भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः भारत की वैश्विक आर्थिक कूटनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है। ब्रिक्स की अध्यक्षता के तहत नई दिल्ली अगले सप्ताह दुनिया के सबसे बड़े संस्थागत निवेशकों का घर बनने जा रही है। 12 और 13 सितंबर को राजधानी में आयोजित होने वाला पहला आई ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026, वित्तीय जगत की एक ऐसी सभा साबित होगा जिसकी मिसाल पिछले दो दशकों में शायद ही कहीं देखने को मिली हो। इस दो-दिवसीय आयोजन में 500 से ज़्यादा संस्थागत निवेशक, वित्त मंत्री और कारोबारी दिग्गज हिस्सा लेंगे, जो मिलाकर करीब एक ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की संपत्ति का प्रबंधन करते हैं। यह आँकड़ा अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि भारत अब केवल राजनीतिक मंच पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक पूंजी बाज़ार की धुरी बनने की दिशा में भी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।
यह सम्मेलन 18वीं ब्रिक्स नेताओं की बैठक के साथ-साथ आयोजित किया जा रहा है, और इसका मंच होगा नई दिल्ली का प्रतिष्ठित ओबेरॉय होटल। इसे सॉवरेन वेल्थ फंड इंस्टीट्यूट द्वारा आयोजित किया जा रहा है, जो दुनिया भर के सरकारी स्वामित्व वाले निवेश कोषों और बड़े संस्थागत पूंजी प्रबंधकों के बीच एक प्रमुख कड़ी माना जाता है। इस आयोजन में सॉवरेन वेल्थ फंड, सार्वजनिक पेंशन फंड, और खाड़ी देशों तथा ब्रिक्स सदस्य देशों के प्रमुख फैमिली ऑफिस शामिल होंगे। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि यह विशाल पूंजी सीधे तौर पर 21 ब्रिक्स सदस्य और साझेदार देशों में चल रही या प्रस्तावित परियोजनाओं से जुड़ सके — चाहे वह अवसंरचना का क्षेत्र हो, ऊर्जा परिवर्तन, महत्वपूर्ण खनिज, प्रौद्योगिकी या डिजिटल क्षमता निर्माण।
एस डबल्यू एफ आई के अध्यक्ष और आई ब्रिक्स के मुख्य सह-अध्यक्ष लक्ष्मी नारायणन के अनुसार, पिछले बीस वर्षों में ब्रिक्स देशों के बीच सीमा-पार निवेश की चर्चाएं अक्सर राजनीतिक स्तर पर होती रहीं, जबकि उनका वास्तविक क्रियान्वयन द्विपक्षीय रूप से और बाहरी मध्यस्थों के माध्यम से किया जाता रहा। उनका मानना है कि मौजूदा वैश्विक व्यापार तनाव, टैरिफ की मार और प्रतिबंधों के दबाव के चलते अब फंडों और मंत्रालयों को पूंजी आवंटन के लिए एक सीधा और भरोसेमंद रास्ता चाहिए। यही वजह है कि ब्रिक्स नेताओं के शिखर सम्मेलन के साथ एक अलग मंच तैयार किया गया है, जहाँ पूंजी और परियोजनाएं बिना किसी बाहरी बिचौलिये के आमने-सामने आ सकें।
आई ब्रिक्स नई दिल्ली 2026 के सह-अध्यक्ष दुष्यंत खन्ना का कहना है कि ब्रिक्स देशों के पास वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार का एक बड़ा हिस्सा मौजूद है, और ये देश अपनी वित्तीय संरचना को इस तरह विकसित कर रहे हैं कि पूंजी अधिक स्वतंत्र रूप से आवाजाही कर सके। उनके मुताबिक अब तक की सबसे बड़ी कमी यही रही है कि इस विशाल पूंजी को व्यावहारिक और वित्तपोषण-योग्य परियोजनाओं से सीधे जोड़ा नहीं जा सका। सम्मेलन का यही मूल उद्देश्य है — परियोजना मालिकों और वैश्विक पूंजी आवंटकों को एक ही मेज पर लाना।
सम्मेलन के पहले दिन एक बंद कमरे में लगभग 250 प्रमुख प्रतिभागियों की एक विशेष गोलमेज बैठक होगी। इसमें मुख्य रूप से गैर-डॉलर निपटान गलियारों और पूंजी तैनाती के लक्ष्यों पर विस्तृत चर्चा होने की उम्मीद है। मौजूदा दौर में जब डॉलर आधारित लेन-देन की लागत बढ़ती जा रही है और अमेरिकी टैरिफ नीतियों का असर व्यापारिक रिश्तों पर पड़ रहा है, ऐसे में वैकल्पिक भुगतान व्यवस्थाओं को लेकर यह चर्चा खासा महत्व रखती है। इसी क्रम में भारत की यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस और ब्राज़ील की Pix जैसी घरेलू तीव्र भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ने की संभावनाओं पर भी बात होगी, साथ ही केंद्रीय बैंकों की डिजिटल मुद्राओं के बीच अंतर-संचालन को लेकर भी विमर्श किया जाएगा।
इसके अलावा, पहले दिन प्रतिभागियों के एक प्रस्तावित "सॉवरेन कैपिटल कॉम्पैक्ट" पर हस्ताक्षर करने की भी योजना है। हालांकि आयोजकों की ओर से जारी विज्ञप्ति में अभी तक किसी विशेष निवेश प्रतिबद्धता की राशि या किसी विशिष्ट परियोजना का खुलासा नहीं किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह समझौता एक व्यापक ढांचे के रूप में काम करेगा, न कि तत्काल किसी सौदे की घोषणा के रूप में।
दूसरे दिन का स्वरूप कहीं अधिक व्यावहारिक होगा। इसमें पहले से तय किए गए द्विपक्षीय डील टेबल आयोजित किए जाएंगे, जहाँ विशिष्ट क्षेत्रों — जैसे अवसंरचना, प्रौद्योगिकी, महत्वपूर्ण खनिज और ऊर्जा परिवर्तन — से जुड़ी परियोजनाओं पर सीधी बातचीत होगी। इस तरह की संरचना इस बात का संकेत देती है कि आयोजक केवल औपचारिक भाषणों या घोषणाओं तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि वास्तविक पूंजी प्रवाह को गति देना चाहते हैं।
भारत के लिए यह सम्मेलन कई मायनों में महत्वपूर्ण है। एक तरफ यह भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता 2026 की विश्वसनीयता को मज़बूत करता है, वहीं दूसरी तरफ यह वैश्विक निवेशकों के सामने भारत को एक भरोसेमंद और सक्षम मेज़बान के रूप में प्रस्तुत करने का अवसर भी है। "बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी" की थीम के तहत आयोजित हो रहे 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के समानांतर यह पूंजी-केंद्रित आयोजन भारत की उस रणनीति को दर्शाता है, जिसमें राजनीतिक कूटनीति को आर्थिक साझेदारी के साथ जोड़कर देखा जा रहा है।
कुल मिलाकर, यह आयोजन सिर्फ एक और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भर नहीं है, बल्कि यह उस बदलते वैश्विक वित्तीय परिदृश्य की झलक भी है, जिसमें उभरती अर्थव्यवस्थाएं अपनी शर्तों पर पूंजी और साझेदारी की नई राहें तलाश रही हैं। अगले कुछ दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह मंच वाकई ठोस निवेश समझौतों में तब्दील होता है, या फिर यह केवल एक और कूटनीतिक आयोजन बनकर रह जाता है।