भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः भारत की सुरक्षा चुनौतियां लगातार बदल रही हैं। सीमाओं पर पारंपरिक सैन्य खतरे मौजूद हैं, वहीं ड्रोन, साइबर युद्ध, मिसाइल तकनीक और आधुनिक निगरानी प्रणालियां युद्ध की प्रकृति को तेजी से बदल रही हैं। ऐसे समय में देश की सैन्य तैयारियों को मजबूत करने के लिए रक्षा खरीद से जुड़े फैसलों का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इसी दिशा में रक्षा अधिग्रहण परिषद ने करीब 1.10 लाख करोड़ रुपये की सैन्य खरीद संबंधी प्रस्तावों को मंजूरी देकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है।
यह फैसला केवल हथियार और सैन्य उपकरण खरीदने तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए। इसके पीछे भारत की दीर्घकालिक रक्षा रणनीति, स्वदेशी सैन्य उत्पादन को बढ़ावा देने और तीनों सेनाओं की युद्धक क्षमता को आधुनिक बनाने की व्यापक सोच दिखाई देती है। सवाल यह है कि इतने बड़े रक्षा खरीद प्रस्तावों का भारत की सुरक्षा और आत्मनिर्भरता पर कितना असर पड़ेगा?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आधुनिक युद्ध में केवल सैनिकों की संख्या निर्णायक नहीं होती। युद्ध जीतने के लिए बेहतर खुफिया जानकारी, अत्याधुनिक सेंसर, सटीक हथियार, मजबूत संचार व्यवस्था, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता और तेज निर्णय लेने की क्षमता जरूरी है। इसलिए भारत को अपनी सैन्य प्रणालियों को लगातार आधुनिक बनाना होगा। DAC की मंजूरी इसी आवश्यकता की ओर संकेत करती है।
भारत के सामने पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर अलग-अलग तरह की सुरक्षा चुनौतियां हैं। चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर लंबे समय से जारी तनाव ने यह स्पष्ट किया है कि उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनाती और निगरानी के लिए अत्याधुनिक तकनीक की जरूरत है। दूसरी ओर पाकिस्तान से जुड़ी सीमा पर आतंकवाद और ड्रोन आधारित घुसपैठ जैसी चुनौतियां नई चिंता पैदा कर रही हैं। ऐसे वातावरण में सेना, वायुसेना और नौसेना को आधुनिक उपकरणों से लैस करना किसी विकल्प से अधिक राष्ट्रीय आवश्यकता बन चुका है।
हालांकि रक्षा खरीद के इस बड़े पैकेज का सबसे सकारात्मक पहलू यह होना चाहिए कि इसमें 'मेक इन इंडिया' और आत्मनिर्भर भारत की भावना को वास्तविक मजबूती मिले। वर्षों से भारत रक्षा क्षेत्र में आयात पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है। यदि बड़े रक्षा सौदों में भारतीय कंपनियों, सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा उपक्रमों और देश के छोटे-बड़े तकनीकी उद्यमों की भागीदारी बढ़ती है, तो इसका लाभ केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। इससे देश में नई तकनीक, अनुसंधान, रोजगार और औद्योगिक क्षमता का भी विकास होगा।
भारत आज दुनिया के बड़े रक्षा बाजारों में शामिल है। लेकिन लंबे समय तक बड़ी मात्रा में हथियारों और सैन्य उपकरणों के आयात ने देश की रणनीतिक स्वायत्तता पर सवाल खड़े किए। किसी भी बड़े संकट या युद्ध के दौरान यदि जरूरी स्पेयर पार्ट्स या गोला-बारूद की आपूर्ति विदेशी स्रोतों पर निर्भर हो, तो यह गंभीर रणनीतिक जोखिम बन सकता है। इसलिए घरेलू रक्षा उत्पादन को मजबूत करना राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा है।
यही कारण है कि रक्षा खरीद के हर बड़े फैसले का मूल्यांकन केवल उसकी वित्तीय लागत से नहीं, बल्कि उसके दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ से किया जाना चाहिए। 1.10 लाख करोड़ रुपये की राशि निश्चित रूप से बहुत बड़ी है। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है कि प्रत्येक खरीद में पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और लागत प्रभावशीलता सुनिश्चित की जाए। रक्षा सौदों में जल्दबाजी जितनी नुकसानदायक हो सकती है, अनावश्यक देरी भी उतनी ही गंभीर समस्या बन सकती है।
भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि नई प्रणालियां केवल कागजों पर आधुनिक न हों, बल्कि वास्तविक युद्ध परिस्थितियों में प्रभावी साबित हों। दुनिया में सैन्य तकनीक तेजी से बदल रही है। आज खरीदी गई तकनीक आने वाले वर्षों में अप्रासंगिक न हो जाए, इसके लिए खरीद प्रक्रिया में भविष्य की जरूरतों और अपग्रेड की संभावनाओं को भी ध्यान में रखना होगा।
विशेष रूप से ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीक का क्षेत्र तेजी से महत्वपूर्ण हो रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने दिखाया है कि अपेक्षाकृत कम लागत वाले ड्रोन भी युद्ध के मैदान में बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं। भारत के लिए यह सबक महत्वपूर्ण है। भविष्य की रक्षा नीति में महंगे पारंपरिक हथियारों के साथ-साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्वायत्त प्रणालियों, साइबर सुरक्षा, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और मानवरहित प्लेटफॉर्म पर भी पर्याप्त निवेश जरूरी होगा।
नौसेना के संदर्भ में भी भारत की भूमिका बदल रही है। हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियां और समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में समुद्री निगरानी, पनडुब्बी रोधी क्षमता, आधुनिक युद्धपोत और लंबी दूरी की निगरानी प्रणालियां देश की सामरिक स्थिति को मजबूत कर सकती हैं।
लेकिन रक्षा आधुनिकीकरण का मतलब केवल हथियारों की खरीद नहीं होना चाहिए। सेना के जवानों के प्रशिक्षण, लॉजिस्टिक्स, संचार नेटवर्क, रखरखाव और युद्धक बुनियादी ढांचे पर भी समान ध्यान देना होगा। अत्याधुनिक हथियार तभी प्रभावी होंगे जब उन्हें संचालित करने वाले सैनिकों के पास पर्याप्त प्रशिक्षण और आवश्यक बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों।
रक्षा अधिग्रहण परिषद की यह मंजूरी ऐसे समय में आई है जब भारत अपनी रक्षा नीति को आयात-निर्भर मॉडल से आत्मनिर्भर और तकनीक-आधारित मॉडल की ओर ले जाने का प्रयास कर रहा है। यह रास्ता आसान नहीं है। स्वदेशी तकनीक विकसित करने में समय और भारी निवेश लगता है। कई मामलों में विदेशी तकनीक के मुकाबले घरेलू प्रणालियों को विकसित होने में अधिक समय लग सकता है। फिर भी दीर्घकाल में यही रास्ता भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता को मजबूत कर सकता है।
इसलिए 1.10 लाख करोड़ रुपये की रक्षा खरीद मंजूरी को केवल एक बड़ा सरकारी खर्च समझना भूल होगी। असली सफलता इस बात से तय होगी कि यह निवेश भारत की सैन्य क्षमता, स्वदेशी रक्षा उद्योग और तकनीकी आत्मनिर्भरता को कितना मजबूत करता है। यदि खरीद प्रक्रिया पारदर्शी रहती है, घरेलू उद्योग को पर्याप्त अवसर मिलता है और अत्याधुनिक तकनीक पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, तो यह फैसला आने वाले वर्षों में भारत की सुरक्षा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है।
भारत को अब केवल हथियार खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि हथियार और सैन्य तकनीक विकसित करने वाला वैश्विक शक्ति केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ना होगा। रक्षा अधिग्रहण परिषद की मंजूरी इस बड़े लक्ष्य की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है। अब निगाहें इस बात पर होंगी कि इन प्रस्तावों को जमीन पर कितनी तेजी, पारदर्शिता और प्रभावशीलता के साथ लागू किया जाता है।