोधी या डॉलर-विरोधी मंच में तब्दील होते नहीं देखना चाहता। भारत की कोशिश यही है कि खाड़ी क्षेत्र में स्थिरता बनी रहे, ऊर्जा आपूर्ति बाधित न हो और साथ ही वह अमेरिका, यूरोप जैसे पारंपरिक साझेदारों के साथ भी अपने रिश्ते सहज बनाए रखे। यही वजह है कि प्रधानमंत्री का समुद्री मार्गों की सुरक्षा वाला बयान बेहद सोच-समझकर दिया गया प्रतीत होता है—यह न तो किसी एक पक्ष का समर्थन करता है, न ही किसी पर सीधा आरोप लगाता है, बल्कि यह वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के व्यापक हित की बात करता है, जो लगभग सभी ब्रिक्स सदस्य देशों के लिए स्वीकार्य है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो प्रधानमंत्री मोदी का यह बयान भले ही चंद पंक्तियों का हो, लेकिन इसके निहितार्थ बेहद व्यापक हैं। यह भारत की आर्थिक चिंताओं को दर्शाता है, वैश्विक कूटनीति में उसकी भूमिका को रेखांकित करता है, और साथ ही यह संदेश भी देता है कि भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दे पर किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ब्रिक्स सम्मेलन के संयुक्त बयान में होर्मुज संकट को लेकर सदस्य देश किस हद तक एकमत हो पाते हैं, क्योंकि ईरान और खाड़ी के कुछ अन्य देशों के बीच पहले से ही इस मसले पर मतभेद सामने आ चुके हैं। फिलहाल इतना तय है कि जब तक होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बना रहेगा, तब तक वैश्विक ऊर्जा बाजार और भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह मुद्दा सुर्खियों से दूर नहीं जाने वाला।