भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किर्गिज़स्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के 26वें शिखर सम्मेलन में आतंकवाद के मुद्दे पर एक बार फिर बेहद स्पष्ट और सख़्त रुख़ अपनाया। सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि उन्होंने यह बयान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ की मौजूदगी में दिया, जिससे इस संदेश की धार और तीखी हो गई। मोदी ने सदस्य देशों से आह्वान किया कि वे केवल आतंकी घटनाओं की निंदा करने तक सीमित न रहें, बल्कि आतंकवाद को पोषित करने वाले पूरे तंत्र—यानी उसकी फंडिंग, भर्ती प्रक्रिया, कट्टरपंथ फैलाने वाले नेटवर्क और सुरक्षित पनाहगाहों—को जड़ से समाप्त करें।
यह कोई पहला मौक़ा नहीं है जब भारत के प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय मंच से पाकिस्तान की ओर इशारा करते हुए आतंकवाद के दोहरे मानदंडों पर प्रहार किया हो। लेकिन इस बार का संदर्भ और भी अहम है। बिश्केक सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब भारत-पाकिस्तान संबंध पहले से ही अत्यंत तनावपूर्ण दौर से गुज़र रहे हैं। पिछले वर्ष हुए पहलगाम आतंकी हमले, जिसमें दर्जनों निर्दोष पर्यटकों की जान गई थी, के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के ज़रिए सीमा पार सक्रिय आतंकी ढांचों पर निर्णायक कार्रवाई की थी। मोदी ने इसी पृष्ठभूमि में यह रेखांकित किया कि जो देश आतंकवाद को अपनी नीति का औज़ार बनाते हैं और आतंकियों को पनाह देते हैं, उन्हें अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से कड़ी और एकजुट प्रतिक्रिया मिलनी चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आतंकवाद किसी भी देश के लिए "रणनीतिक संपत्ति" नहीं बन सकता—एक ऐसा जुमला जिसे सीधे तौर पर पाकिस्तान की उस नीति पर तंज़ माना जा रहा है, जिसमें वह दशकों से सीमा पार आतंकवाद को कूटनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करता आया है।
गौरतलब है कि पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर लंबे समय से आतंकवाद के केंद्र के रूप में देखा जाता रहा है, और उससे उपजने वाला अधिकांश आतंक भारत को ही निशाना बनाता रहा है। ऐसे में जब शहबाज़ शरीफ स्वयं इस सम्मेलन में मौजूद थे, तब मोदी का यह बयान कोई सामान्य कूटनीतिक टिप्पणी न होकर एक सुनियोजित और सीधा संदेश प्रतीत होता है। दिलचस्प यह भी है कि पाकिस्तान अगले वर्ष एससीओ की अध्यक्षता संभालने वाला है और 2027 का शिखर सम्मेलन इस्लामाबाद में आयोजित होगा—ऐसे में भारत का यह कड़ा रुख़ यह भी स्पष्ट करता है कि वह आतंकवाद के मुद्दे पर किसी तरह की नरमी या समझौते के मूड में नहीं है, चाहे मंच की अध्यक्षता किसी के भी हाथ में क्यों न हो।
मोदी ने अपने संबोधन में सिर्फ आलोचना तक सीमित न रहते हुए भारत के सकारात्मक योगदान को भी उजागर किया। उन्होंने एससीओ की क्षेत्रीय आतंकवाद-रोधी संरचना (आरएटीएस) की सराहना करते हुए बताया कि इस वर्ष भारत ने अलक़ायदा और उससे जुड़े संगठनों के विरुद्ध एक संयुक्त सूचना अभियान का नेतृत्व किया, जो आतंकवाद-रोधी सहयोग को मज़बूत करने की दिशा में भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। साथ ही उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आतंकवाद पर दोहरा रवैया अब स्वीकार्य नहीं होना चाहिए—हर रूप और हर स्वरूप में इसका सामूहिक विरोध ज़रूरी है, और यह पूरी मानवता के प्रति एक साझा दायित्व है।
आतंकवाद के अलावा मोदी ने क्षेत्रीय संपर्क और आर्थिक अवसरों पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (आईएनएसटीसी) जैसी परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इनसे मध्य एशिया और अफ़ग़ानिस्तान के साथ भारत की संपर्क-व्यवस्था और मज़बूत होगी। इस तरह मोदी ने एससीओ की भूमिका को सुरक्षा, संपर्क और अवसर—इन तीन मूल स्तंभों के इर्द-गिर्द फिर से परिभाषित करने की कोशिश की, जो यह दर्शाता है कि भारत इस मंच को केवल कूटनीतिक विरोध जताने के बजाय एक रचनात्मक भूमिका निभाने के मंच के रूप में भी देखता है।
दूसरी ओर, शहबाज़ शरीफ ने भी मोदी के भाषण के बाद अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि पाकिस्तान विश्व समुदाय और एससीओ सदस्य देशों के सहयोग से आतंकवाद को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है। हालांकि उन्होंने भारत द्वारा सिंधु जल संधि को स्थगित रखे जाने का परोक्ष संदर्भ देते हुए मौजूदा जल-संधियों के तहत निर्बाध हिस्सेदारी की मांग भी उठाई। यह प्रतिक्रिया दिखाती है कि दोनों पक्षों के बीच आतंकवाद और जल-बंटवारे जैसे मुद्दों पर गहरी असहमति अब भी बरक़रार है, भले ही दोनों नेता एक ही मंच पर साथ बैठे हों।
कुल मिलाकर, बिश्केक में मोदी का यह संबोधन भारत की उस दीर्घकालिक कूटनीतिक रणनीति की अगली कड़ी है, जिसके तहत वह हर बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच का इस्तेमाल आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक जनमत तैयार करने के लिए करता रहा है। शहबाज़ शरीफ की मौजूदगी में दिया गया यह बयान न केवल पाकिस्तान के लिए बल्कि उन तमाम देशों के लिए भी एक स्पष्ट चेतावनी है जो आतंकवाद के मुद्दे पर रणनीतिक चुप्पी या दोहरे मापदंड अपनाते हैं। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह कड़ा रुख़ केवल कूटनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित रहता है, या फिर एससीओ जैसे मंचों पर आतंकवाद-रोधी सहयोग को व्यावहारिक रूप से भी मज़बूत करने की दिशा में कोई ठोस क़दम उठाया जाता है। भारत के लिए यह स्पष्ट है कि आतंकवाद के मुद्दे पर कोई समझौता संभव नहीं, चाहे वार्ता की मेज़ पर कोई भी बैठा हो।