भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः क्या आप जानते हैं कि दुनिया भर में आज भी हर साल करोड़ों लड़कियों का बचपन शादी की चौखट पर कुर्बान हो जाता है? अब इस क्रूर सच्चाई के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है, जिसकी गूंज आने वाले सालों तक सुनाई देगी। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 80वें सत्र के अंतिम दिनों में, शुक्रवार को सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित करते हुए 27 नवंबर को "बाल, अल्पायु और जबरन विवाह के उन्मूलन के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस" घोषित किया गया। यह पहल जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन के संस्थापक भुवन रिभु ने शुरू की थी और सिएरा लियोन की प्रथम महिला डॉ. फातिमा मादा बायो ने इसे आगे बढ़ाया। यह प्रस्ताव अकेले सिएरा लियोन का प्रयास नहीं था, बल्कि इसे 66 से अधिक देशों का समर्थन प्राप्त हुआ। भारत, मोरक्को, रवांडा, सूडान, कोस्टा रिका, नामीबिया, कैबो वर्डे और अफगानिस्तान जैसे देश इस प्रस्ताव के सह-प्रायोजकों में शामिल थे। इस प्रस्ताव में सभी सरकारों, संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों, नागरिक समाज संगठनों और अन्य पक्षधारकों से आह्वान किया गया है कि वे हर साल इस दिन को जागरूकता अभियानों, वकालत और शिक्षा के माध्यम से मनाएं, ताकि इस मुद्दे को वैश्विक स्तर पर लगातार जीवित रखा जा सके।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि 27 नवंबर की तारीख यूं ही नहीं चुनी गई। इसके पीछे एक भावुक और प्रेरक कहानी छिपी है। भुवन रिभु ने बताया कि इसी दिन, यानी 27 नवंबर 2025 को, भारत में लगभग 25 करोड़ लोगों ने बाल विवाह को समाप्त करने का संकल्प लिया था, जिसे मानव इतिहास में किसी एक मुद्दे पर अब तक की सबसे बड़ी सामूहिक लामबंदी माना जाता है। यह आंकड़ा अपने आप में यह दर्शाता है कि भारत इस लड़ाई में केवल एक भागीदार नहीं, बल्कि एक अगुआ देश के रूप में उभरा है।
दरअसल भारत के लिए यह तारीख और भी खास मायने रखती है। 27 नवंबर 2024 को ही केंद्र सरकार ने "बाल विवाह मुक्त भारत" नामक एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया था, जिसका उद्देश्य बाल विवाह को रोकना और इस विषय पर जनजागरूकता बढ़ाना था। यानी जो तारीख कभी भारत के आंतरिक अभियान की शुरुआत बनी थी, अब वही तारीख पूरी दुनिया के लिए बाल विवाह के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बन गई है। यह भारत की वैश्विक भूमिका को और भी मजबूत करता है और यह संदेश देता है कि घरेलू स्तर पर उठाए गए कदम भी अंतरराष्ट्रीय बदलाव की नींव बन सकते हैं। अब सवाल यह उठता है कि आखिर इस समस्या की गंभीरता कितनी बड़ी है? आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। भारत के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5, 2019-21) के अनुसार, 20 से 24 वर्ष की 23.3 प्रतिशत महिलाओं की शादी 18 वर्ष की उम्र से पहले ही हो चुकी थी। हालांकि राहत की बात यह है कि यह आंकड़ा एनएफएचएस-6 (2023-24) में घटकर 20.1 प्रतिशत रह गया, जो दर्शाता है कि लगातार प्रयासों से स्थिति में सुधार जरूर हो रहा है, लेकिन अभी भी लाखों लड़कियों का भविष्य दांव पर लगा हुआ है। केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई और हिस्सों में यह संकट और भी गहरा है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) के अनुसार बाल विवाह लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक अवसरों और अपने जीवन से जुड़े फैसले लेने की क्षमता पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव डालता है। इसके अलावा बचपन में विवाहित लड़कियों में किशोरावस्था में गर्भधारण, प्रसव के दौरान जटिलताएं, सामाजिक अलगाव और घरेलू हिंसा का खतरा भी कहीं अधिक बढ़ जाता है। दुर्भाग्यवश अफगानिस्तान जैसे देशों में हालात बेहद चिंताजनक बने हुए हैं, जहां संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) के मुताबिक एक तिहाई अफगान लड़कियों की शादी वयस्क होने से पहले ही कर दी जाती है। इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए डॉ. फातिमा मादा बायो ने एक भावुक अपील की। उन्होंने कहा कि हर आंकड़े के पीछे केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक बच्ची होती है, जिसका एक नाम होता है, एक सपना होता है और एक भविष्य होता है। जो लड़की पढ़ाई कर रही होनी चाहिए, वह इसके बजाय शादी की तैयारी में जुट जाती है, और जो लड़की अपनी क्षमताओं को तलाशने की उम्र में होती है, वह अपनी उम्र से कहीं ज्यादा जिम्मेदारियां उठाने पर मजबूर हो जाती है। यह बयान इस पूरे मुद्दे की मानवीय पीड़ा को बेहद सटीक ढंग से बयान करता है।
वहीं भुवन रिभु ने इस फैसले को एक "टिपिंग पॉइंट" यानी निर्णायक मोड़ करार दिया। उनका कहना है कि आज का दिन यह साबित करता है कि बाल विवाह जैसे अपराध का अंत अब अवश्यंभावी और नजदीक है, और अब समय आ गया है कि दुनिया भर की सरकारें इस लड़ाई में निर्णायक नेतृत्व प्रदान करें। संयुक्त राष्ट्र का यह प्रस्ताव 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में भी एक अहम कदम माना जा रहा है, क्योंकि बाल विवाह को इन लक्ष्यों की राह में एक बड़ी बाधा के रूप में देखा जाता है। कुल मिलाकर, 27 नवंबर अब केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं रहेगी, बल्कि यह हर साल दुनिया को याद दिलाएगा कि लाखों बच्चियों का बचपन अभी भी खतरे में है। यह दिन जागरूकता फैलाने का एक अवसर तो है ही, साथ ही यह एक चुनौती भी है—हर सरकार, हर समाज और हर परिवार के लिए, कि वे मिलकर यह सुनिश्चित करें कि कोई भी बच्ची अपने बचपन को खोने के लिए मजबूर न हो। अब देखना यह है कि यह वैश्विक संकल्प जमीनी स्तर पर कितनी तेजी से हकीकत में बदलता है।