भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः एक जनवरी 2026 से भारत ने ब्रिक्स समूह की अध्यक्षता संभाली, और "लचीलापन, नवाचार, सहयोग व स्थिरता के लिए निर्माण" की थीम के साथ इस मंच को एक नई दिशा देने का प्रयास किया है। इस वर्षभर चलने वाली अध्यक्षता के दौरान भारत ने व्यापार, आपूर्ति शृंखला, स्टार्टअप, ऊर्जा, कृषि और शहरी अवसंरचना जैसे कई क्षेत्रों में पहल की हैं, लेकिन इन सबमें सबसे उल्लेखनीय रहा है सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों यानी एमएसएमई क्षेत्र पर दिया गया विशेष बल। यह कोई संयोग नहीं है। भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले एमएसएमई क्षेत्र को वैश्विक मंच पर प्राथमिकता देना, न केवल घरेलू आर्थिक हितों के अनुरूप है, बल्कि ब्रिक्स के अन्य विकासशील सदस्य देशों की साझा चुनौतियों को संबोधित करने का भी एक सुनियोजित प्रयास है।
भारत ने ब्रिक्स की "न्यू इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन पार्टनरशिप" यानी पार्टनिर के अंतर्गत एमएसएमई सहयोग के एजेंडे को नए सिरे से गति दी है। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय को अपनी अध्यक्षता के दौरान तीन एसएमई कार्यकारी समूह बैठकें और पहला ब्रिक्स एमएसएमई फोरम आयोजित करने का दायित्व सौंपा गया है। इसी क्रम में पहली एसएमई कार्यकारी समूह बैठक 24 अप्रैल 2026 को वेबिनार के रूप में आयोजित हुई, जिसका केंद्रीय विषय था "एमएसएमई के लिए वित्त तक पहुंच"। इसके बाद 8 मई को औपचारिक रूप से इस बैठक के निष्कर्षों को साझा किया गया, जिसमें "वित्तीय समावेशन, साक्षरता और ऋण-तत्परता के माध्यम से एमएसएमई ऋण अंतर को पाटना" तथा "फिनटेक-संचालित पारिस्थितिकी तंत्र: एसएमई ऋण और निर्बाध वैश्विक व्यापार भुगतान का विस्तार" जैसे विषयों पर गहन चर्चा हुई।
इन बैठकों में ब्रिक्स सदस्य देशों की सक्रिय भागीदारी देखी गई, जिन्होंने एमएसएमई वित्तपोषण से जुड़ी चुनौतियों और संभावनाओं पर अपने अनुभव व सर्वोत्तम व्यवहार साझा किए। चर्चाओं में इस बात को रेखांकित किया गया कि एमएसएमई आर्थिक वृद्धि, रोजगार सृजन, नवाचार और समावेशी विकास के महत्वपूर्ण वाहक हैं, लेकिन समय पर और पर्याप्त ऋण उपलब्ध न होना इस क्षेत्र की सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। इस अंतर को पाटने के लिए वित्तीय समावेशन बढ़ाने, वित्तीय साक्षरता में सुधार करने और उद्यमों की ऋण-क्षमता मजबूत करने जैसे बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दिया गया।
भारत की अध्यक्षता के इन नौ महीनों में यह पहल केवल विचार-विमर्श तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने ठोस संस्थागत रूप भी लिया है। हाल की जानकारी के अनुसार, एसएमई कार्यकारी समूह ने एक ऐसा ढांचा अपनाया है जिसके तहत "ब्रिक्स एमएसएमई सहयोग पोर्टल" स्थापित किया जाएगा और एमएसएमई वित्त पर एक सतत संवाद तंत्र भी बनाया जाएगा। इसके साथ ही व्यापार ट्रैक के अंतर्गत एमएसएमई के अंतरराष्ट्रीयकरण पर एक कार्ययोजना स्वीकृत की गई है, जिसमें "जयपुर सहमति" प्रमुख है। इस सहमति के तहत एक ब्रिक्स इनवॉइस डिस्काउंटिंग तंत्र पर अध्ययन तथा निर्यातोन्मुख एमएसएमई के लिए ऋण मूल्यांकन के दिशा-निर्देशक सिद्धांत तैयार किए जाने प्रस्तावित हैं। साथ ही 2026 से 2030 तक की वैश्विक मूल्य शृंखला कार्ययोजना को भी मंजूरी दी गई है, जिसमें एक तकनीकी परिषद और सीमा-पार डिजिटल सेवाओं से जुड़े सिद्धांत शामिल हैं। सदस्य देशों ने 2026 के ब्रिक्स एमएसएमई फोरम की रिपोर्ट, "ब्रिक्स में एमएसएमई प्रतिस्पर्धात्मकता को आगे बढ़ाना: वित्त, प्रौद्योगिकी तक पहुंच और सतत विकास को मजबूत करना" शीर्षक से जारी दस्तावेज का भी स्वागत किया है।
भारत के लिए यह पहल केवल कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि एक सुविचारित आर्थिक रणनीति है। देश में लगभग साढ़े छह करोड़ से अधिक एमएसएमई इकाइयां हैं, जो सकल घरेलू उत्पाद में लगभग एक-तिहाई योगदान देती हैं और करोड़ों लोगों को रोजगार प्रदान करती हैं। बावजूद इसके, ऋण उपलब्धता, बाजार तक पहुंच और तकनीकी उन्नयन जैसी चुनौतियां इस क्षेत्र को दशकों से जकड़े हुए हैं। ब्रिक्स जैसे मंच का उपयोग करके भारत न केवल इन चुनौतियों के समाधान के लिए बहुपक्षीय सहयोग जुटा रहा है, बल्कि अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं, विशेषकर ब्राजील, रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका सहित नए सदस्य देशों के साथ अनुभवों के आदान-प्रदान का अवसर भी बना रहा है, जो समान संरचनात्मक चुनौतियों से जूझ रहे हैं।
यह ध्यान देने योग्य है कि भारत की अध्यक्षता के दौरान अब तक 350 से अधिक बैठकें हो चुकी हैं और व्यापार, वित्त, उद्योग, स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा, विज्ञान-प्रौद्योगिकी सहित अनेक क्षेत्रों में बीस से अधिक ठोस परिणाम सामने आए हैं। इनमें एमएसएमई से जुड़ी पहलों को केंद्रीय स्थान मिलना यह दर्शाता है कि भारत वैश्विक दक्षिण की आवाज को केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि उसे व्यावहारिक, जमीनी आर्थिक परिणामों में बदलना चाहता है।
निःसंदेह, किसी भी बहुपक्षीय मंच पर लिए गए निर्णयों को वास्तविक जमीनी परिणामों में बदलना एक कठिन कार्य है, और एमएसएमई सहयोग पोर्टल तथा ऋण-तत्परता जैसी पहलों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सदस्य देश इन्हें कितनी गंभीरता से लागू करते हैं। फिर भी, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि भारत ने अपनी ब्रिक्स अध्यक्षता का उपयोग एक ऐसे क्षेत्र को वैश्विक प्राथमिकता दिलाने में किया है, जो आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और समावेशी समृद्धि की दृष्टि से किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था की रीढ़ होता है। यदि आगामी महीनों में प्रस्तावित एमएसएमई फोरम और शेष कार्यकारी समूह बैठकें इन प्रतिबद्धताओं को ठोस कार्ययोजनाओं में बदल पाती हैं, तो यह भारत की अध्यक्षता की एक स्थायी और सराहनीय विरासत साबित होगी।