भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः पृथ्वी के बदलते मिजाज ने आज पूरी मानवता के सामने एक ऐसी चुनौती खड़ी कर दी है, जिसकी गंभीरता को अभी तक पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है। समुद्र का लगातार बढ़ता जलस्तर अब केवल वैज्ञानिकों की रिपोर्टों या शोध पत्रों तक सीमित विषय नहीं रहा, बल्कि यह करोड़ों लोगों के जीवन, आजीविका और भविष्य से सीधे जुड़ा हुआ मुद्दा बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र सहित विश्व की कई प्रमुख शोध संस्थाओं का आकलन है कि आने वाले दशकों में दुनिया भर में लगभग तटीय क्षेत्रों में रहने वाले सैकड़ों करोड़ लोग इस संकट की चपेट में आ सकते हैं, और इसमें भारत भी अछूता नहीं है।
समुद्री जलस्तर के बढ़ने के पीछे मुख्य रूप से दो कारण जिम्मेदार माने जाते हैं। पहला, ग्लोबल वार्मिंग के कारण अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड की बर्फ की चादरें तथा पर्वतीय हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं और उनका पानी समुद्र में मिल रहा है। दूसरा कारण है समुद्री जल का तापीय प्रसार, यानी जैसे-जैसे समुद्र का तापमान बढ़ता है, पानी का आयतन भी बढ़ता जाता है। औद्योगिक क्रांति के बाद से मानव गतिविधियों, विशेष रूप से जीवाश्म ईंधन के अंधाधुंध उपयोग ने वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा को असामान्य रूप से बढ़ा दिया है, जिसका सीधा असर पृथ्वी के तापमान और फलस्वरूप समुद्रों पर पड़ रहा है। पिछली एक सदी में वैश्विक औसत समुद्री जलस्तर में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, और चिंता की बात यह है कि यह वृद्धि दर पहले की तुलना में अब कहीं अधिक तेज हो गई है।
आज दुनिया की एक बड़ी आबादी समुद्र तट से महज कुछ मीटर की ऊंचाई पर बसे शहरों और गांवों में निवास करती है। बांग्लादेश, वियतनाम, इंडोनेशिया, फिलीपींस जैसे देशों के निचले तटीय इलाके, साथ ही मालदीव और प्रशांत महासागर के छोटे द्वीपीय राष्ट्र इस संकट के सबसे संवेदनशील केंद्र माने जाते हैं। न्यूयॉर्क, टोक्यो, शंघाई, जकार्ता और लंदन जैसे विश्व के प्रमुख महानगर भी इस खतरे से अछूते नहीं हैं। समुद्री जल के आगे बढ़ने से न केवल भूमि का कटाव होगा, बल्कि पीने के पानी के स्रोतों में खारे पानी का प्रवेश, कृषि भूमि की उर्वरता में कमी, और तूफानी लहरों तथा बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि जैसी समस्याएं भी सामने आएंगी। इसका सबसे भयावह परिणाम होगा बड़े पैमाने पर होने वाला मानव विस्थापन, जिसे विशेषज्ञ पहले से ही "जलवायु शरणार्थी" संकट के रूप में चिन्हित कर रहे हैं।
भारत की लगभग साढ़े सात हजार किलोमीटर लंबी तटरेखा और इस पर बसी करोड़ों की आबादी को देखते हुए यह मुद्दा हमारे देश के लिए भी अत्यंत गंभीर है। मुंबई, चेन्नई, कोलकाता और कोच्चि जैसे बड़े महानगर, जो देश की आर्थिक रीढ़ माने जाते हैं, समुद्री जलस्तर बढ़ने के जोखिम वाले क्षेत्रों में शामिल हैं। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की सीमा पर फैला सुंदरबन का विशाल मैंग्रोव क्षेत्र, जो लाखों लोगों का आश्रयस्थल है, पहले से ही समुद्र के कटाव और खारे पानी की समस्या से जूझ रहा है। कई अध्ययन बताते हैं कि सुंदरबन के कुछ द्वीप पहले ही जलमग्न हो चुके हैं, और वहां के निवासियों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। इसी प्रकार, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और गुजरात के तटीय जिलों में भी कृषि भूमि की लवणता बढ़ने और तूफानों की तीव्रता में वृद्धि जैसी समस्याएं देखी जा रही हैं। लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह भी इस खतरे के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं, क्योंकि इनकी भौगोलिक बनावट पहले से ही सीमित है।
समुद्री जलस्तर में वृद्धि केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि एक गहरा आर्थिक और सामाजिक संकट भी है। तटीय क्षेत्रों में मत्स्य पालन, पर्यटन और बंदरगाह आधारित उद्योगों पर निर्भर लाखों परिवारों की आजीविका खतरे में पड़ सकती है। बुनियादी ढांचे, जैसे सड़कें, बिजलीघर और आवासीय क्षेत्रों को होने वाले नुकसान की भरपाई में अरबों रुपये खर्च होने की आशंका है। इसके अलावा, विस्थापन की स्थिति में शहरी क्षेत्रों पर अतिरिक्त जनसंख्या का दबाव बढ़ेगा, जिससे संसाधनों की कमी, बेरोजगारी और सामाजिक तनाव जैसी समस्याएं और गहरा सकती हैं। यह संकट समाज के सबसे गरीब और हाशिए पर खड़े वर्गों को सबसे अधिक प्रभावित करेगा, क्योंकि उनके पास न तो पुनर्वास के साधन हैं और न ही सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित होने की आर्थिक क्षमता।
इस चुनौती से निपटने के लिए दोहरी रणनीति अपनाने की जरूरत है—एक ओर कार्बन उत्सर्जन में कटौती करके जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करना, तो दूसरी ओर पहले से हो रहे बदलावों के अनुकूल ढलने की तैयारी करना। भारत को अपने तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव वनों के संरक्षण और पुनर्रोपण, समुद्री दीवारों तथा अन्य सुरक्षात्मक ढांचों के निर्माण, और आपदा प्रबंधन प्रणाली को और सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। साथ ही, वैज्ञानिक आधार पर तटीय क्षेत्रों के नियोजन, संवेदनशील बस्तियों के व्यवस्थित पुनर्वास और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तीव्र बदलाव जैसे उपाय भी अपनाने होंगे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकसित देशों को अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी समझते हुए विकासशील देशों को तकनीकी और वित्तीय सहायता उपलब्ध करानी चाहिए, ताकि वे इस वैश्विक संकट का सामना कर सकें।
समुद्री जलस्तर का बढ़ना अब भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की सच्चाई बन चुका है। यह संकट किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी मानवता के साझे भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। समय रहते ठोस और समयबद्ध कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका खामियाजा कहीं अधिक भीषण रूप में भुगतना पड़ सकता है। भारत जैसे विशाल तटरेखा और घनी आबादी वाले देश के लिए यह और भी जरूरी हो जाता है कि वह नीति-निर्माण, संसाधन आवंटन और जन-जागरूकता के स्तर पर तत्परता दिखाए, ताकि करोड़ों लोगों के जीवन और आजीविका को सुरक्षित रखा जा सके।